भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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४९०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ८३
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत्राच्र्य भद्रकालीशं वीरभद्रं च दानवः।<br>धनाधिपं च मेघाङ्कं ययावथ गिरिव्रजम्॥ ६३<br>तत्र देवं पशुपतिं लोकनाथं महेश्वरम्।<br>सम्पूजयित्वा विधिवत्कामरूपं जगाम ह॥ ६४<br>शशिप्रभं देववरं त्रिनेत्रं सम्पूजयित्वा सह वै मृडान्या।<br>जगाम तीर्थप्रवरं महाख्यं तस्मिन् महादेवमपूजयत् सः॥ ६५दानव प्रह्लाद वहाँ भद्रकालीश और वीरभद्र तथा धनाधिप मेघाङ्ककी पूजा कर गिरिव्रज चले गये। वहाँ लोकनाथ महेश्वर पशुपति देवका विधिवत् अर्चन कर वे कामरूप चले गये। वहाँ चन्द्रकी कान्तिसे युक्त देवश्रेष्ठ त्रिनेत्र शंकरकी मृडानी (पार्वती)-के साथ विधिवत् अर्चना कर प्रह्लाद श्रेष्ठ महाख्यतीर्थमें गये और वहाँपर (भी) उन्होंने महादेवकी अर्चना की॥ ६२-६५॥
ततस्त्रिकूटं गिरिमत्रिपुत्रं जगाम द्रष्टुं स हि चक्रपाणिणम्।<br>तमीड्य भक्त्या तु गजेन्द्रमोक्षणं जजाप जप्यं परमं पवित्रम्॥ ६६<br>तत्रोष्य दैत्येश्वरसूनुरादरा-<br>न्मासत्रयं मूलफलाम्बुभक्षी।<br>निवेद्य विप्रप्रवरेषु काञ्चनं जगाम घोरं स हि दण्डकं वनम्॥ ६७<br>तत्र दिव्यं महाशाखं वनस्पतिवपुर्धरम्।<br>ददर्श पुण्डरीकाक्षं महाश्वापदवारणम्॥ ६८<br>तस्याधस्तात् त्रिरात्रं स महाभागवतोऽसुरः।<br>स्थितः स्थण्डिलशायी तु पठन् सारस्वतं स्तवम्॥ ६९उसके बाद वे अत्रिपुत्र चक्रपाणि विष्णुका दर्शन करनेके लिये त्रिकूटपर्वतपर चले गये और श्रद्धापूर्वक उनकी पूजा कर उन्होंने परम पवित्र जपनेयोग्य गजेन्द्रमोक्षणस्तवका पाठ किया। मूल, फल एवं जलका भक्षण करते हुए दैत्येश्वर-पुत्र प्रह्लादने वहाँ तीन मासतक श्रद्धापूर्वक निवास किया। उसके बाद श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सुवर्ण दान कर वे घोर दण्डकवन चले गये। वहाँ उन्होंने महान् हिंस्र पशुओंके निवारक, महान् शाखाओंसे युक्त वनस्पतिका शरीर धारण करनेवाले पुण्डरीकाक्षका दर्शन किया। सारस्वतस्तोत्रका पाठ करते हुए महान् विष्णुभक्त असुर प्रह्लादने तीन रातोंतक उसके नीचे बिना विस्तरके चबूतरेपर शयन किया॥ ६६-६९॥
तस्मात् तीर्थवरं विद्वान् सर्वपापप्रमोचनम्।<br>जगाम दानवो द्रष्टुं सर्वपापहरं हरिम्॥ ७०<br>तस्याग्रतो जजापासौ स्तवौ पापप्रणाशनौ।<br>यौ पुरा भगवान् प्राह क्रोडरूपी जनार्दनः॥ ७१<br>तस्मादथागाद् दैत्येन्द्रः शालग्रामं महाफलम्।<br>यत्र संनिहितो विष्णुश्चरेषु स्थावरेषु च॥ ७२<br>तत्र सर्वगतं विष्णुं मत्वा चक्रे रतिं बली।<br>पूजयन् भगवत्पादौ महाभागवतो मुने॥ ७३<br>इयं तवोक्ता मुनिसंघजुष्टा प्रह्लादतीर्थानुगतिः सुपुण्या।<br>यत्कीर्तनाच्छ्रवणात् स्पर्शनाच्च विमुक्तपापा मनुजा भवन्ति॥ ७४विद्वान् दानव (प्रह्लादजी) वहाँसे सर्वपापहारी हरिका दर्शन करनेके लिये सर्वपापनाशक श्रेष्ठ तीर्थमें चले गये। उन्होंने उनके सामने प्राचीन कालमें क्रोडरूपी जनार्दनसे कथित पापनाश करनेवाले दो स्तोत्रोंका पाठ किया। उसके बाद वे वहाँसे दैत्येन्द्र (प्रह्लाद) महाफलदायक शालग्रामतीर्थमें गये। वहाँ विष्णु समस्त चर और स्थावर पदार्थोंमें विराजमान हैं। (पुलस्त्यजी कहते हैं—) मुने! वहाँ महान् विष्णुभक्त बलवान् प्रह्लाद विष्णुको सर्वव्यापी जानकर भगवान्‌के चरणोंकी पूजा करते हुए उन (-की भक्ति)-में परायण हो गये। मैंने तुमसे मुनियोंके समूहोंसे सेवित अत्यन्त पवित्र प्रह्लादकी तीर्थयात्राका वर्णन कर दिया, जिसके कीर्तन, श्रवण एवं स्पर्शसे मनुष्य निष्पाप हो जाते हैं॥ ७०-७४॥
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॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तिरासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८३॥


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