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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

अध्याय ८६ ] स्तोत्रोंके क्रममें पुलस्त्यजीद्वारा उपदिष्ट महेश्वर-कथित पापप्रशमनस्तोत्र ४२७

हुताशनेन प्रहिता मम जिह्वाग्रसंस्थिता।<br>जगादैनं स्तवं विष्णोः सर्वेषां चोपशान्तिदम्॥ ११३<br><br>अनेनैव जगन्नाथं त्वमाराधय केशवम्।<br>ततः शापापनोदं तु स्तुते लप्स्यसि केशवे॥ ११४<br><br>अहर्निशं हृषीकेशं स्तवेनानेन राक्षस।<br>स्तुहि भक्तिं दृढां कृत्वा ततः पापाद् विमोक्ष्यसे॥ ११५<br><br>स्तुतो हि सर्वपापानि नाशयिष्यत्यसंशयम्।<br>स्तुतो हि भक्त्या नृणां वै सर्वपापहरो हरिः॥ ११६<br><br>पुलस्त्य उवाच<br>ततः प्रणम्य तं विप्रं प्रसाद्य स निशाचरः।<br>तदैव तपसे श्रीमान् शालग्राममगाद् वशी॥ ११७<br><br>अहर्निशं स एवैनं जपन् सारस्वतं स्तवम्।<br>देवक्रियारतिर्भूत्वा तपस्तेपे निशाचरः॥ ११८<br><br>समाराध्य जगन्नाथं स तत्र पुरुषोत्तमम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकमवाप्तवान्॥ ११९<br><br>एतत्ते कथितं ब्रह्मन् विष्णोः सारस्वतं स्तवम्।<br>विप्रवक्त्रस्थया सम्यक् सरस्वत्या समीरिमितम्॥ १२०<br><br>य एतत् परमं स्तोत्रं वासुदेवस्य मानवः।<br>पठिष्यति स सर्वेभ्यः पापेभ्यो मोक्षमाप्स्यति॥ १२१उसे मैंने तुमसे कह दिया। अग्निदेवसे भेजी गयी एवं मेरी जिह्वाके अग्रभागमें स्थित सरस्वतींने सभीको शान्ति देनेवाले इस विष्णुस्तोत्रको कहा है। तुम इसीसे जगत्स्वामी केशवकी आराधना करो। उसके बाद केशवकी स्तुति करनेसे तुम शापसे मुक्त हो जाओगे। राक्षस! इस स्तुतिके द्वारा दृढ़ भक्तिपूर्वक दिन-रात हृषीकेशकी स्तुति करो। तब तुम पापसे मुक्त हो जाओगे। स्तुति किये गये हरि निःसंदेह समस्त पापोंको नष्ट करेंगे। भक्तिपूर्वक स्तुति करनेसे सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाले हरि मनुष्योंके सब पापोंका नाश कर देते हैं॥ ११२—११६॥<br><br>पुलस्त्यजी बोले—उसके बाद आत्मनिष्ठ वह राक्षस ब्राह्मणको प्रणाम एवं प्रसन्न करनेके पश्चात् उसी समय तपस्याके लिये शालग्राम नामक स्थानमें चला गया। वह राक्षस दिन-रात इसी सारस्वतस्तोत्रका जप करते हुए देवक्रियामें लीन होकर तप करने लगा। वहाँ पुरुषोत्तम जगन्नाथकी पूजा कर सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर उसने विष्णुलोक प्राप्त किया। ब्रह्मन्! मैंने तुमसे ब्राह्मणके मुखसे सरस्वतीद्वारा कहा गया विष्णुका यह सारस्वतस्तोत्र कहा। वासुदेवके इस श्रेष्ठ स्तोत्रको पढ़नेवाला मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जायगा॥ ११७—१२१॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८५॥


छियासीवाँ अध्याय

स्तोत्रोंके क्रममें पुलस्त्यजीद्वारा उपदिष्ट महेश्वर-कथित पापप्रशमनस्तोत्र

पुलस्त्य उवाच<br><br>नमस्तेऽस्तु जगन्नाथ देवदेव नमोऽस्तु ते।<br>वासुदेव नमस्तेऽस्तु बहुरूप नमोऽस्तु ते॥ १पुलस्त्यजी बोले—हे जगन्नाथ! आपको नमस्कार है। हे देवदेव! आपको नमस्कार है। हे वासुदेव! आपको नमस्कार है। हे अनन्त रूप धारण करनेवाले!
४२८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ८६
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एकशृङ्ग नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं वृषाकपे।<br>श्रीनिवास नमस्तेऽस्तु नमस्ते भूतभावन॥ २आपको नमस्कार है। हे एकशृङ्ग! आपको नमस्कार है। हे वृषाकपे! आपको नमस्कार है। हे श्रीनिवास! आपको नमस्कार है। हे भूतभावन! आपको नमस्कार है।
विष्वाक्सेन नमस्तुभ्यं नारायण नमोऽस्तु ते।<br>ध्रुवध्वज नमस्तेऽस्तु सत्यध्वज नमोऽस्तु ते॥ ३हे विष्वाक्सेन! आपको नमस्कार है। हे नारायण! आपको नमस्कार है। हे ध्रुवध्वज! आपको नमस्कार है। हे सत्यध्वज! आपको नमस्कार है। हे यज्ञध्वज!
यज्ञध्वज नमस्तुभ्यं धर्मध्वज नमोऽस्तु ते।<br>तालध्वज नमस्तेऽस्तु नमस्ते गरुडध्वज॥ ४आपको नमस्कार है। हे धर्मध्वज! आपको नमस्कार है। हे तालध्वज! आपको नमस्कार है। हे गरुडध्वज! आपको नमस्कार है। हे वरेण्य! हे विष्णो! हे वैकुण्ठ!
वरेण्य विष्णो वैकुण्ठ नमस्ते पुरुषोत्तम।<br>नमो जयन्त विजय जयानन्त पराजित॥ ५हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। हे जयन्त! हे विजय! हे जय! हे अनन्त! हे पराजित! आपको नमस्कार है। हे कृतावर्त! हे महावर्त! हे महादेव! आपको नमस्कार
कृतावर्त महावर्त महादेव नमोऽस्तु ते।<br>अनाद्याद्यन्त मध्यान्त नमस्ते पद्मजप्रिय॥ ६है। हे अनादि एवं आदि और अन्तमें विद्यमान! हे मध्यान्त! (मध्य और अन्तवाले) हे पद्मजप्रिय! आपको प्रणाम है। हे पुरञ्जय! आपको नमस्कार है।
पुरञ्जय नमस्तुभ्यं शत्रुञ्जय नमोऽस्तु ते।<br>शुभञ्जय नमस्तेऽस्तु नमस्तेऽस्तु धनञ्जय॥ ७हे शत्रुञ्जय! आपको प्रणाम है। हे शुभञ्जय! आपको प्रणाम है। हे धनञ्जय! आपको प्रणाम है। हे सृष्टिको अपनेमें सुरक्षित रखनेवाले हे सृष्टिगर्भ! श्रवणमात्रसे ही पवित्र कर देनेवाले हे शुचिश्रवः! आर्तजनोंकी पुकारको विशाल कर्णोंसे सुननेवाले हे पृथुश्रवः! आपको नमस्कार
सृष्टिगर्भ नमस्तुभ्यं शुचिश्रवः पृथुश्रवः।<br>नमो हिरण्यगर्भाय पद्मगर्भाय ते नमः॥ ८है। आप हिरण्यगर्भको नमस्कार है। आप पद्मगर्भको नमस्कार है॥ १—८॥
नमः कमलनेत्राय कालनेत्राय ते नमः।<br>कालनाभ नमस्तुभ्यं महानाभ नमो नमः॥ ९आप कमलनेत्रको प्रणाम है। आप कालनेत्रको प्रणाम है। हे कालनाभ! आपको प्रणाम है। हे महानाभ! आपको बारम्बार प्रणाम है। हे वृष्टिमूल!
वृष्टिमूल महामूल मूलावास नमोऽस्तु ते।<br>धर्मावास जलावास श्रीनिवास नमोऽस्तु ते॥ १०हे महामूल! हे मूलावास! आपको प्रणाम है। हे धर्मावास! हे जलावास! हे श्रीनिवास! आपको प्रणाम है।
धर्माध्यक्ष प्रजाध्यक्ष लोकाध्यक्ष नमो नमः।<br>सेनाध्यक्ष नमस्तुभ्यं कालाध्यक्ष नमोऽस्तु ते॥ ११हे धर्माध्यक्ष! हे प्रजाध्यक्ष! हे लोकाध्यक्ष! आपको बार-बार प्रणाम है। हे सेनाध्यक्ष! आपको प्रणाम है। हे कालाध्यक्ष! आपको प्रणाम है।
गदाधर श्रुतिधर चक्रधारिन् श्रियोधर।<br>वनमालाधर हरे नमस्ते धरणीधर॥ १२हे गदाधर! हे श्रुतिधर! हे चक्रधर! हे श्रीधर! हे वनमाला और पृथ्वीको धारण करनेवाले हे हरे! आपको प्रणाम है।
आर्चिषेण महासेन नमस्तेऽस्तु पुरुष्टुत।<br>बहुकल्प महाकल्प नमस्ते कल्पनामुख॥ १३हे आर्चिषेण! हे महासेन! हे पुरुसे स्तुत! आपको प्रणाम है। हे बहुकल्प! हे महाकल्प! हे कल्पनामुख! आपको प्रणाम है।

