भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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| अध्याय ८५ ] | सारस्वतस्तोत्रके संदर्भमें विष्णुपञ्जरस्तोत्र, सारस्वतस्तव-कथन-प्रसङ्गमें राक्षस-वृत्तान्त | ४२३ | | :--- | :--- |

| स विमृश्य चिरं विप्रः शरणं जातवेदसम्।<br>जगाम ज्ञानदानाय संशयं परमं गतः॥ ५६<br><br>यदि शुश्रूषितो वह्निर्गुरुशुश्रूषणादनु।<br>व्रतानि वा सुचीर्णानि सप्तार्चिः पातु मां ततः॥ ५७<br><br>न मातरं न पितरं गौरवेण यथा गुरुम्।<br>सर्वदैवावगच्छामि तथा मां पातु पावकः॥ ५८<br><br>यथा गुरुं न मनसा कर्मणा वचसाऽपि वा।<br>अवजानाम्यहं तेन पातु सत्येन पावकः॥ ५९<br><br>इत्येवं मनसा सत्यान् कुर्वतः शपथान् पुनः।<br>सप्तार्चिषा समादिष्टा प्रादुरासीत् सरस्वती॥ ६०<br><br>सा प्रोवाच द्विजसुतं राक्षसग्रहणाकुलम्।<br>मा भैर्द्विजसुताहं त्वां मोक्षयिष्यामि संकटात्॥ ६१<br><br>यदस्य रक्षसः श्रेयो जिह्वाग्रे संस्थिता तव।<br>तत् सर्वं कथयिष्यामि ततो मोक्षमवाप्स्यसि॥ ६२<br><br>अदृश्या रक्षसा तेन प्रोक्त्वेत्थं सा सरस्वती।<br>अदर्शनं गता सोऽपि द्विजः प्राह निशाचरम्॥ ६३ | बहुत समयतक विचार करनेके पश्चात् अत्यन्त संशययुक्त ब्राह्मण ज्ञानदानके हेतु अग्निके पास गया। (उसने कहा—) अग्निदेव! गुरुकी सेवा करनेके बाद यदि मैंने आपकी सेवा की हो तथा व्रतोंका अच्छी तरह पालन किया हो तो हे सप्तार्चि! आप मेरी रक्षा करें। अग्निदेव! यदि मैंने गौरवमें माता-पितासे गुरुको अधिक महत्त्व दिया हो तो आप मेरी रक्षा करें। यदि मन, कर्म एवं वाणीसे भी मैंने गुरुका अनादर न किया हो तो उस सत्यके कारण अग्निदेव आप मेरी रक्षा करें। इस प्रकार मनसे सत्य शपथोंके लेनेवाले उसके सामने अग्निदेवके आदेशसे सरस्वती प्रकट हुईं। उन्होंने राक्षसके द्वारा पकड़े जानेके कारण व्याकुल हुए ब्राह्मणके पुत्रसे कहा—ब्राह्मणपुत्र! डरो मत। मैं तुम्हें संकटसे मुक्त करूँगी। तुम्हारी जीभके अग्रभागपर स्थित होकर मैं राक्षसके कल्याणकारी समस्त विषयोंका कथन करूँगी। उसके बाद तुम मुक्त हो जाओगे। उस राक्षससे अदृश्य रहती हुई सरस्वती ऐसा कहनेके बाद अन्तर्धान हो गयी। उस ब्राह्मणने निशाचरसे (सरस्वतीकी शक्तिसे) कहा—॥ ५५—६३॥ | | ब्राह्मण उवाच<br>श्रूयतां तव यच्छ्रेयस्तथाऽन्येषां च पापिनाम्।<br>समस्तपापशुद्ध्यर्थं पुण्योपचयदं च यत्॥ ६४ | ब्राह्मणने कहा—(निशाचर!) सुनो! तुम्हारे और दूसरे अन्य पापियोंके लिये कल्याणकर सारे पापोंकी शुद्धि एवं पुण्य बढ़ानेवाले तत्त्वोंको मैं कहता हूँ। | | प्रातरुत्थाय जप्तव्यं मध्याह्नेऽह्नःक्षयेऽपि वा।<br>असंशयं सदा जप्यो जपतां पुष्टिशान्तिदः॥ ६५ | प्रातःकाल उठकर, मध्याह्नमें अथवा सायंकाल इस जपने योग्य स्तोत्रका सदा जप करना चाहिये। यह जप जप करनेवालेको निःसंदेह शान्ति एवं पुष्टि प्रदान करता है। | | ॐ हरिं कृष्णं हृषीकेशं वासुदेवं जनार्दनम्।<br>प्रणतोऽस्मि जगन्नाथं स मे पापं व्यपोहतु॥ ६६ | ॐ, हरि, कृष्ण, हृषीकेश, वासुदेव, जनार्दन, जगन्नाथको मैं प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापको दूर करें। | | चराचरगुरुं नाथं गोविन्दं शेषशायिनम्।<br>प्रणतोऽस्मि परं देवं स मे पापं व्यपोहतु॥ ६७ | चर और अचरके गुरु, नाथ, शेषशय्यापर विराजमान, परमदेव गोविन्दको मैं प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापको दूर करें। | | शङ्खिनं चक्रिणं शार्ङ्गधारिणं स्रग्धरं परम्।<br>प्रणतोऽस्मि पतिं लक्ष्म्याः स मे पापं व्यपोहतु॥ ६८ | शङ्ख धारण करनेवाले, चक्र धारण करनेवाले, शार्ङ्ग धारण करनेवाले एवं उत्तम मालाधारी, लक्ष्मीपतिको मैं प्रणाम करता हूँ। वे मेरे |

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