भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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४०८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ८३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत्र स्वयम्भुवं देवं ददर्शासुरसत्तमः।<br>तमभ्यर्च्य महातेजाः पुष्करारण्यमागमत्॥ ३२<br>तेषु त्रिष्वपि तीर्थेषु स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः।<br>पुष्कराक्षमयोगन्धिं ब्रह्माणं चाप्यपूजयत्॥ ३३<br>ततो भूयः सरस्वत्यास्तीर्थे त्रैलोक्यविश्रुते।<br>कोटितीर्थे रुद्रकोटिं ददर्श वृषभध्वजम्॥ ३४महातेजस्वी असुरोत्तम प्रह्लाद वहाँ स्वयम्भू देवका दर्शन एवं पूजनकर पुष्करारण्यमें गये। उन तीनों तीर्थोंमें स्नान करनेके बाद पितरों एवं देवोंका पूजन कर उन्होंने अयोगन्धि, पुष्कराक्ष तथा ब्रह्माका अर्चन किया। उसके बाद उन्होंने कोटितीर्थमें सरस्वतीके तटपर स्थित लोकविख्यात रुद्रकोटि वृषभध्वजका दर्शन किया॥ ३०-३४॥
नैमिषेया द्विजवरा मागधेयाः ससैन्धवाः।<br>धर्मारण्याः पौष्करेया दण्डकारण्यकास्तथा॥ ३५<br>चाम्पेया भारुकच्छेया देविकातीरगाश्च ये।<br>ते तत्र शङ्करं द्रष्टुं समायाता द्विजातयः॥ ३६<br>कोटिसंख्यास्तपःसिद्धा हरदर्शनलालसाः।<br>अहं पूर्वमहं पूर्वमित्येवं वादिनो मुने॥ ३७<br>तान् संक्षुब्धान् हरो दृष्ट्वा महर्षीन् दग्धकिल्बिषान्।<br>तेषामेवानुकम्पार्थं कोटिमूर्तिरभूद् भवः॥ ३८(कथा है कि प्राचीन समयमें) नैमिषारण्य, मगध, सिन्धुप्रदेश, धर्मारण्य, पुष्कर, दण्डकारण्य, चम्पा, भरुकच्छ एवं देविकाके तटपर रहनेवाले श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ शंकरका दर्शन करने आये थे। मुने! शिवके दर्शनकी इच्छावाले करोड़ों सिद्ध तपस्वी 'मैं पहले दर्शन करूँगा', 'मैं पहले दर्शन करूँगा' इस प्रकारका विवाद करने लगे। उन निष्पाप महर्षियोंको विशेष अधीर हुआ देखकर शंकरने उनपर कृपाकर करोड़ों मूर्तियाँ धारण कर लीं॥ ३५-३८॥
ततस्ते मुनयः प्रीताः सर्व एव महेश्वरम्।<br>सम्पूजयन्तस्तस्थुर्वै तीर्थं कृत्वा पृथक् पृथक्।<br>इत्येवं रुद्रकोटीति नाम्ना शम्भुरजायत॥ ३९<br>तं ददर्श महातेजाः प्रह्लादो भक्तिमान् वशी।<br>कोटितीर्थे ततः स्नात्वा तर्पयित्वा वसून् पितॄन्।<br>रुद्रकोटिं समभ्यर्च्य जगाम कुरुजाङ्गलम्॥ ४०<br>तत्र देववरं स्थाणुं शङ्करं पार्वतीप्रियम्।<br>सरस्वतीजले मग्नं ददर्श सुरपूजितम्॥ ४१<br>सारस्वतेऽम्भसि स्नात्वा स्थाणुं सम्पूज्य भक्तितः।<br>स्नात्वा दशाश्वमेधे च सम्पूज्य च सुरान् पितॄन्॥ ४२उसके बाद वे सभी मुनि हर्षपूर्वक अलग-अलग तीर्थ बनाकर महेश्वरकी पूजा करते हुए निवास करने लगे। इस प्रकार शम्भुका नाम रुद्रकोटि हुआ। महातेजस्वी श्रद्धालु जितेन्द्रिय प्रह्लादने उनका दर्शन किया एवं कोटितीर्थमें स्नानकर वसुओं तथा पितरोंका तर्पण किया। उसके बाद रुद्रकोटिका अर्चनकर वे कुरुजाङ्गलमें चले गये। उन्होंने वहाँ सरस्वतीके जलमें निमग्न हुए देवताओंसे पूजित स्थाणु-पार्वतीपति भगवान् शंकरका दर्शन किया। सरस्वतीके जलमें स्नानकर उन्होंने श्रद्धापूर्वक स्थाणुकी पूजा की तथा दशाश्वमेधमें स्नानकर देवों एवं पितरोंका अर्चन किया॥ ३९-४२॥
सहस्रलिङ्गं सम्पूज्य स्नात्वा कन्याह्रदे शुचिः।<br>अभिवाद्य गुरुं शुक्रं सोमतीर्थं जगाम ह॥ ४३<br>तत्र स्नात्वाऽर्च्य च पितॄन् सोमं सम्पूज्य भक्तितः।<br>क्षीरिकावासमभ्येत्य स्नानं चक्रे महायशाः॥ ४४<br>प्रदक्षिणीकृत्य तरुं वरुणं चार्च्य बुद्धिमान्।<br>भूयः कुरुध्वजं दृष्ट्वा पद्माख्यां नगरीं गतः॥ ४५<br>तत्रार्च्य मित्रावरुणौ भास्करौ लोकपूजितौ।<br>कुमारधारामभ्येत्य ददर्श स्वामिनं वशी॥ ४६कन्याह्रदमें स्नान करनेके बाद पवित्र होकर उन्होंने सहस्रलिङ्गका अर्चन किया। इसके बाद (शुक्रतीर्थमें) गुरु शुक्राचार्यको प्रणामकर वे सोमतीर्थ चले गये। वहाँ स्नान करनेके बाद श्रद्धापूर्वक पितरों एवं सोमका अर्चन करके उन महायशस्वीने क्षीरिकावासमें जाकर स्नान किया। वहाँके वृक्षकी प्रदक्षिणाकर तथा वरुणकी पूजा करनेके पश्चात् बुद्धिमान् प्रह्लाद फिर कुरुध्वजका दर्शनकर पद्मा नामकी नगरीमें चले गये। वहाँ लोकपूजित तेजस्वी मित्रावरुणका पूजन करनेके बाद कुमारधारामें जाकर जितेन्द्रिय प्रह्लादने स्वामी कार्तिकेयका दर्शन किया।