भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 419, कुल 489 में से

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पृष्ठ 419

| अध्याय ८३ ] | प्रह्लादकी अनुक्रमागत तीर्थ-यात्रामें अनेक तीर्थोंका महत्त्व | ४०९ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्नात्वा कपिलधारायां संतर्प्यार्च्च पितॄन् सुरान्।<br>दृष्ट्वा स्कन्दं समभ्यर्च्य नर्मदायां जगाम ह॥ ४७<br>तस्यां स्नात्वा समभ्यर्च्य वासुदेवं श्रियः पतिम्।<br>जगाम भूधरं द्रष्टुं वाराहं चक्रधारिणम्॥ ४८कपिलधारामें स्नान करके पितृतर्पण, देवपूजन एवं स्कन्दका दर्शन तथा अर्चन कर वे नर्मदाके निकट गये। उसमें स्नान करके लक्ष्मीपति वासुदेवकी अर्चना कर वे चक्र धारण करनेवाले भूधर वाराहदेवका दर्शन करने गये॥ ४७-४८॥
स्नात्वा कोकामुखे तीर्थे सम्पूज्य धरणीधरम्।<br>त्रिसौवर्णं महादेवमर्बुदेशं जगाम ह॥ ४९<br>तत्र नारीह्रदे स्नात्वा पूजयित्वा च शङ्करम्।<br>कालिञ्जरं समभेत्य नीलकण्ठं ददर्श सः॥ ५०<br>नीलतीर्थजले स्नात्वा पूजयित्वा ततः शिवम्।<br>जगाम सागरानूपे प्रभासे द्रष्टुमीश्वरम्॥ ५१<br>स्नात्वा च संगमे नद्याः सरस्वत्यार्णवस्य च।<br>सोमेश्वरं लोकपतिं ददर्श स कपर्दिनम्॥ ५२<br>यो दक्षशापनिर्दिग्धः क्षयी ताराधिपः शशी।<br>आप्यायितः शङ्करेण विष्णुना सकपर्दिना॥ ५३वे कोकामुखतीर्थमें स्नान और धरणीधरकी पूजा करके अर्बुददेशमें त्रिसौवर्ण महादेवके पास गये। वहाँ उन्होंने नारीह्रदमें स्नान और शंकरकी अर्चना करनेके बाद कालिंजरमें आकर नीलकण्ठका दर्शन किया। नीलतीर्थके जलमें स्नान करनेके बाद शिवका पूजन कर वे समुद्रके तटपर प्रभासतीर्थमें भगवान्‌का दर्शन करने गये। वहाँ उन्होंने सरस्वती नदी और सागरके संगममें स्नानकर लोकपति कपर्दी सोमेश्वरका दर्शन किया। कपर्दी शंकर एवं विष्णुने दक्षके शापसे दग्ध हुए एवं क्षयरोगसे ग्रसित ताराधिप चन्द्रमाको पूर्ण किया था॥ ४९-५३॥
तावर्च्य देवप्रवरौ प्रजगाम महालयम्।<br>तत्र रुद्रं समभ्यर्च्य प्रजगामोत्तरान् कुरून्॥ ५४<br>पद्मनाभं स तत्रार्च्य सप्तगोदावरं ययौ।<br>तत्र स्नात्वाऽर्च्य विश्वेशं भीमं त्रैलोक्यवन्दितम्॥ ५५<br>गत्वा दारुवने श्रीमान् लिङ्गं स ददर्श ह।<br>तमर्च्य ब्राह्मणीं गत्वा स्नात्वाऽर्च्य त्रिदशेश्वरम्॥ ५६<br>प्लक्षावतरणं गत्वा श्रीनिवासमपूजयत्।<br>ततश्च कुण्डिनं गत्वा सम्पूज्य प्राणतृप्तिदम्॥ ५७<br>शूर्पारके चतुर्बाहुं पूजयित्वा विधानतः।<br>मागधारण्यमासाद्य ददर्श वसुधाधिपम्॥ ५८<br>तमर्चयित्वा विश्वेशं स जगाम प्रजामुखम्।<br>महातीर्थे ततः स्नात्वा वासुदेवं प्रणम्य च॥ ५९<br>शोणं सम्प्राप्य सम्पूज्य रुक्मवर्माणमीश्वरम्।<br>महाकोश्यां महादेवं हंसाख्यं भक्तिमानथ॥ ६०<br>पूजयित्वा जगामाथ सैन्धवारण्यमुत्तमम्।<br>तत्रेश्वरं सुनेत्राख्यं शङ्खशूलधरं गुरुम्।<br>पूजयित्वा महाबाहुः प्रजगाम त्रिविष्टपम्॥ ६१उन दोनों श्रेष्ठ देवोंका पूजनकर वे महालय गये; वहाँ रुद्रका पूजन कर वे उत्तरकुरु गये। वहाँ पद्मनाभका अर्चन कर वे सप्तगोदावरतीर्थमें गये। वहाँ स्नान करनेके बाद उन्होंने तीनों लोकोंसे वन्दित भीमविश्वेश्वरका पूजन किया। दारुवनमें जाकर श्रीमान् प्रह्लादने लिङ्गका दर्शन किया। उनकी पूजा करनेके पश्चात् ब्राह्मणी (नदी)-में जाकर उन्होंने स्नान और त्रिदशेश्वर महादेवकी अर्चना की। उसके बाद प्लक्षावतरणमें जाकर उन्होंने श्रीनिवासकी अर्चना की। फिर कुण्डिनमें जाकर प्राणोंके तृप्तिदाता देवका अर्चन किया। उन्होंने शूर्पारकममें चतुर्भुज देवकी भलीभाँति पूजा करनेके बाद मागधारण्यमें जाकर वसुधाधिपका दर्शन किया। उन विश्वेशका पूजन कर वे प्रजामुखमें गये। उसके बाद उन्होंने महातीर्थमें स्नानकर वासुदेवको प्रणाम किया। उन्होंने शोणतटपर जाकर स्वर्णकवच धारण करनेवाले ईश्वरका पूजन किया। उसके बाद श्रद्धालु (प्रह्लाद)-ने महाकोशीमें हंस नामक महादेवका अर्चन किया एवं श्रेष्ठ सैन्धवारण्यमें जाकर शङ्ख तथा शूल धारण करनेवाले सुनेत्र नामक पूज्य ईश्वरका पूजन किया। उसके बाद वे महाबाहु त्रिविष्टप चले गये॥ ५४-६१॥
तत्र देवं महेशानं जटाधरमिति श्रुतम्।<br>तं दृष्ट्वाऽर्च्य हरिं चासौ तीर्थं कनखलं ययौ॥ ६२वहाँ जटाधर नामसे प्रसिद्ध महेशान देवका दर्शन और विष्णुकी पूजा कर वे कनखलतीर्थमें गये।
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