| अध्याय ८६ ] | स्तोत्रोंके क्रममें पुलस्त्यजीद्वारा उपदिष्ट महेश्वर-कथित पापप्रशमनस्तोत्र | ४२९ | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सर्वात्मन् सर्वग विभो विरिञ्चे श्वेत केशव ।<br>नील रक्त महानील अनिरुद्ध नमोऽस्तु ते ॥ १४<br><br>द्वादशात्मक कालात्मन् सामात्मन् परमात्मक ।<br>व्योमकात्मक सुब्रह्मन् भूतात्मक नमोऽस्तु ते ॥ १५<br><br>हरिकेश महाकेश गुडाकेश नमोऽस्तु ते।<br>मुञ्जकेश हृषीकेश सर्वनाथ नमोऽस्तु ते ॥ १६हे सर्वात्मन्! हे सर्वग! हे विभो! हे विरिञ्चिन्! हे श्वेत! हे केशव! हे नील! हे रक्त! हे महानील! हे अनिरुद्ध! आपको नमस्कार है। हे द्वादशात्मक! हे कालात्मन्! हे सामात्मन्! हे परमात्मक! हे आकाशात्मक! हे सुब्रह्मन्! हे भूतात्मक! आपको प्रणाम है। हे हरिकेश! हे महाकेश! हे गुडाकेश! आपको प्रणाम है। हे मुञ्जकेश! हे हृषीकेश! हे सर्वनाथ! आपको प्रणाम है॥ ९–१६॥
सूक्ष्म स्थूल महास्थूल महासूक्ष्म शुभङ्कर।<br>श्वेतपीताम्बरधर नीलवास नमोऽस्तु ते ॥ १७<br><br>कुशेशय नमस्तेऽस्तु पद्मेशय जलेशय।<br>गोविन्द प्रीतिकर्ता च हंस पीताम्बरप्रिय ॥ १८<br><br>अधोक्षज नमस्तुभ्यं सीरध्वज जनार्दन।<br>वामनाय नमस्तेऽस्तु नमस्ते मधुसूदन ॥ १९<br><br>सहस्रशीर्षाय नमो ब्रह्मशीर्षाय ते नमः।<br>नमः सहस्रनेत्राय सोमसूर्यानलेक्षण ॥ २०<br><br>नमश्चाथर्वशिरसे महाशीर्षाय ते नमः।<br>नमस्ते धर्मनेत्राय महानेत्राय ते नमः ॥ २१<br><br>नमः सहस्रपादाय सहस्रभुजमन्यवे।<br>नमो यज्ञवराहाय महारूपाय ते नमः ॥ २२<br><br>नमस्ते विश्वदेवाय विश्वात्मन् विश्वसम्भव ।<br>विश्वरूप नमस्तेऽस्तु त्वत्तो विश्वमभूदिदम् ॥ २३<br><br>न्यग्रोधस्त्वं महाशाखस्त्वं मूलकुसुमार्चितः।<br>स्कन्धपत्राङ्कुरलतापल्लवाय नमोऽस्तु ते ॥ २४हे सूक्ष्म! हे स्थूल! हे महास्थूल! हे महासूक्ष्म! हे शुभङ्कर! हे उज्ज्वल-पीले वस्त्रको धारण करनेवाले! हे नीलवास! आपको प्रणाम है। हे कुशपर शयन करनेवाले! हे पद्मपर शयन करनेवाले! हे जलमें शयन करनेवाले! हे गोविन्द! हे प्रीतिकर्ता! हे हंस! हे पीताम्बरप्रिय! आपको नमस्कार है। हे अधोक्षज! हे सीरध्वज! हे जनार्दन! आपको प्रणाम है। हे वामन! आपको प्रणाम है। हे मधुसूदन! आपको प्रणाम है। आप सहस्र सिरवालेको नमस्कार है। आप ब्रह्मशीर्षको प्रणाम है। आप सहस्रनेत्र और चन्द्र, सूर्य तथा अग्निरूपी आँखवालेको प्रणाम है। अथर्वशिराको नमस्कार है। महाशीर्षको प्रणाम है। धर्मनेत्रको प्रणाम है। महानेत्रको प्रणाम है। सहस्रपादको नमस्कार है। सहस्रों भुजाओं एवं सहस्रों यज्ञोंवालेको नमस्कार है। यज्ञवराहको नमस्कार है! आप महारूपको नमस्कार है। विश्वदेवको प्रणाम है। हे विश्वात्मन्! हे विश्वसम्भव! हे विश्वरूप! आपको नमस्कार है। आपसे यह विश्व उत्पन्न हुआ है। आप न्यग्रोध और महाशाख हैं, आप ही मूलकुसुमार्चित हैं। स्कन्ध, पत्र, अङ्कुर, लता एवं पल्लवस्वरूप आपको नमस्कार है॥ १७–२४॥
मूलं ते ब्राह्मणा ब्रह्मन् स्कन्धस्ते क्षत्रियाः प्रभो।<br>वैश्याः शाखा दलं शूद्रा वनस्पते नमोऽस्तु ते ॥ २५<br><br>ब्राह्मणाः साग्नयो वक्त्राः दोर्दण्डाः सायुधा नृपाः।<br>पार्श्वाद् विशश्चोरुयुगाज्जाताः शूद्राश्च पादतः ॥ २६<br><br>नेत्राद् भानुरभूत् तुभ्यं पद्भ्यां भूः श्रोत्रयोर्दिशः।<br>नाभ्या ह्यभूदन्तरिक्षं शशाङ्को मनसस्तव ॥ २७ब्रह्मन्! ब्राह्मण आपके मूल हैं। प्रभो! क्षत्रिय आपके स्कन्ध, वैश्य शाखा एवं शूद्र पत्ते हैं। वनस्पते! आपको नमस्कार है। अग्निसहित ब्राह्मण आपके मुख एवं शस्त्रसहित क्षत्रिय आपकी भुजाएँ हैं। वैश्य आपके दोनों जाँघोंके पार्श्वभागसे तथा शूद्र आपके चरणोंसे उत्पन्न हुए हैं। आपके नेत्रसे सूर्य उत्पन्न हुए हैं। आपके चरणोंसे पृथ्वी, कानोंसे दिशाएँ, नाभिसे अन्तरिक्ष तथा
४३०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ८६
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्राणाद् वायुः समभवत् कामाद् ब्रह्मा पितामहः।<br>क्रोधात् त्रिनयनो रुद्रः शीर्ष्णोः द्यौः समवर्तत ॥ २८<br><br>इन्द्राग्नी वदनात् तुभ्यं पशवो मलसम्भवाः।<br>ओषध्यो रोमसम्भूता विराजस्त्वं नमोऽस्तु ते ॥ २९<br><br>पुष्पहास नमस्तेऽस्तु महाहास नमोऽस्तु ते।<br>ॐकारस्त्वं वषट्कारो वौषट्त्वं च स्वधा सुधा ॥ ३०<br><br>स्वाहाकार नमस्तुभ्यं हन्तकार नमोऽस्तु ते।<br>सर्वाकार निराकार वेदाकार नमोऽस्तु ते ॥ ३१<br><br>त्वं हि वेदमयो देवः सर्वदेवमयस्तथा।<br>सर्वतीर्थमयश्चैव सर्वयज्ञमयस्तथा ॥ ३२मनसे चन्द्रमा उत्पन्न हुए हैं। आपके प्राणसे वायु, कामसे पितामह ब्रह्मा, क्रोधसे त्रिनेत्र रुद्र और सिरसे द्युलोक आविर्भूत हुए हैं। आपके मुखसे इन्द्र और अग्नि, मलसे पशु तथा रोमसे ओषधियाँ उत्पन्न हुईं। आप विराज हैं। आपको नमस्कार है। हे पुष्पहास! आपको प्रणाम है। हे महाहास! आपको प्रणाम है। आप ओङ्कार, वषट्कार और वौषट् हैं। आप स्वधा और सुधा हैं। हे स्वाहाकार! आपको प्रणाम है। हे हन्तकार! आपको प्रणाम है। हे सर्वाकार! हे निराकार! हे वेदाकार! आपको प्रणाम है। आप वेदमय देव तथा सर्वदेवमय हैं। आप सर्वतीर्थमय और सर्वयज्ञमय हैं॥ २५–३२ ॥
नमस्ते यज्ञपुरुष यज्ञभागभुजे नमः।<br>नमः सहस्रधाराय शतधाराय ते नमः ॥ ३३<br><br>भूर्भुवःस्वःस्वरूपाय गोदायामृतदायिने।<br>सुवर्णब्रह्मदात्रे च सर्वदात्रे च ते नमः ॥ ३४<br><br>ब्रह्मेशाय नमस्तुभ्यं ब्रह्मादे ब्रह्मरूपधृक्।<br>परब्रह्म नमस्तेऽस्तु शब्दब्रह्म नमोऽस्तु ते ॥ ३५<br><br>विद्यास्त्वं वेद्यरूपस्त्वं वेदनीयस्त्वमेव च।<br>बुद्धिस्त्वमपि बोध्यश्च बोधस्त्वं च नमोऽस्तु ते ॥ ३६<br><br>होता होमश्च हव्यं च हूयमानश्च हव्यवाट्।<br>पाता पोता च पूतश्च पावनीयश्च ॐ नमः ॥ ३७<br><br>हन्ता च हन्यमानश्च ह्रियमाणस्त्वमेव च।<br>हर्त्ता नेता च नीतिश्च पूज्योऽग्र्यो विश्वधार्यसि ॥ ३८<br><br>स्रुकस्रुवौ परधामासि कपालोलूखलोऽरणिः।<br>यज्ञपात्रारण्येस्त्वमेकधा बहुधा त्रिधा ॥ ३९<br><br>यज्ञस्त्वं यजमानस्त्वमीड्यस्त्वमसि याजकः।<br>ज्ञाता ज्ञेयस्तथा ज्ञानं ध्येयो ध्याताऽसि चेश्वर ॥ ४०<br><br>ध्यानयोगश्च योगी च गतिर्मोक्षो धृतिः सुखम्।<br>योगाङ्गानि त्वमीशानः सर्वगस्त्वं नमोऽस्तु ते ॥ ४१यज्ञपुरुष! आपको प्रणाम है। हे यज्ञभागके भोक्तः! आपको प्रणाम है। सहस्रधार और शतधारको प्रणाम है। भूर्भुवःस्वःस्वरूप, गोदाता, अमृतदाता, सुवर्ण और ब्रह्म (संसारके निमित्त और उपादान कारण आदि)-के भी जन्मदाता तथा सर्वदाता आपको प्रणाम है। आप ब्रह्मेशको नमस्कार है। हे ब्रह्मादि! हे ब्रह्मरूपधारिन्! हे परमब्रह्म! आपको प्रणाम है। हे शब्दब्रह्म! आपको प्रणाम है। आप ही विद्या, आप ही वेद्यरूप तथा आप ही जानने योग्य हैं। आप ही बुद्धि, बोध्य और बोधरूप हैं। आपको प्रणाम है। आप होता, होम, हव्य, हूयमान द्रव्य तथा हव्यवाट्, पाता, पोता, पूत तथा पावनीय ओङ्कार हैं। आपको नमस्कार है। आप हन्ता, हन्यमान, ह्रियमाण, हर्ता, नेता, नीति, पूज्य, श्रेष्ठ तथा संसारको धारण करनेवाले हैं। आप स्रुक्, स्रुव, परधाम, कपाली, उलूखल, अरणि, यज्ञपात्र, आरणेय, एकधा, त्रिधा और बहुधा हैं। आप यज्ञ हैं और आप यजमान हैं। आप स्तुत्य और याजक हैं। आप ज्ञाता, ज्ञेय, ज्ञान, ध्येय, ध्याता तथा ईश्वर हैं। आप ध्यानयोग, योगी, गति, मोक्ष, धृति, सुख, योगाङ्ग, ईशान एवं सर्वग हैं। आपको नमस्कार है॥ ३३–४१ ॥

अध्याय ८६ ] स्तोत्रोंके क्रममें पुलस्त्यजीद्वारा उपदिष्ट महेश्वर-कथित पापप्रशमनस्तोत्र [ ४३१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्रह्मा होता तथोद्गाता साम यूपोऽथ दक्षिणा।<br>दीक्षा त्वं त्वं पुरोडाशस्त्वं पशुः पशुवाह्यसि॥ ४२आप ब्रह्मा, होता, उद्गाता, साम, यूप, दक्षिणा तथा दीक्षा हैं। आप पुरोडाश एवं आप ही पशु तथा पशुवाही हैं।
गुह्यो धाता च परमः शिवो नारायणस्तथा।<br>महाजनो निरयनः सहस्रार्केन्दुरूपवान्॥ ४३आप गुह्य, धाता, परम, शिव, नारायण, महाजन, निराश्रय तथा हजारों सूर्य और चन्द्रमाके समान रूपवान् हैं।
द्वादशारोऽथ षण्णाभिस्त्रिव्यूहो द्वियुगस्तथा।<br>कालचक्रो भवानीशो नमस्ते पुरुषोत्तमः॥ ४४आप बारह अरों, छः नाभियों, तीन व्यूहों एवं दो युगोंवाले कालचक्र तथा ईश एवं पुरुषोत्तम हैं। आपको नमस्कार है।
पराक्रमो विक्रमस्त्वं हयग्रीवो हरीश्वरः।<br>नरेश्वरोऽथ ब्रह्मोशः सूर्येशस्त्वं नमोऽस्तु ते॥ ४५आप पराक्रम, विक्रम, हयग्रीव, हरीश्वर, नरेश्वर, ब्रह्मोश और सूर्येश हैं। आपको नमस्कार है।
अश्ववक्त्रो महामेधाः शम्भुः शक्रः प्रभञ्जनः।<br>मित्रावरुणमूर्तिस्त्वममूर्तिरनघः परः॥ ४६आप अश्ववक्त्र, महामेधा, शम्भु, शक्र, प्रभञ्जन, मित्रावरुणकी मूर्ति, अमूर्ति, निष्पाप और श्रेष्ठ हैं।
प्राग्वंशकायो भूतादिर्महाभूतोऽच्युतो द्विजः।<br>त्वमूर्ध्वकर्त्ता ऊर्ध्वश्च ऊर्ध्वरेता नमोऽस्तु ते॥ ४७आप प्राग्वंशकाय (मूलपुरुष), भूतादि, महाभूत, अच्युत और द्विज हैं। आप ऊर्ध्वकर्त्ता, ऊर्ध्व और ऊर्ध्वरेता हैं। आपको नमस्कार है।
महापातकहा त्वं च उपपातकहा तथा।<br>अनीशः सर्वपापेभ्यस्त्वामहं शरणं गतः॥ ४८आप महापातकोंका विनाश करनेवाले तथा उपपातकोंके नाशक हैं। आप सभी पापोंसे निर्लिप्त हैं। मैं आपकी शरणमें आया हूँ।
इत्येतत् परमं स्तोत्रं सर्वपापप्रमोचनम्।<br>महेश्वरेण कथितं वाराणस्यां पुरा मुने॥ ४९मुने! प्राचीन कालमें महेश्वरने सम्पूर्ण पापोंसे मुक्ति देनेवाले इस श्रेष्ठ स्तोत्रको वाराणसीमें कहा था।
केशवस्याग्रतो गत्वा स्नात्वा तीर्थे सितोदके।<br>उपशान्तस्तथा जातो रुद्रः पापवशात् ततः॥ ५०तीर्थके स्वच्छ जलमें स्नान कर केशवका दर्शन करनेसे रुद्र पापके प्रभावसे मुक्त एवं शान्त हुए थे।
एतत् पवित्रं त्रिपुरघ्नभाषितं<br>पठन् नरो विष्णुपरो महर्षे।<br>विमुक्तपापो ह्युपशान्तमूर्तिः<br>सम्पूज्यते देववरैः प्रसिद्धैः॥ ५१महर्षे! त्रिपुरारिके द्वारा कहे गये इस स्तोत्रका पाठ करनेसे विष्णुभक्त मनुष्य पापसे मुक्त और सौम्य होकर प्रसिद्ध तथा श्रेष्ठ देवताओंसे पूजित होता है॥ ४२-५१॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छियासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८६॥

