वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
पृष्ठ 430, कुल 489 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 430
४२० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ८५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पृष्ठे पुरस्तादथ दक्षिणोत्तरे<br>विकोणतश्चास्तु जनार्दनो हरिः।<br>तमीड्यमीशानमनन्तमच्युतं<br>जनार्दनं प्रणिपतितो न सीदति॥ २० | सबलता प्राप्त हो। जनार्दन हरि मेरे पीछे, आगे, दायें, बायें एवं दिशाओंके कोणों (अग्निकोण, नैर्ऋत्यकोण, वायव्यकोण, ईशानकोण)-में स्थित रहें। स्तुतियोग्य उन ईशान, अनन्त, अच्युत जनार्दनको साष्टाङ्ग प्रणिपात करनेवाला मनुष्य दुःखी नहीं होता॥ १७—२०॥ |
| यथा परं ब्रह्म हरिस्तथा परं<br>जगत्स्वरूपश्च स एव केशवः।<br>ऋतेन तेनाच्युतनामकीर्तनात्<br>प्रणाशमेतु त्रिविधं ममाशुभम्॥ २१<br>इत्यासावात्मरक्षार्थं कृत्वा वै विष्णुपञ्जरम्।<br>संस्थितोऽसावपि बली राक्षसः समुपाद्रवत्॥ २२<br>ततो द्विजनियुक्तायां रक्षायां रजनीचरः।<br>निर्धूतवेगः सहसा तस्थौ मासचतुष्टयम्॥ २३<br>यावद् द्विजस्य देवर्षे समाप्तिर्वै समाधितः।<br>जाते जप्यावसानेऽसौ तं ददर्श निशाचरम्॥ २४<br>दीनं हतबलोत्साहं कान्दिशीकं हतौजसम्।<br>तं दृष्ट्वा कृपयाविष्टः समाश्वास्य निशाचरम्॥ २५<br>पप्रच्छागमने हेतुं स चाचष्ट यथातथम्।<br>स्वभावमात्मनो द्रष्टुं रक्षया तेजसः क्षितिम्॥ २६<br>कथयित्वा च तद्रक्षः कारणं विविधं ततः।<br>प्रसीदेत्यब्रवीद् विप्रं निर्विण्णः स्वेन कर्मणा॥ २७ | जैसे ब्रह्म श्रेष्ठ है उसी प्रकार हरि भी श्रेष्ठ हैं। वे केशव ही जगत्के (नित्य) स्वरूप हैं। अच्युतभगवान्के नाम-कीर्तनके उस सत्यद्वारा मेरे तीनों प्रकारके अमङ्गल नष्ट हो जायँ। इस प्रकार अपनी रक्षाके लिये विष्णुपञ्जरस्तोत्रका पाठकर वे खड़े थे। वह बलवान् राक्षस उनकी ओर दौड़ा। देवर्षे! उसके बाद द्विजद्वारा रक्षाकी व्यवस्था रहनेपर वह राक्षस गतिहीन होकर चार मासतक, जबतक कि ब्राह्मणकी समाधि समाप्त नहीं हुई तबतक, रुका रहा। जप समाप्त होनेपर उन्होंने उस निशाचरको देखा। उन्होंने दीन, बलसे हीन, उत्साहसे रहित, भयसे आकुल तथा निस्तेज हुए उस निशाचरको देखकर दयापूर्वक उसे निर्भयता प्रदान कर दी तथा उसके आनेका कारण पूछा। उसने अपने यथार्थ स्वभाववश देखनेकी इच्छा एवं आनेपर तेजका नाश होना बताया। उसके बाद दूसरे और भी बहुत-से कारणोंका वर्णन कर अपने कर्मसे दुखी हुए उस राक्षसने ब्राह्मणसे कहा—आप प्रसन्न हो जायँ॥ २१—२७॥ |
| बहूनि पापानि मया कृतानि बहवो हताः।<br>कृताः स्त्रियो मया बह्व्यो विधवाः पुत्रवर्जिताः।<br>अनागसां च सत्त्वानामल्पकानां क्षयः कृतः॥ २८<br>तस्मात् पापादहं मोक्षमिच्छामि त्वत्प्रसादतः।<br>पापप्रशमनायालं कुरु मे धर्मदेशनम्॥ २९<br>पापस्यास्य क्षयकरमुपदेशं प्रयच्छ मे।<br>तस्य तद् वचनं श्रुत्वा राक्षसस्य द्विजोत्तमः॥ ३०<br>वचनं प्राह धर्मात्मा हेतुमच्च सुभाषितम्।<br>कथं क्रूरस्वभावस्य सतस्तव निशाचर।<br>सहसैव समायाता जिज्ञासा धर्मवर्त्मनि॥ ३१ | मैंने बहुत पाप किये हैं। मैंने बहुत-से मनुष्योंको मारा है। मैंने बहुत-सी स्त्रियोंको विधवा एवं पुत्रसे हीन कर दिया है तथा निर्दोष और निर्बल प्राणियोंका विनाश किया है। आपकी दयासे मैं उन पापोंसे मुक्त होना चाहता हूँ; अतः आप मुझे पापोंका नाश करनेवाले धर्माचरणका उपदेश दें। आप मुझे इस पापको नष्ट करनेवाला उपदेश प्रदान करें। उस राक्षसके उस वचनको सुनकर धर्मात्मा द्विजोत्तमने युक्तियुक्त मधुर वचन कहा—निशाचर! क्रूर स्वभावके होते हुए भी एकाएक धर्मके मार्गमें तुम्हारी जिज्ञासा कैसे उत्पन्न हुई?॥ २८—३१॥ |
| राक्षस उवाच<br>त्वां वै समागतोऽस्म्यद्य क्षिप्तोऽहं रक्षया बलात्।<br>तव संसर्गतो ब्रह्मन् जातो निर्वेद उत्तमः॥ ३२ | राक्षसने कहा— मैं आज आपके निकट आते ही बलपूर्वक रक्षाद्वारा फेंक दिया गया। ब्रह्मन्! आपके सम्पर्कसे मुझे श्रेष्ठ वैराग्य प्राप्त हो गया। |