वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४२२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८५ |
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| गुर्वर्थमेतदागत्य यत्फल Tow...<br>गुर्वर्थमेतदागत्य यत्फलग्रहणं कृतम्।<br>ममात्र निष्ठा प्राप्तस्य फलानि विनिवेदितुम्॥ ४५<br><br>स त्वं मुहूर्तमात्रं मामत्रैव प्रतिपालय।<br>निवेद्य गुरवे यावदिहागच्छाम्यहं फलम्॥ ४६ | करके अभी आ जाता हूँ। यहाँ आकर गुरुके लिये मैंने जो फल एकत्र किये हैं, उन्हें गुरुको समर्पित करनेके लिये मेरी अत्यन्त श्रद्धा है। अतः तुम यहाँ मुहूर्तमात्र मेरी प्रतीक्षा करो, जबतक कि मैं इन फलोंको गुरुको देकर लौट आता हूँ॥ ४४-४६॥ | | राक्षस उवाच<br>षष्ठे काले न मे ब्रह्मन् कश्चिद् ग्रहणमागतः।<br>प्रतिमुच्येत देवोऽपि इति मे पापजीविका॥ ४७<br>एक एवात्र मोक्षस्य तव हेतुः शृणुष्व तत्।<br>मुञ्चाम्यहमसंदिग्धं यदि तत् कुरुते भवान्॥ ४८ | **राक्षसने कहा—**ब्रह्मन्! छठे समयमें मेरे पंजेमें आया हुआ कोई देवता भी छूट नहीं सकता। यही मेरी पापजीविका है। तुम्हारे छूटनेका एक ही उपाय है, उसे सुनो। यदि तुम उसे करो तो निःसंदेह मैं तुमको छोड़ दूँगा॥ ४७-४८॥ | | ब्राह्मण उवाच<br>गुरोर्यन्न विरोधाय यन्न धर्मोपरोधकम्।<br>तत् करिष्याम्यहं रक्षो यन्न व्रतहरं मम॥ ४९ | **ब्राह्मणने कहा—**राक्षस! यदि वह कार्य गुरुकी सेवाकार्यमें विरोध डालनेवाला, धर्मके विषयमें बाधा डालनेवाला एवं मेरे व्रतको नष्ट करनेवाला न होगा तो मैं उसे करूँगा केवल तुमसे अपने छुटकारेके लिये नहीं॥ ४९॥ | | राक्षस उवाच<br>मया निसर्गतो ब्रह्मन् जातिदोषाद् विशेषतः।<br>निर्विवेकेन चित्तेन पापकर्म सदा कृतम्॥ ५०<br><br>आबाल्यान्मम पापेषु न धर्मेषु रतं मनः।<br>तत्पापसंक्षयान्मोक्षं प्राप्नुयां येन तद् वद॥ ५१<br><br>यानि पापानि कर्माणि बालत्वाच्चरितानि च।<br>दुष्टां योनिमिमां प्राप्य तन्मुक्तिं कथय द्विज॥ ५२<br><br>यद्येतद् द्विजपुत्र त्वं समाख्यास्यस्यशेषतः।<br>ततः क्षुधार्तान्मत्तस्त्वं नियतं मोक्षमाप्स्यसि॥ ५३<br><br>न चेत् तत्पापशीलोऽहमत्यर्थं क्षुत्पिपासितः।<br>षष्ठे काले नृशंसात्मा भक्षयिष्यामि निर्घृणः॥ ५४ | **राक्षसने कहा—**ब्रह्मन्! मैंने स्वभावतः तथा विशेषतः जातिदोषके कारण और विचारशक्तिसे रहित मनके कारण सदा पापका कार्य किया है। बाल्यावस्थासे ही मेरा मन धर्ममें नहीं, अपितु पापमें आसक्त रहा है। इसलिये तुम वह उपाय बताओ जिससे पापका नाश होकर मेरी मुक्ति हो जाय। द्विज! इस पापयोनिको पाकर अज्ञानवश मैंने जिन पापकर्मोंका आचरण किया है, उनसे छुटकारा पानेका उपाय बतलाओ। ब्राह्मणपुत्र! यदि तुम मुझे यह भलीभाँति बतलाओ तो मुझ भूखसे पीड़ित हुएसे निःसंदेह छुटकारा पा जाओगे। यदि ऐसा नहीं हुआ तो अत्यन्त भूखा-प्यासा निर्दय हुआ मैं छठे समयमें (प्राप्त हुए) तुमको खा जाऊँगा॥ ५०-५४॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>एवमुक्तो मुनिसुतस्तेन घोरेण रक्षसा।<br>चिन्तामवाप महतीमशक्तस्तदुदीरणे॥ ५५ | **पुलस्त्यजी बोले—**उस भयंकर राक्षसके इस प्रकार कहनेपर मुनिपुत्र (राक्षसकी पापसे मुक्तिका उपाय) कहनेमें असमर्थ होनेसे बहुत चिन्तित हुआ। |