४३२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ८७

सतासीवाँ अध्याय

अगस्त्यद्वारा कथित पापप्रशमनस्तोत्र

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुलस्त्य उवाच<br>द्वितीयं पापशमनं स्तवं वक्ष्यामि ते मुने।<br>येन सम्यगधीतेन पापं नाशं तु गच्छति॥ १<br><br>मत्स्यं नमस्ये देवेशं कूर्मं गोविन्दमेव च।<br>हयशीर्षं नमस्येऽहं भवं विष्णुं त्रिविक्रमम्॥ २<br><br>नमस्ये माधवेशानौ हृषीकेशकुमारिणौ।<br>नारायणं नमस्येऽहं नमस्ये गरुडासनम्॥ ३<br><br>ऊर्ध्वकेशं नृसिंहं च रूपधारं कुरुध्वजम्।<br>कामपालमखण्डं च नमस्ये ब्राह्मणप्रियम्॥ ४<br><br>अजितं विश्वकर्माणं पुण्डरीकं द्विजप्रियम्।<br>हंसं शम्भुं नमस्ये च ब्रह्माणं सप्रजापतिम्॥ ५<br><br>नमस्ये शूलबाहुं च देवं चक्रधरं तथा।<br>शिवं विष्णुं सुवर्णाक्षं गोपतिं पीतवाससम्॥ ६<br><br>नमस्ये च गदापाणिं नमस्ये च कुशेशयम्।<br>अर्धनारीश्वरं देवं नमस्ये पापनाशनम्॥ ७<br><br>गोपालं च सवैकुण्ठं नमस्ये चापराजितम्।<br>नमस्ये विश्वरूपं च सौगन्धिं सर्वदाशिवम्॥ ८**पुलस्त्यजी बोले—**मुने! अब मैं आपसे पापोंका निवारण करनेवाला दूसरा स्तोत्र कहूँगा; जिसका भलीभाँति अध्ययन (पाठ) करनेसे पाप विनष्ट हो जाता है। मैं मत्स्य एवं कच्छपका रूप धारण करनेवाले देवेश गोविन्दभगवान्‌को नमस्कार करता हूँ। मैं हयशीर्ष, भव और त्रिविक्रम विष्णुभगवान्‌को नमस्कार करता हूँ। मैं माधव, ईशान, हृषीकेश और कुमारको नमस्कार करता हूँ। मैं नारायणको नमस्कार करता हूँ। मैं गरुडासन भगवान्‌को नमस्कार करता हूँ। मैं ऊर्ध्वकेश तथा नरसिंहका रूप धारण करनेवाले एवं कुरुध्वज, कामपाल, अखण्ड और ब्राह्मणप्रिय देवको नमस्कार करता हूँ। मैं अजित, विश्वकर्मा, पुण्डरीक, द्विजप्रिय, हंस, शम्भु तथा प्रजापतिके सहित ब्रह्माको नमस्कार करता हूँ। मैं शूलबाहु, चक्रधरदेव, शिव, विष्णु, सुवर्णाक्ष और गोपति तथा पीतवासाको प्रणाम करता हूँ। मैं गदा धारण करनेवाले गदाधर भगवान्‌को नमस्कार करता हूँ और कुशेशयको नमस्कार करता हूँ। मैं पापका नाश करनेवाले अर्धनारीश्वर देवको नमस्कार करता हूँ। मैं वैकुण्ठसहित गोपाल तथा अपराजितको नमस्कार करता हूँ। मैं विश्वरूप, सौगन्धि और सदाशिवको प्रणाम करता हूँ॥ १—८॥
पाञ्चालिकं हयग्रीवं स्वयम्भुवममरेश्वरम्।<br>नमस्ये पुष्कराक्षं च पयोगन्धिं च केशवम्॥ ९मैं पाञ्चालिक, हयग्रीव, स्वयम्भुव, अमरेश्वर, पुष्कराक्ष, पयोगन्धि और केशवको नमस्कार करता हूँ।
अविमुक्तं च लोलं च ज्येष्ठेशं मध्यमं तथा।<br>उपशान्तं नमस्येऽहं मार्कण्डेयं सजम्बुकम्॥ १०मैं अविमुक्त, लोल, ज्येष्ठेश, मध्यम, उपशान्त तथा जम्बुकसहित मार्कण्डेयको नमस्कार करता हूँ।
नमस्ये पद्मकिरणं नमस्ये वडवामुखम्।<br>कार्तिकैयं नमस्येऽहं बाह्लीकं शिखिनं तथा॥ ११मैं पद्मकिरणको नमस्कार करता हूँ। मैं वडवामुखको नमस्कार करता हूँ। मैं कार्तिकेय, बाह्लीक तथा शिखीको प्रणाम करता हूँ।

अध्याय ८७ ] अगस्त्यद्वारा कथित पापप्रशमनस्तोत्र [ ४३३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नमस्ये स्थाणुमनघं नमस्ये वनमालिनम्।<br>नमस्ये लाङ्गलीशं च नमस्येऽहं श्रियः पतिम्॥ १२<br>नमस्ये च त्रिनयनं नमस्ये हव्यवाहनम्।<br>नमस्ये च त्रिसौवर्णं नमस्ये धरणीधरम्॥ १३<br>त्रिणाचिकेतं ब्रह्मेशं नमस्ये शशिभूषणम्।<br>कपर्दिनं नमस्ये च सर्वामयविनाशनम्॥ १४<br>नमस्ये शशिनं सूर्यं ध्रुवं रौद्रं महौजसम्।<br>पद्मनाभं हिरण्याक्षं नमस्ये स्कन्दमव्ययम्॥ १५<br>नमस्ये भीमर्हंसौ च नमस्ये हाटकेश्वरम्।<br>सदाहंसं नमस्ये च नमस्ये प्राणतर्पणम्॥ १६मैं स्थाणु एवं अनघको नमस्कार करता हूँ तथा वनमालीको नमस्कार करता हूँ। मैं लाङ्गलीश तथा लक्ष्मीपतिको नमस्कार करता हूँ। मैं त्रिनेत्रको प्रणाम करता हूँ तथा हव्यवाहनको नमस्कार करता हूँ। मैं त्रिसौवर्णको नमस्कार करता हूँ तथा धरणीधरको नमस्कार करता हूँ। मैं त्रिणाचिकेत, ब्रह्मेश तथा शशिभूषणको प्रणाम करता हूँ। मैं सम्पूर्ण रोगोंको नष्ट करनेवाले कपर्दीभगवान्‌को प्रणाम करता हूँ। मैं चन्द्र, सूर्य, ध्रुव तथा महान् ओजस्वी रुद्रभगवान्‌को प्रणाम करता हूँ। मैं पद्मनाभ, हिरण्याक्ष तथा अव्यय स्कन्दको प्रणाम करता हूँ। मैं भीम और हंसको प्रणाम करता हूँ। मैं हाटकेश्वरको प्रणाम करता हूँ। मैं सदाहंसको प्रणाम करता हूँ और प्राणोंको तृप्त करनेवालेको प्रणाम करता हूँ॥ ९—१६॥
नमस्ये रुक्मकवचं महायोगिनमीश्वरम्।<br>नमस्ये श्रीनिवासं च नमस्ये पुरुषोत्तमम्॥ १७<br>नमस्ये च चतुर्बाहुं नमस्ये वसुधाधिपम्।<br>वनस्पतिं पशुपतिं नमस्ये प्रभुमव्ययम्॥ १८<br>श्रीकण्ठं वासुदेवं नीलकण्ठं सदण्डिनम्।<br>नमस्ये सर्वमनघं गौरीशं नकुलीश्वरम्॥ १९<br>मनोहरं कृष्णकेशं नमस्ये चक्रपाणिनम्।<br>यशोधरं महाबाहुं नमस्ये च कुशप्रियम्॥ २०<br>भूधरं छादितगदं सुनेत्रं शूलशङ्खिनम्।<br>भद्राक्षं वीरभद्रं च नमस्ये शङ्कुकर्णिकम्॥ २१<br>वृषध्वजं महेशं च विश्वामित्रं शशिप्रभम्।<br>उपेन्द्रं चैव गोविन्दं नमस्ये पङ्कजप्रियम्॥ २२<br>सहस्रशिरसं देवं नमस्ये कुन्दमालिनम्।<br>कालाग्निं रुद्रदेवेशं नमस्ये कृत्तिवाससम्॥ २३<br>नमस्ये छागलेशं च नमस्ये पङ्कजासनम्।<br>सहस्राक्षं कोकनदं नमस्ये हरिशङ्करम्॥ २४मैं रुक्म-कवच धारण करनेवाले महायोगी ईश्वरको नमस्कार करता हूँ और पुरुषोत्तम श्रीनिवासभगवान्‌को नमस्कार करता हूँ। मैं चार भुजा धारण करनेवाले देवको प्रणाम करता हूँ। मैं पृथ्वीके अधिपति‌को प्रणाम करता हूँ। मैं वनस्पति, पशुपति और अव्यय प्रभुको प्रणाम करता हूँ। मैं श्रीकण्ठ वासुदेव, दण्डसहित नीलकण्ठ, सर्व, अनघ, गौरीश तथा नकुलीश्वरभगवान्‌को नमस्कार करता हूँ। मैं मनको हरण करनेवाले कृष्णकेश चक्रपाणि भगवान्‌को नमस्कार करता हूँ और यशोधारी, महाबाहु कुशप्रियको नमस्कार करता हूँ। मैं भूधर, छादितगद, सुनेत्र, शूलशंखी, भद्राक्ष, वीरभद्र तथा शंकुकर्णिकको नमस्कार करता हूँ। मैं वृषध्वज, महेश, विश्वामित्र, शशिप्रभ, उपेन्द्र, गोविन्द तथा पङ्कजप्रियको नमस्कार करता हूँ। मैं सहस्रशीर्षा तथा कुन्दमाली देवको नमस्कार करता हूँ। मैं कालाग्नि, रुद्रदेवेश तथा कृत्तिवासाको प्रणाम करता हूँ। मैं छागलेशको नमस्कार करता हूँ तथा पङ्कजासनको नमस्कार करता हूँ। मैं सहस्राक्ष, कोकनद तथा हरिशंकरको नमस्कार करता हूँ॥ १७—२४॥
अगस्त्यं गरुडं विष्णुं कपिलं ब्रह्मवाङ्मयम्।<br>सनातनं च ब्रह्माणं नमस्ये ब्रह्मतत्परम्॥ २५मैं अगस्त्य, गरुड, विष्णु, कपिल, ब्रह्मवाङ्मय, सनातन, ब्रह्मा तथा ब्रह्मतत्परको नमस्कार करता हूँ।
४३४श्रीवामनपुराण[ अध्याय ८८

| अप्रतर्क्यं चतुर्बाहुं सहस्त्रांशुं तपोमयम्।<br>नमस्ये धर्मराजानं देवं गरुडवाहनम्॥ २६<br><br>सर्वभूतगतं शान्तं निर्मलं सर्वलक्षणम्।<br>महायोगिनमव्यक्तं नमस्ये पापनाशनम्॥ २७<br><br>निरञ्जनं निराकारं निर्गुणं निर्मलं पदम्।<br>नमस्ये पापहन्तारं शरण्यं शरणं व्रजे॥ २८<br><br>एतत् पवित्रं परमं पुराणं<br>प्रोक्तं त्वगस्त्येन महर्षिणा च।<br>धन्यं यशस्यं बहुपापनाशनं<br>संकीर्तनात् स्मरणात् संश्रवाच्च॥ २९ | मैं अनुमानसे परे, चार भुजाधारी, सहस्रांशु, तपोमूर्ति, धर्मराज गरुड़वाहन देवको नमस्कार करता हूँ। मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें व्याप्त, शान्तस्वरूप, निर्मल, समस्त लक्षणोंसे युक्त, महान् योगी, अव्यक्तस्वरूप एवं पाप नाश करनेवाले भगवान्‌को नमस्कार करता हूँ। मैं निरञ्जन, निराकार, गुणोंसे रहित, निर्मलपदस्वरूप, पाप हरण करनेवालेको नमस्कार करता हूँ तथा शरणागतकी रक्षा करनेवालेकी शरणमें जाता हूँ। महर्षि अगस्त्यने इस परम पवित्र पुरातन स्तोत्रको कहा था। इसके कथन, स्मरण तथा श्रवण करनेसे अनेक पापोंका विनाश हो जाता है और मनुष्य धन्य एवं यशस्वी हो जाता है॥ २५—२९॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्तासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८७॥


अट्टासीवाँ अध्याय

बलिको कुरुक्षेत्रमें आना, वहाँके मुनियोंका पलायन, वामनका आविर्भाव, उनकी स्तुति, बलिके यज्ञमें जानेकी उत्कण्ठा और भरद्वाजसे स्वस्थानका कथन

पुलस्त्य उवाचपुलस्त्यजी बोले—
गतेऽथ तीर्थयात्रायां प्रह्लादे दानवेश्वरे।<br>कुरुक्षेत्रं समभ्यागाद् यष्टुं वैरोचनो बलिः॥ १दानवेश्वर प्रह्लादके तीर्थयात्राके लिये चले जानेपर विरोचनका पुत्र बलि कुरुक्षेत्रमें यज्ञ करनेके लिये गया।
तस्मिन् महाधर्मयुते तीर्थे ब्राह्मणपुङ्गवः।<br>शुक्रो द्विजातिप्रवरानामन्रयत् भार्गवान्॥ २उस महान् धर्मयुक्त तीर्थमें ब्राह्मणश्रेष्ठ शुक्राचार्यने द्विजोंमें अत्यन्त श्रेष्ठ भार्गवोंको आमन्त्रित किया।
भृगूनामन्त्र्यमाणान् वै श्रुत्वात्रेयाः सगौतमाः।<br>कौशिकाङ्गिरसश्चैव तत्यजुः कुरुजाङ्ग्लान्॥ ३भृगुवंशीय ब्राह्मणोंका आमन्त्रित किया जाना सुनकर अत्रि, गौतम, कौशिक और अङ्गिरागोत्रीय ब्राह्मणोंने कुरुजाङ्गलका त्याग कर दिया।
उत्तराशां प्रजग्मुस्ते नदीमनु शतद्रुकाम्।<br>शातद्रवे जले स्नात्वा विपाशां प्रययुस्ततः॥ ४वे उत्तर दिशामें शतद्रु नदीके तटपर गये। शतद्रुके जलमें स्नान करनेके बाद वे वहाँसे विपाशा नदीके निकट चले गये।
विज्ञाय तत्राप्यरतिं स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः।<br>प्रजग्मुः किरणां पुण्यां दिनेशकिरणच्युताम्॥ ५वहाँ भी मनके अनुकूल न होनेके कारण वे सब स्नान करनेके पश्चात् पितरों एवं देवोंका पूजन कर सूर्यकी किरणोंसे उत्पन्न किरणा नदीके समीप गये।

अध्याय ८८ ] बलिका कुरुक्षेत्रमें आना, वहाँके मुनियोंका पलायन, वामनका आविर्भाव ४३५


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्यां स्नात्वाऽर्च्य देवर्षे सर्व एव महर्षयः।<br>ऐरावतीं सुपुण्योदां स्नात्वा जग्मुरथेश्वरीम्॥ ६<br><br>देविकाया जले स्नात्वा पयोष्ण्यां चैव तापसाः।<br>अवतीर्णा मुने स्नातुमात्रेयाद्याः शुभां नदीम्॥ ७<br><br>ततो निमग्ना ददृशुः प्रतिबिम्बमथात्मनः।<br>अन्तर्जले द्विजश्रेष्ठ महदाश्चर्यकारकम्॥ ८देवर्षे! उसमें स्नान और अर्चन करनेके बाद सभी महर्षि पवित्र जलवाली ऐरावती नदीके निकट गये तथा उसमें स्नान करके ईश्वरी नदीके तटपर चले गये। मुने! देविका और पयोष्णीमें स्नान करके आत्रेय आदि तपस्वियोंने शुभा नामकी नदीमें स्नान करनेके लिये प्रवेश किया। द्विजश्रेष्ठ! जलमें गोता लगानेपर उन लोगोंने जलके भीतर महान् आश्चर्य उत्पन्न करनेवाली अपनी-अपनी परछाई देखी॥ ६-८॥
उन्मज्जने च ददृशुः पुनर्विस्मितमानसाः।<br>ततः स्नात्वा समुत्तीर्णा ऋषयः सर्व एव हि॥ ९<br><br>जग्मुस्ततोऽपि ते ब्रह्मन् कथयन्तः परस्परम्।<br>चिन्तयन्तश्च सततं किमेतदिति विस्मिताः॥ १०<br><br>ततो दूरादपश्यन्त वनषण्डं सुविस्तृतम्।<br>वनं हरगलश्यामं खगध्वनिनिनादितम्॥ ११<br><br>अतितुङ्गतया व्योम आवृण्वानं नगोत्तमम्।<br>विस्तृताभिर्जटाभिस्तु अन्तर्भूमिं च नारद॥ १२<br><br>काननं पुष्पितैर्वृक्षैरतिभाति समन्ततः।<br>दशार्द्धवर्णैः सुखदैर्नभस्तारागणैरिव॥ १३<br><br>तं दृष्ट्वा कमलैर्व्याप्तं पुण्डरीकैश्च शोभितम्।<br>तद्वत् कोकनदैर्व्याप्तं वनं पद्मवनं यथा॥ १४<br><br>प्रजग्मुस्तुष्टिमंतुलां ते ह्लादं परमं ययुः।<br>विविशुः प्रीतमनसो हंसा इव महासरः॥ १५<br><br>तन्मध्ये ददृशुः पुण्यमाश्रमं लोकपूजितम्।<br>चतुर्णां लोकपालानां वर्गाणां मुनिसत्तम॥ १६महर्षियोंने डुबकी लगानेके बाद जब सिर ऊपर किया, तब पुनः वैसा ही देखा; इससे वे आश्चर्यमें भर गये। उसके बाद स्नान करके सभी ऋषि बाहर निकले। ब्रह्मन्! उसके पश्चात् वे सभी लोग यह क्या है?—इस विषयमें आश्चर्यपूर्वक आपसमें बातचीत एवं विचार-विमर्श करते हुए वहाँसे भी चले गये। उसके बाद उन लोगोंने दूरसे ही अतिविस्तृत, शंकरके कण्ठकी भाँति श्यामवर्णवाले और पक्षियोंकी ध्वनिसे भरा एक वृक्षोंका समूह (वन) देखा। नारदजी! वह वन अत्यन्त ऊँचा होनेके कारण आकाशको घेरे हुए था तथा उसकी नीचेकी भूमि बिखरे हुए फूलोंसे ढकी रहती थी। वह वन तारागणोंसे जगमगाते हुए आकाशके समान खिले हुए पाँचरंगे वृक्षोंसे बहुत सुन्दर लग रहा था। कमल-वनके समान कमलोंसे व्याप्त, पुण्डरीकोंसे विभूषित एवं कोकनदोंसे भरे उस वनको देखकर वे अत्यन्त प्रसन्न एवं गद्गद हो गये। वे लोग संतुष्ट-चित्तसे उसमें इस प्रकार प्रविष्ट हुए, जिस प्रकार हंस महासरोवरमें प्रवेश करते हैं। मुनिसत्तम! उन लोगोंने उसके बीचमें लोकपालोंके चार वर्गों (धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष)-का लोकपूजित पवित्र आश्रम देखा॥ ९—१६॥
धर्माश्रमं प्राङ्मुखं तु पलाशविटपावृतम्।<br>प्रतीच्याभिमुखं ब्रह्मन् अर्थस्येक्षुवनावृतम्॥ १७<br><br>दक्षिणाभिमुखं काम्यं रम्भाशोकवनावृतम्।<br>उदङ्मुखं च मोक्षस्य शुद्धस्फटिकवर्चसम्॥ १८ब्रह्मन्! पूर्व दिशाकी ओर मुखवाला पलाशवृक्षसे घिरा हुआ धर्माश्रम, पश्चिममुख इक्षुवनसे घिरा हुआ अर्थाश्रम, दक्षिणकी ओर कदली और अशोकके वनसे घिरा हुआ कामाश्रम तथा उत्तरकी ओर शुद्धस्फटिकके समान तेजस्वी मोक्षाश्रम स्थित था।

| ४३६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८८ | | :--- | :--- |

| कृतान्ते त्वाश्रमी मोक्षः कामस्त्रेतान्तरे श्रमी।<br>आश्रम्यर्थो द्वापरान्ते तिष्यादौ धर्म आश्रमी ॥ १९<br><br>तान्‍याश्रमाणि मुनयो दृष्ट्वात्रेयादयोऽव्ययाः।<br>तत्रैव च रतिं चक्रुरखण्डे सलिलाप्लुते ॥ २०<br><br>धर्माद्यैर्भगवान् विष्णुरखण्ड इति विश्रुतः।<br>चतुर्मूर्तिर्जगन्नाथः पूर्वमेव प्रतिष्ठितः ॥ २१<br><br>तमर्चयन्ति ऋषयो योगात्मानो बहुश्रुताः।<br>शुश्रूषयाऽथ तपसा ब्रह्मचर्येण नारद ॥ २२<br><br>एवं ते न्यवसंस्तत्र समेता मुनयो वने।<br>असुरेभ्यस्तदा भीताः स्वाश्रित्याखण्डपर्वतम् ॥ २३<br><br>तथाऽन्ये ब्राह्मणा ब्रह्मन् अश्मकुट्टा मरीचिपाः।<br>स्नात्वा जले हि कालिन्द्याः प्रजग्मुर्दक्षिणामुखाः ॥ २४ | सत्ययुगके अन्तमें मोक्ष अपने आश्रममें निवास करने लगता है, त्रेतामें काम आश्रमवासी हो जाता है, द्वापरके अन्तमें अर्थ आश्रमी बन जाता है और कलिके आदिमें धर्म आश्रममें रहना प्रारम्भ करता है। अव्यय, आत्रेय आदि मुनियोंने उन आश्रमोंको देखकर अखण्ड जलसे परिपूर्ण उस स्थानमें सुखसे रहनेका निश्चय किया। धर्म आदिके द्वारा भगवान् विष्णु अखण्ड नामसे विख्यात हैं। जगन्नाथ चार मूर्तियोंवाले हैं, यह पहलेसे ही निश्चित है। नारदजी ! बहुश्रुत योगात्मा ऋषिलोग सेवा, तप और ब्रह्मचर्यके द्वारा उनकी पूजा करते हैं। असुरोंसे त्रस्त होकर वे मुनिगण सम्मिलितरूपसे उस अखण्ड पर्वतका भलीभाँति आश्रयण कर रहने लगे। ब्रह्मन् ! केवल पत्थरसे कूटे हुए अन्नको खानेवाले वानप्रस्थी साधु तथा सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले अन्य ब्राह्मण आदि कालिन्दीके जलमें स्नान कर दक्षिण दिशाकी ओर चले गये ॥ १७—२४॥ | | अवन्तिविषयं प्राप्य विष्णुमासाद्य संस्थिताः।<br>विष्णोरपि प्रसादेन दुष्प्रवेशं महासुरैः ॥ २५<br><br>बालखिल्यादयो जग्मुरवशा दानवाद् भयात्।<br>रुद्रकोटिं समाश्रित्य स्थितास्ते ब्रह्मचारिणः ॥ २६<br><br>एवं गतेषु विप्रेषु गौतमाङ्गिरसादिषु।<br>शुक्रस्तु भार्गवान् सर्वान् निन्ये यज्ञविधौ मुने ॥ २७<br><br>अधिष्ठिते भार्गवैस्तु महायज्ञेऽमितद्युते।<br>यज्ञदीक्षां बलेः शुक्रश्चकार विधिना स्वयंम् ॥ २८<br><br>श्वेताम्बरधरो दैत्यः श्वेतमाल्यानुलेपनः।<br>मृगाजिनावृतः पृष्ठे बर्हिपत्रविचित्रितः ॥ २९<br><br>समास्ते वितते यज्ञे सदस्यैरभिसंवृतः।<br>हयग्रीवप्रलम्बाद्यैर्मयबाणपुरोगमैः ॥ ३०<br><br>पत्नी विन्ध्यावली चास्य दीक्षिता यज्ञकर्मणि।<br>ललनानां सहस्त्रस्य प्रधाना ऋषिकन्यका ॥ ३१<br><br>शुक्रेणाश्वः श्वेतवर्णो मधुमासे सुलक्षणः।<br>महीं विहर्तुमुत्सृष्टस्तारकाक्षोऽन्वगाच्च तम् ॥ ३२ | वे विष्णुभगवान्‌की कृपासे महान् असुरोंके कारण प्रवेश पानेमें कठिन अवन्ति नगरीमें पहुँचे और उनके निकट रहने लगे। दानवोंके डरसे विवश होकर बालखिल्य आदि ब्रह्मचारी ऋषि रुद्रकोटि चले गये और वहाँ रहने लगे। मुने! इस प्रकार गौतम और आङ्गिरस आदि ब्राह्मणोंके चले जानेपर शुक्राचार्य सभी भार्गववंशीय ब्राह्मणोंको यज्ञ-कार्यमें ले गये। अमिततेजस्विन्! भार्गव-वंशीय ब्राह्मणोंसे अधिकृत शुक्राचार्यने बलिको महायज्ञमें स्वयं विधिवत् यज्ञकी दीक्षा दी। श्वेत वस्त्र धारण करनेवाले, श्वेत माल्य एवं अनुलेपनसे युक्त, मृग-चर्मसे आवृत एवं मयूरपुच्छसे सुसज्जित दैत्य बलिने हयग्रीव, प्रलम्ब, मय एवं बाण आदि सदस्योंसे घिरे हुए विस्तृत यज्ञ-मण्डपमें आसन ग्रहण किया। उसकी पत्नी विन्ध्यावली भी यज्ञकर्ममें दीक्षित हुई। वह ऋषि-कन्या हजारों ललनाओंमें प्रधान थी। शुक्राचार्यने चैत्रमासमें सुलक्षण अश्व पृथ्वीपर विचरण करनेके लिये छोड़ा। तारकाक्ष नामका असुर उसके पीछे-पीछे चलने लगा ॥ २५—३२॥ |

अध्याय ८८ ] बलिका कुरुक्षेत्रमें आना, वहाँके मुनियोंका पलायन, वामनका आविर्भाव ४३७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवमश्वे समुत्सृष्टे वितथे यज्ञकर्मणि।<br>गते च मासत्रितये हूयमाने च पावके ॥ ३३<br>पूज्यमानेषु दैत्येषु मिथुनस्थे दिवाकरे।<br>सुषुवे देवजननी माधवं वामनाकृतिम् ॥ ३४<br>तं जातमात्रं भगवन्तमीशं<br>नारायणं लोकपतिं पुराणम्।<br>ब्रह्मा समभ्येत्य समं महर्षिभिः<br>स्तोत्रं जगादाथ विभोर्महर्षे ॥ ३५<br>नमोऽस्तु ते माधव सत्त्वमूर्ते<br>नमोऽस्तु ते शाश्वत विश्वरूप।<br>नमोऽस्तु ते शत्रुवनेन्धनाग्ने<br>नमोऽस्तु वै पापमहादवाग्ने ॥ ३६<br>नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन।<br>नमस्ते जगदाधार नमस्ते पुरुषोत्तम ॥ ३७<br>नारायण जगन्मूर्ते जगन्नाथ गदाधर।<br>पीतवासः श्रियःकान्त जनार्दन नमोऽस्तु ते ॥ ३८<br>भवांस्त्राता च गोप्ता च विश्वात्मा सर्वगोऽव्ययः।<br>सर्वधारी धराधारी रूपधारी नमोऽस्तु ते ॥ ३९<br>वर्धस्व वर्धिताशेषत्रैलोक्य सुरपूजित।<br>कुरुष्व दैवतपते मघोनोऽश्रुप्रमार्जनम् ॥ ४०<br>त्वं धाता च विधाता च संहर्ता त्वं महेश्वरः।<br>महालय महायोगिन् योगशायिन् नमोऽस्तु ते ॥ ४१इस प्रकार उस अश्वके छोड़े जानेपर यज्ञकर्मके चलते हुए अग्निमें हवन करते तीन मास व्यतीत हो जानेपर तथा दैत्योंके पूजित होने और सूर्यके मिथुन-राशिमें सङ्क्रमण करनेपर देवमाता अदितिने वामनके आकारवाले माधवको जन्म दिया। महर्षे! उन भगवान्, ईश, नारायण लोकपति पुराण-पुरुषके अवतार होते ही ब्रह्मा महर्षियोंके साथ उनके निकट गये तथा (उन) विभुकी स्तुति करने लगे। हे माधव! हे सत्त्वमूर्ते! आपको नमस्कार है। हे शाश्वत! हे विश्वरूप! आपको नमस्कार है। शत्रुरूपी वनके ईंधनके लिये हे अग्निस्वरूप! आपको नमस्कार है। पापरूपी वनके लिये हे महादवाग्निस्वरूप! आपको नमस्कार है। हे पुण्डरीकाक्ष! आपको नमस्कार है। हे विश्वकी सृष्टि करनेवाले! आपको नमस्कार है। हे जगत्के आधार! आपको नमस्कार है। हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। हे नारायण! हे जगन्मूर्ते! हे जगन्नाथ! हे गदाधर! हे पीताम्बर धारण करनेवाले! हे लक्ष्मीपते! हे जनार्दन! आपको नमस्कार है। आप पालन करनेवाले, रक्षक, विश्वकी आत्मा, सर्वत्र गमन करनेवाले, अविनाशी, सबको धारण करनेवाले, पृथिवीको धारण करनेवाले तथा रूप धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। हे देवपूजित! हे सारी त्रिलोकीको बढ़ानेवाले! आपका अभ्युदय हो। हे दैवतपते! आप इन्द्रके आँसू पोंछें। आप धाता, विधाता, संहर्ता, महेश्वर, महालय, महायोगी और योगशायी हैं। आपको नमस्कार है॥ ३३—४१॥
इत्थं स्तुतो जगन्नाथः सर्वात्मा सर्वगो हरिः।<br>प्रोवाच भगवान् मह्यं कुरूपनयनं विभो ॥ ४२<br>ततश्चकार देवस्य जातकर्मादिकाः क्रियाः।<br>भरद्वाजो महातेजा बार्हस्पत्यस्तपोधनः ॥ ४३<br>व्रतबन्धं तथेशस्य कृतवान् सर्वशास्त्रवित्।<br>ततो ददुः प्रीतियुताः सर्व एव वरान् क्रमात् ॥ ४४इस प्रकारकी स्तुति किये जानेपर सर्वात्मा, सर्वगामी जगन्नाथभगवान् श्रीहरिने कहा—विभो! मेरा उपनयन-संस्कार कीजिये। उसके बाद बृहस्पतिवंशमें उत्पन्न महातेजस्वी तपोधन भरद्वाजने वामनकी जातकर्म आदि सभी क्रियाएँ सम्पन्न करायीं। उसके पश्चात् सभी शास्त्रोंके वेत्ता भरद्वाजने ईश्वरका व्रतबन्ध (यज्ञोपवीत) कराया। उसके बाद अन्य सभीने प्रसन्न होकर वटुकको क्रमशः श्रेष्ठ दान दिये।

| ४३८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८८ | | :--- | :--- |

संस्कृतहिन्दी
यज्ञोपवीतं पुलहस्त्वहं च सितवाससी।<br>मृगाजिनं कुम्भयोनिर्भरद्वाजस्तु मेखलाम् ॥ ४५<br>पालाशनददद् दण्डं मरीचिर्ब्रह्मणः सुतः।<br>अक्षसूत्रं वारुणिस्तु कौशयं वेदमथाङ्गिराः ॥ ४६पुलहने यज्ञोपवीत, मैं (पुलस्त्य)-ने दो शुक्ल वस्त्र, अगस्त्यने मृगचर्म तथा भरद्वाजने मेखला दी। ब्रह्माके पुत्र मरीचिने पलाशदण्ड, वारुणि (वसिष्ठ)-ने अक्षसूत्र एवं अङ्गिराने रेशमी वस्त्र तथा वेद दिया॥ ४२—४६॥
छत्रं प्रादाद् रघू राजा उपानद्युगलं नृगः।<br>कमण्डलुं बृहत्तेजाः प्रादाद्विष्णोर्बृहस्पतिः ॥ ४७<br>एवं कृतोपनयनो भगवान् भूतभावनः।<br>संस्तूयमानो ऋषिभिः साङ्गं वेदमधीयत ॥ ४८<br>भरद्वाजादाङ्गिरसात् सामवेदं महाध्वनिम्।<br>महदाख्यानसंयुक्तं गन्धर्वसहितं मुने ॥ ४९<br>मासेनैकेन भगवान् ज्ञानश्रुतिमहार्णवः।<br>लोकाचारप्रवृत्त्यर्थमभूच्छ्रुतिविशारदः ॥ ५०<br>सर्वशास्त्रेषु नैपुण्यं गत्वा देवोऽक्षयोऽव्ययः।<br>प्रोवाच ब्राह्मणश्रेष्ठं भरद्वाजमिदं वचः ॥ ५१राजा रघुने छत्र, नृगने एक जोड़ा जूता एवं अत्यन्त तेजस्वी बृहस्पतिने विष्णुको कमण्डलु दिया। इस प्रकार उपनयन-संस्कार हो जानेपर ऋषियोंसे संस्तुत होते हुए भगवान् भूतभावनने (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष-इन) अङ्गोंके साथ चारों वेदोंका अध्ययन किया। मुने! उन्होंने आङ्गिरस भरद्वाजसे गन्धर्वविद्याके साथ महान् आख्यानोंसे पूर्ण महाध्वन्यात्मक सामवेदका अध्ययन किया। इस प्रकार ज्ञानस्वरूप वेदके अगाध समुद्र भगवान् एक मासमें लोकाचारके व्यवहारके लिये वेदविशारद हो गये। समस्त शास्त्रोंमें निपुण होकर अक्षय, अव्यय वामनने ब्राह्मणश्रेष्ठ भरद्वाजजीसे यह वचन कहा— ॥ ४७-५१ ॥
श्रीवामन उवाच<br><br>ब्रह्मन् व्रजामि देह्याज्ञां कुरुक्षेत्रं महोदयम्।<br>तत्र दैत्यपतेः पुण्यो हयमेधः प्रवर्तते ॥ ५२<br><br>समाविष्टानि पश्यस्व तेजांसि पृथिवीतले।<br>ये संनिधानाः सततं मदंशाः पुण्यवर्धनाः।<br>तेनाहं प्रतिजानामि कुरुक्षेत्रं गतो बलिः ॥ ५३श्रीवामनजीने कहा— ब्रह्मन्! मैं अत्यन्त उत्तम कुरुक्षेत्रतीर्थमें जाना चाहता हूँ। आप आज्ञा दीजिये। वहाँ दैत्यराज बलिका पवित्र अश्वमेधयज्ञ हो रहा है। देखिये, पृथ्वीतलपर पुण्यकी वृद्धि करनेवाले मेरे स्थानोंमें तेजोंका समावेश हो रहा है। अतः मुझे यह मालूम हो रहा है कि बलि कुरुक्षेत्रमें स्थित हैं॥ ५२-५३॥
भरद्वाज उवाच<br><br>स्वेच्छया तिष्ठ वा गच्छ नाहमाज्ञापयामि ते।<br>गमिष्यामो वयं विष्णो बलेरध्वरं मा खिद ॥ ५४<br>यद् भवन्तमहं देव परिपृच्छामि तद् वद।<br>केषु केषु विभो नित्यं स्थानेषु पुरुषोत्तम।<br>सान्निध्यं भवतो ब्रूहि ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ५५भरद्वाजजीने कहा— आप अपनी इच्छासे यहाँ रहें अथवा जायँ। मैं आपको आदेश नहीं दूँगा। विष्णो! हमलोग बलिके यज्ञमें जायँगे। आप चिन्ता न करें। देव! मैं आपसे जो पूछता हूँ उसे आप बतलायें। विभो! पुरुषोत्तम! मैं यथार्थरूपसे यह जानना चाहता हूँ कि आप किन-किन स्थानोंमें रहते हैं॥ ५४-५५ ॥
वामन उवाच<br><br>श्रूयतां कथयिष्यामि येषु येषु गुरो अहम्।<br>निवसामि सुपुण्येषु स्थानेषु बहुरूपवान् ॥ ५६श्रीवामनजी बोले— गुरो! अनेक रूपोंसे युक्त होकर जिन-जिन पवित्र स्थानोंमें मैं रहता हूँ, उनका मैं वर्णन कर रहा हूँ; उसे आप सुनें।
अध्याय ८९ ]वामनभगवान्‌का विविध स्थानोंमें निवास-वर्णन और कुरुजाङ्गलके लिये प्रस्थान करना४३९
ममावतारैर्वसुधा नभस्तलं<br>पातालमम्भोनिधयो दिवं च।<br>दिशः समस्ता गिरयोऽम्बुदाश्च<br>व्याप्ता भरद्वाज ममानुरूपैः॥ ५७<br>ये दिव्या ये च भौमा<br>जलगगनचराः स्थावरा जङ्गमाश्च<br>सेन्द्राः सार्काः सचन्द्रा<br>यमवसुवरुणा ह्याग्नयः सर्वपालाः।<br>ब्रह्माद्याः स्थावरान्ता द्विजखगसहिता<br>मूर्तिमन्तो ह्यमूर्ता-<br>स्ते सर्वे मत्प्रसूता बहुविविधगुणाः<br>पूरणार्थं पृथिव्याः॥ ५८<br>एते हि मुख्याः सुरसिद्धदानवैः<br>पूज्यास्तथा संनिहिता महीतले।<br>यैर्दृष्टमात्रैः सहसैव नाशं<br>प्रयाति पापं द्विजवर्य कीर्तनैः॥ ५९भरद्वाजजी! मेरे अनुरूप मेरे अवतारोंसे पृथ्वी, आकाश, पाताल, समुद्र, स्वर्ग, सभी दिशाएँ, पर्वत तथा मेघ व्याप्त हैं। ब्रह्मन्! दिव्य, पार्थिव, जलचर, आकाशचर, स्थावर, जङ्गम, इन्द्र, सूर्य, चन्द्र, यम, वसु, वरुण, सभी अग्नियाँ, समस्त प्राणियोंके पालक, ब्रह्मासे लेकर स्थावरतक पशु-पक्षिसहित सभी मूर्त और अमूर्त पदार्थ, भाँति-भाँतिके गुणोंसे सम्पन्न—ये सभी पदार्थ पृथ्वीकी पूर्तिके लिये मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं। पृथ्वीपर स्थित ये सभी मुख्य पदार्थ देवों, सिद्धों एवं दानवोंके पूजनीय हैं। द्विजश्रेष्ठ! इनके कीर्तन एवं दर्शनमात्रसे पाप शीघ्र नष्ट हो जाता है॥ ५६—५९॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अठासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ८८ ॥


नवासीवाँ अध्याय

वामनभगवान्‌का विविध स्थानोंमें निवास-वर्णन और कुरुजाङ्गलके लिये प्रस्थान करना

श्रीभगवानुवाच<br><br>आद्यं मात्स्यं महद्रूपं संस्थितं मानसे ह्रदे।<br>सर्वपापक्षयकरं कीर्तनस्पर्शनादिभिः॥ १<br><br>कौर्ममन्यत्सन्निधानं कौशिक्यां पापनाशनम्।<br>हयशीर्षं च कृष्णांशे गोविन्दं हस्तिनापुरे॥ २<br><br>त्रिविक्रमं च कालिन्द्यां लिङ्गभेदे भवं विभुम्।<br>केदारे माधवं शौरिं कुब्जाम्रे हृष्टमूर्धजम्॥ ३श्रीभगवान् बोले—मेरा प्रथम विशाल मत्स्यरूप मानसरोवरमें स्थित है। वह कीर्तन और स्पर्श आदिसे सभी पापोंका विनाश करनेवाला है। दूसरा पापका विनाश करनेवाला मेरा कूर्मावतार कौशिकी नदीमें स्थित है। कृष्णांशमें हयशीर्ष और हस्तिनापुरमें गोविन्द नामसे विराजमान हैं। कालिन्दीमें त्रिविक्रम तथा लिङ्गभेदमें व्यापक भव, केदारतीर्थमें माधव, शौरि और कुब्जाम्रमें हृष्टमूर्धज स्थित हैं।
४४०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ८१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नारायणं बदर्यां च वाराहे गरुडासनम्।<br>जयेशं भद्रकर्णे च विपाशायां द्विजप्रियम्॥ ४<br>रूपधारमिरावत्यां कुरुक्षेत्रे कुरुध्वजम्।<br>कृतशौचे नृसिंहं च गोकर्णे विश्वकर्माणम्॥ ५<br>प्राचीने कामपालं च पुण्डरीकं महाम्भसि।<br>विशाखयूपे ह्यजितं हंसं हंसपदे तथा॥ ६<br>पयोष्णीयामखण्डं च वितस्तायां कुमारिलम्।<br>मणिमत्पर्वते शम्भुं ब्रह्मण्ये च प्रजापतिम्॥ ७<br>मधुनाद्यां चक्रधरं शूलबाहुं हिमालये।<br>विद्धि विष्णुं मुनिश्रेष्ठ स्थितमोषधिसानुनि॥ ८बदरिकाश्रममें नारायण, वाराहमें गरुडासन, भद्रकर्णमें जयेश एवं विपाशा नदीके तटपर द्विजप्रिय विद्यमान हैं। इरावतीमें रूपधार, कुरुक्षेत्रमें कुरुध्वज, कृतशौचमें नृसिंह और गोकर्णमें विश्वकर्मा वर्तमान हैं। प्राचीन स्थानमें कामपाल, महाम्भस्में पुण्डरीक, विशाखयूपमें अजित तथा हंसपदमें हंसरूप विद्यमान हैं। पयोष्णीमें अखण्ड, वितस्तामें कुमारिल, मणिमान् पर्वतपर शम्भु एवं ब्रह्मण्यमें प्रजापति रूप स्थित हैं। मुनिश्रेष्ठ! मधुनदीमें चक्रधर, हिमालयमें शूलबाहु और ओषधिप्रस्थमें मेरे विष्णुरूपको अवस्थित जानें॥ १-८॥
भृगुतुङ्गे सुवर्णाक्षं नैमिषे पीतवाससम्।<br>गयायां गोपतिं देवं गदापाणिमधीश्वरम्॥ ९<br>त्रैलोक्यनाथं वरदं गोप्रतारे कुशेशयम्।<br>अर्द्धनारीश्वरं पुण्ये माहेन्द्रे दक्षिणे गिरौ॥ १०<br>गोपालमुत्तरे नित्यं महेन्द्रे सोमपीथिनम्।<br>वैकुण्ठमपि सह्याद्रौ पारियात्रे पराजितम्॥ ११<br>कशेरुदेशे देवेशं विश्वरूपं तपोधनम्।<br>मलयाद्रौ च सौगन्धिं विन्ध्यपादे सदाशिवम्॥ १२<br>अवन्तिविषये विष्णुं निषधेष्वमरेश्वरम्।<br>पाञ्चालिकं च ब्रह्मर्षे पाञ्चालेषु व्यवस्थितम्॥ १३<br>महोदये हयग्रीवं प्रयागे योगशायिनम्।<br>स्वयम्भुवं मधुवने अयोगन्थिं च पुष्करे॥ १४<br>तथैव विप्रप्रवर वाराणस्यां च केशवम्।<br>अविमुक्तकमत्रैव लोलश्चात्रैव गीयते॥ १५<br>पद्मायां पद्मकिरणं समुद्रे वडवामुखम्।<br>कुमारधारे बाह्लीशं कार्तिकेयं च बर्हिणम्॥ १६भृगुतुङ्गमें सुवर्णाक्ष, नैमिषमें पीतवासा एवं गयामें गोपति गदाधर ईश्वररूपसे वर्तमान हैं। गोप्रतारमें वरदायक, तीनों लोकोंके स्वामी कुशेशय एवं पवित्र महेन्द्र-पर्वतपर दक्षिणमें अर्धनारीश्वर रूप विद्यमान है। महेन्द्र-पर्वतपर, उत्तरमें सोमपीथी गोपाल, सह्याद्रिपर्वतपर वैकुण्ठ एवं पारियात्रमें अपराजितरूप स्थित है। कशेरुदेशमें तपोधन, विश्वरूप देवेश, मलयपर्वतपर सौगन्धि तथा विन्ध्यपादमें सदाशिव रूप वर्तमान है। ब्रह्मर्षे! अवन्तिदेशमें विष्णु, निषधदेशमें अमरेश्वर और पाञ्चालदेशमें मेरा पाञ्चालिक रूप अवस्थित है। महोदयमें हयग्रीव, प्रयागमें योगशायी, मधुवनमें स्वयम्भुव और पुष्करमें अयोगन्थि रूप विद्यमान है। विप्रश्रेष्ठ! उसी प्रकार वाराणसीमें मेरा केशवरूप तथा यहींपर अविमुक्तक तथा लोलरूप स्थित कहा गया है। पद्मामें पद्मकिरण, समुद्रमें वडवामुख तथा कुमारधारमें बाह्लीश, वहीं और कार्तिकेयरूपसे स्थित हैं॥ ९-१६॥
अजेशे शम्भुमनघं स्थाणुं च कुरुजाङ्गले।<br>वनमालिनमाहुर्मां किष्किन्धावासिनो जनाः॥ १७अजेशमें अनघ शम्भु तथा कुरुजाङ्गलमें स्थाणूमूर्ति हैं। किष्किन्धाके निवासी लोग मुझे वनमाली कहते हैं।
वीरं कुवलयारूढं शङ्खचक्रगदाधरम्।<br>श्रीवत्साङ्कमुदाराङ्गं नर्मदायां श्रियः पतिम्॥ १८नर्मदाके क्षेत्रमें मुझे वीर, कुवलयारूढ, शङ्ख-चक्र-गदाधर, श्रीवत्साङ्क एवं उदाराङ्ग श्रीपति कहा जाता है।
माहिष्मत्यां त्रिनयनं तत्रैव च हुताशनम्।<br>अर्बुदे च त्रिसौपर्णं क्ष्माधरं शूकराचले॥ १९माहिष्मतीमें मेरा त्रिनयन एवं हुताशन रूप विद्यमान हैं। इसी प्रकार अर्बुदमें त्रिसौपर्ण एवं शूक्राचलमें मेरा क्ष्माधर रूप अवस्थित है।
त्रिणाचिकेतं ब्रह्मर्षे प्रभासे च कपर्दिनम्।<br>तथैवात्रापि विख्यातं तृतीयं शशिशेखरम्॥ २०ब्रह्मर्षे! प्रभासमें मेरा त्रिणाचिकेत, कपर्दी और तृतीय शशिशेखर रूप विख्यात है।

अध्याय ८९ ] वामनभगवान्‌का विविध स्थानोंमें निवास-वर्णन और कुरुजाङ्गलके लिये प्रस्थान करना ४४१


| उदये शशिनं सूर्य ध्रुवं च त्रितयं स्थितम्।<br>हेमकूटे हिरण्याक्षं स्कन्दं शरवणे मुने॥ २१<br>महालये स्मृतं रुद्रमुत्तरेषु कुरुष्वथ।<br>पद्मनाभं मुनिश्रेष्ठ सर्वसौख्यप्रदायकम्॥ २२<br>सप्तगोदावरे ब्रह्मन् विख्यातं हाटकेश्वरम्।<br>तत्रैव च महाहंसं प्रयागेऽपि वटेश्वरम्॥ २३<br>शोणे च रुक्मकवचं कुण्डिने घ्राणतर्पणम्।<br>भिल्लीवने महायोगं माद्रेषु पुरुषोत्तमम्॥ २४ | उदयगिरिमें चन्द्र, सूर्य और ध्रुव—ये तीन मूर्तियाँ अवस्थित हैं। मुने! हेमकूटमें हिरण्याक्ष एवं शरवणमें स्कन्द नामक रूप विद्यमान है। मुनिश्रेष्ठ ! महालयमें रुद्र एवं उत्तरकुरुमें हर प्रकारका सुख प्रदान करनेवाला पद्मनाभ रूप विख्यात है। ब्रह्मन्! सप्तगोदावरमें हाटकेश्वर एवं महाहंस तथा प्रयागमें वटेश्वर रूप अवस्थित है। शोणमें रुक्मकवच, कुण्डिनमें घ्राणतर्पण, भिल्लीवनमें महायोग, माद्रमें पुरुषोत्तम रूप विद्यमान है॥ १७—२४॥ | | प्लक्षावतरणे विश्वं श्रीनिवासं द्विजोत्तम।<br>शूर्पारके चतुर्बाहुं मगधायां सुधापतिम्॥ २५<br>गिरिव्रजे पशुपतिं श्रीकण्ठं यमुनातटे।<br>वनस्पतिं समाख्यातं दण्डकारण्यवासिनम्॥ २६<br>कालिञ्जरे नीलकण्ठं सरय्वां शम्भुमुत्तमम्।<br>हंसयुक्तं महाकोश्यां सर्वपापप्रणाशनम्॥ २७<br>गोकर्णे दक्षिणे शर्वं वासुदेवं प्रजामुखे।<br>विन्ध्यशृङ्गे महाशौरिं कन्यायां मधुसूदनम्॥ २८<br>त्रिकूटशिखरे ब्रह्मन् चक्रपाणिमीश्वरम्।<br>लौहदण्डे हृषीकेशं कोसलायां मनोहरम्॥ २९<br>महाबाहुं सुराष्ट्रे च नवराष्ट्रे यशोधरम्।<br>भूधरं देविकानद्यां महोदायां कुशप्रियम्॥ ३०<br>गोमत्यां छादितगदं शङ्खोद्धारे च शङ्खिनम्।<br>सुनेत्रं सैन्धवारण्ये शूरं शूरपुरे स्थितम्॥ ३१<br>रुद्राख्यं च हिरण्वत्यां वीरभद्रं त्रिविष्टपे।<br>शङ्कुकर्णं च भीमायां भीमं शालवने विदुः॥ ३२ | द्विजोत्तम! प्लक्षावतरणमें विश्वात्मक श्रीनिवास, शूर्पारकमें चतुर्बाहु एवं मगधामें सुधापति रूप स्थित हैं। गिरिव्रजमें पशुपति, यमुनातटपर श्रीकण्ठ एवं दण्डकारण्यमें मेरा वनस्पति रूप विख्यात है। कालिञ्जरमें नीलकण्ठ, सरयूमें उत्तम शम्भु और महाकोशीमें सभी पापोंका विनाश करनेवाला हंसयुक्त रूप स्थित है। दक्षिण गोकर्णमें शर्व, प्रजामुखमें वासुदेव, विन्ध्यपर्वतके शिखरमें महाशौरि और कन्यामें मधुसूदन रूप विद्यमान है। ब्रह्मन्! त्रिकूटपर्वतकी ऊँची चोटीपर चक्रपाणि ईश्वर, लौहदण्डमें हृषीकेश तथा कोसलामें मनोहर रूप वर्तमान हैं। सुराष्ट्रमें महाबाहु, नवराष्ट्रमें यशोधर, देविका नदीमें भूधर तथा महोदामें कुशप्रिय रूप स्थित है। गोमतीमें छादितगद, शङ्खोद्धारमें शङ्खी, सैन्धवारण्यमें सुनेत्र एवं शूरपुरमें शूररूप विद्यमान है। हिरण्वतीमें रुद्र, त्रिविष्टपमें वीरभद्र, भीमामें शङ्कुकर्ण और शालवनमें भीम नामक रूपको लोग जानते हैं॥ २५—३२॥ | | विश्वामित्रं च गदितं कैलासे वृषभध्वजम्।<br>महेशं महिलाशैले कामरूपे शशिप्रभम्॥ ३३<br>बलभ्यामपि गोमित्रं कटाहे पङ्कजप्रियम्।<br>उपेन्द्रं सिंहलद्वीपे शक्राहे कुन्दमालिनम्॥ ३४<br>रसातले च विख्यातं सहस्रशिरसं मुने।<br>कालाग्निरुद्रं तत्रैव तथाऽन्यं कृत्तिवाससम्॥ ३५<br>सुतले कूर्ममचलं वितले पङ्कजासनम्।<br>महातले गुरो ख्यातं देवेशं छागलेश्वरम्॥ ३६<br>तले सहस्रचरणं सहस्रभुजमीश्वरम्।<br>सहस्राक्षं परिख्यातं मुसलाकृष्टदानवम्॥ ३७ | कैलासमें वृषभध्वज और विश्वामित्र, महिलाशैलमें महेश और कामरूपमें शशिप्रभ रूप वर्तमान हैं। बलभीमें गोमित्र, कटाहमें पङ्कजप्रिय, सिंहलद्वीपमें उपेन्द्र एवं शक्राह्नमें कुन्दमाली नामक रूप स्थित है। मुने! रसातलमें विख्यात सहस्रशीर्षा एवं कालाग्नि-रुद्र तथा कृत्तिवासा नामक रूप विद्यमान हैं। गुरो! सुतलमें अचल कूर्म, वितलमें पङ्कजासन तथा महातलमें छागलेश्वर नामक विख्यात देवेशरूप स्थित है। तलमें सहस्रचरण, सहस्रबाहु एवं मुसलसे दानवको आकृष्ट करनेवाला मेरा सहस्राक्ष- |

४४२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ८९ ]

| पाताले योगिनामीशं स्थितं च हरिशङ्करम्।<br>धरातले कोकनदं मेदिन्यां चक्रपाणिनम्॥ ३८<br><br>भुवर्लोके च गरुडं स्वर्लोके विष्णुमव्ययम्।<br>महर्लोके तथाऽगस्त्यं कपिलं च जने स्थितम्॥ ३९<br><br>तपोलोकेऽखिलं ब्रह्मन् वाङ्मयं सत्यसंयुतम्।<br>ब्रह्माणं ब्रह्मलोके च सप्तमे वै प्रतिष्ठितम्॥ ४० | रूप अवस्थित है। पातालमें योगीश हरिशङ्कर, धरातलपर कोकनद तथा मेदिनीमें चक्रपाणिरूप वर्तमान है। भुवर्लोकमें गरुड, स्वर्लोकमें अव्यय विष्णु, महर्लोकमें अगस्त्य तथा जनलोकमें कपिल नामक रूप विद्यमान है। ब्रह्मन्! तपोलोकमें सत्यसे संयुक्त अखिल वाङ्मय एवं सप्तम ब्रह्मलोकमें ब्रह्मा नामक रूप प्रतिष्ठित है॥ ३३—४०॥ | | सनातनं तथा शैवे परं ब्रह्म च वैष्णवे।<br>अप्रतर्क्यं निरालम्बे निराकाशे तपोमयम्॥ ४१<br><br>जम्बूद्वीपे चतुर्बाहुं कुशद्वीपे कुशेशयम्।<br>प्लक्षद्वीपे मुनिश्रेष्ठ ख्यातं गरुडवाहनम्॥ ४२<br><br>पद्मनाभं तथा क्रौञ्चे शाल्मले वृषभध्वजम्।<br>सहस्त्रांशुः स्थितः शाके धर्मराट् पुष्करे स्थितः॥ ४३<br><br>तथा पृथिव्यां ब्रह्मर्षे शालग्रामे स्थितोऽस्म्यहम्।<br>सजलस्थलपर्यन्तं चरेषु स्थावरेषु च॥ ४४<br><br>एतानि पुण्यानि ममालयानि<br>ब्रह्मन् पुराणानि सनातनानि।<br>धर्मप्रदानीह महौजसानि<br>संकीर्तनीयान्यघनाशनानि ॥ ४५<br><br>संकीर्तनात् स्मरणाद् दर्शनाच्च<br>संस्पर्शनादेव च देवतायाः।<br>धर्मार्थकामाद्यपवर्गमेव<br>लभन्ति देवा मनुजाः ससाध्याः॥ ४६<br><br>एतानि तुभ्यं विनिवेदितानि<br>ममालयानीह तपोमयानि।<br>उत्तिष्ठ गच्छामि महासुरस्य<br>यज्ञं सुराणां हि हिताय विप्र॥ ४७ | शिवलोकमें सनातन, विष्णुलोकमें परम ब्रह्म, निरालम्बमें अप्रतर्क्य और निराकाशमें तपोमय नामक रूप स्थित है। मुनिश्रेष्ठ! जम्बूद्वीपमें चतुर्बाहु, कुशद्वीपमें कुशेशय और प्लक्षद्वीपमें गरुडवाहन नामसे विख्यात रूप वर्तमान है। क्रौञ्चद्वीपमें पद्मनाभ, शाल्मलद्वीपमें वृषभध्वज, शाकद्वीपमें सहस्रांशु तथा पुष्करद्वीपमें धर्मराज नामक रूप विद्यमान हैं। ब्रह्मर्षे! इसी प्रकार पृथ्वीमें मैं शालग्रामके भीतर अवस्थित हूँ। इस प्रकार जलसे लेकर स्थलपर्यन्त समस्त चराचरमें मैं वर्तमान हूँ। ब्रह्मन्! ये ही मेरे पुण्य, पुरातन एवं सनातन धर्मप्रद, अत्यन्त ओजस्वी, सङ्कीर्तनके योग्य एवं अघोंके नाश करनेवाले निवास-स्थान हैं। देव, मनुष्य और साध्यलोग देवताके कीर्तन, स्मरण, दर्शन और स्पर्श करनेसे ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करते हैं। विप्र! मैंने आपसे अपने इन तपोमय स्थानोंको कह दिया। हे विप्र! अब आप उठिये; देवताओंका हित-साधन करनेके लिये मैं बलिके यज्ञमें जाता हूँ॥ ४१–४७॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं महर्षे<br>विष्णुर्भरद्वाजमृषिं महात्मा।<br>विलासलीलागमनो गिरीन्द्रात्<br>स चाभ्यगच्छत् कुरुजाङ्गलं हि॥ ४८ | पुलस्त्यजी बोले— महर्षे! महात्मा विष्णु महर्षि भरद्वाजसे इस प्रकारका वचन कहकर मनोहर चालसे चलते हुए गिरीन्द्रसे कुरुजाङ्गलमें पहुँचे॥ ४८॥ |

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॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें नवासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८९॥


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अध्याय ९० ]भगवान् वामनके आगमनसे पृथ्वीकी क्षुब्धता४४३

नब्बेवाँ अध्याय

भगवान् वामनके आगमनसे पृथ्वीकी क्षुब्धता, बलि और शुक्रके संवाद-प्रसङ्गमें कोशकारकी कथा

| पुलस्त्य उवाच<br>ततः समागच्छति वासुदेवे<br>मही चकम्पे गिरयश्च चेलुः।<br>क्षुब्धाः समुद्रा दिवि ऋक्षमण्डलो<br>बभौ विपर्यस्तगतिर्महर्षे॥ १<br>यज्ञः समागात् परमाकुलत्वं<br>न वेद्मि किं मे मधुहा करिष्यति।<br>यथा प्रदग्धोऽस्मि महेश्वरेण<br>किं मां न संधक्ष्यति वासुदेवः॥ २<br>ऋक्साममन्त्राहूतिभिर्हुताभि-<br>र्वितानकीयान् ज्वलनास्तु भागान्।<br>भक्त्या द्विजेन्द्रैरपि सम्प्रपादितान्<br>नैव प्रतीच्छन्ति विभोर्भयेन॥ ३<br>तान् दृष्ट्वा घोररूपांस्तु उत्पातान् दानवेश्वरः।<br>पप्रच्छोशनसं शुक्रं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः॥ ४<br>किमर्थमाचार्य मही सशैला<br>रम्भेव वाताभिहता चचाल।<br>किमासुरीयान् सुहुतानपीह<br>भागान् न गृह्णन्ति हुताशनाश्च॥ ५<br>क्षुब्धाः किमर्थं मकरालयाश्च भो<br>ऋक्षा न खे किं प्रचरन्ति पूर्ववत्।<br>दिशः किमर्थं तमसा परिप्लुता<br>दोषेण कस्याद्य वदस्व मे गुरो॥ ६ | **पुलस्त्यजी बोले—**महर्षे! उसके बाद वामनका रूप धारण करनेवाले वासुदेवके आनेपर पृथ्वी काँपने लगी, पर्वत अपने स्थानसे डिग गये, समुद्रमें जोरसे लहरें उठने लगीं और आकाशमें तारासमूहकी गति अव्यवस्थित हो गयी। यज्ञ भी अत्यन्त व्याकुल हो गया और सोचने लगा—न जाने मधुसूदन भगवान् वासुदेव आकर मेरी क्या गति करेंगे? जैसे महेश्वरने मुझे दग्ध कर दिया था, क्या वासुदेव भी मुझे वैसे ही दग्ध (ध्वस्त) तो नहीं कर देंगे? अग्नि विष्णुके भयसे श्रेष्ठ द्विजोंके द्वारा श्रद्धापूर्वक ऋग्वेद एवं सामवेदके मन्त्रोंकी आहुतियोंसे हवन किये गये यज्ञीय भागोंको ग्रहण नहीं कर रहे थे। उन घोर उत्पातोंको देखकर दानवेश्वर (बलि)-ने उशना शुक्राचार्यको प्रणाम किया तथा हाथ जोड़कर उनसे पूछा—आचार्यजी! पर्वतोंके साथ पृथ्वी वायुके झोंकेसे केलेके वृक्षके समान क्यों काँप रही है और अग्निदेव भी विधिपूर्वक हवन किये गये आसुरीय भागोंको क्यों नहीं स्वीकार कर रहे हैं? समुद्रमें भयंकर लहरें क्यों उठ रही हैं? आकाशमें नक्षत्र पहलेकी भाँति क्यों नहीं सुव्यवस्थित रूपसे स्थित हैं और दिशाएँ क्यों अन्धकारसे भर गयी हैं? गुरो! मुझे आप कृपया यह बतलायें कि किसके अपराधसे यह सब हो रहा है?॥ १—६॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>शुक्रस्तद् वाक्यमाकर्ण्य विरोचनसुतेरितम्।<br>अथ ज्ञात्वा कारणं च बलिं वचनमब्रवीत्॥ ७ | **पुलस्त्यजी बोले—**विरोचनपुत्रके द्वारा कहे गये उस वाक्यको सुननेके बाद पूछे गये प्रश्नके कारणको जानकर शुक्राचार्यने बलिसे कहा—॥ ७॥ |

| ४४४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ९० | | :--- | :--- |

| शुक्र उवाच<br>शृणुष्व दैत्येश्वर येन भागान्<br>नामी प्रतीच्छन्ति हि आसुरीयान्।<br>हुताशना मन्त्रहुतानपीह<br>नूनं समागच्छति वासुदेवः॥ ८<br>तदङ्घ्रिविक्षेपमपारयन्ती<br>मही सशैला चलिता दितीश।<br>तस्यां चलत्यां मकरालयामी<br>उद्वृत्तवेला दितिजाद्य जाताः॥ ९ | शुक्राचार्यने कहा— दैत्येश्वर! सुनो। निश्चय ही वासुदेव आ रहे हैं। इसीलिये अग्निदेव मन्त्रके द्वारा आहुति देनेपर भी आसुरीय भागोंको नहीं ग्रहण कर रहे हैं। दितीश! उनके चरण रखनेके भारको सहन न कर सकनेके कारण पर्वतोंसहित पृथ्वी काँप रही हैं। दितिज! पृथ्वीके कम्पनसे ये समुद्र आज तटका उल्लङ्घन कर गये हैं॥ ८-९॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>शुक्रस्य वचनं श्रुत्वा बलिर्भार्गवमब्रवीत्।<br>धर्मं सत्यं च पथ्यं च सर्वोत्साहसमीरितम्॥ १० | पुलस्त्यजी बोले— शुक्राचार्यका वचन सुनकर बलिने उनसे धर्मसे युक्त, सत्य, कल्याणप्रद और सभी प्रकारके उत्साहसे भरा वचन कहा॥ १०॥ | | बलिरुवाच<br>आयाते वासुदेवे वद मम<br>भगवन् धर्मकामार्थतत्त्वं<br>किं कार्यं किं च देयं मणिकनक-<br>मथो भूगजाश्वादिकं वा।<br>किं वा वाच्यं मुरारेर्निजहित-<br>मथवा तद्धितं वा प्रयुञ्जे<br>तथ्यं पथ्यं प्रियं भो मम वद<br>शुभदं तत्करिष्ये न चान्यत्॥ ११ | बलिने कहा— भगवन्! वासुदेवके आनेपर मेरे करने योग्य धर्म, काम एवं अर्थके तत्त्वको बतलायें। मैं उन्हें मणि, स्वर्ण, पृथ्वी, हाथी अथवा अश्वमेंसे क्या दान करूँ? मैं मुरारिसे क्या कहूँ? अपना अथवा उनका क्या कल्याण सिद्ध करूँ? आप मुझे कल्याणकारी, मङ्गलमय तथा प्रिय तथ्य बतलायें। मैं वही करूँगा, अन्य कुछ नहीं करूँगा॥ ११॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>तद्वाक्यं भार्गवः श्रुत्वा दैत्यनाथेरितं वरम्।<br>विचिन्त्य नारद प्राह भूतभव्यविदीश्वरः॥ १२<br>त्वया कृता यज्ञभुजोऽसुरेन्द्रा<br>बहिष्कृता ये श्रुतिदृष्टमार्गे।<br>श्रुतिप्रमाणं मखभोजिनो बहिः<br>सुरास्तदर्थं हरिरभ्युपैति॥ १३<br>तस्याध्वरं दैत्यसमागतस्य<br>कार्यं हि किं मां परिपृच्छसे यत्।<br>कार्यं न देयं हि विभो तृणाग्रं<br>यदध्वरे भूकनकादिकं वा॥ १४ | पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! दैत्यपतिद्वारा कहे गये उस उत्तम वचनको सुननेके पश्चात् भूत एवं भविष्यके जाननेवाले भार्गवने विचार कर कहा— तुमने श्रुतिद्वारा प्रतिपादित मार्गमें अनधिकृत असुरेन्द्रों (दैत्यों)-को यज्ञभागका भोक्ता बनाया है एवं वेदप्रमाणके अनुसार यज्ञभोक्ता देवोंको अधिकाररहित कर दिया है। इसी कारण हरि आ रहे हैं। दैत्य! तुमने मुझसे जो प्रश्न किया कि यज्ञमें उनके आनेपर क्या करना चाहिये, तो (उसके विषयमें मेरा यह कहना है कि) यज्ञमें तिनकेके नोकके बराबर भी पृथ्वी या सुवर्ण आदि (कुछ भी) उन्हें नहीं देना चाहिये। |

अध्याय १० ] भगवान् वामनके आगमनसे पृथ्वीकी क्षुब्धता ४४५

वाच्यं तथा साम निरर्थकं विभो<br>कस्ते वरं दातुमलं हि शक्नुयात्।<br>यस्योदरे भूर्भुवनाकपाल-<br>रसातलेशा निवसन्ति नित्यशः॥ १५इस तरहका अर्थहीन और सामयुक्त वचन उनसे कहना चाहिये कि विभो! जिसके पेटमें भूलोक, भुवर्लोक एवं स्वर्लोकके स्वामी तथा रसातलके शासक सदा निवास करते हैं ऐसे आपको दान देनेमें कौन समर्थ हो सकता है? ॥ १२—१५ ॥
बलिरुवाच<br>मया न चोक्तं वचनं हि भार्गव<br>न चास्ति मह्यं न च दातुमुत्सहे।<br>समागतेऽप्यर्थिनि हीनवृत्ते<br>जनार्दने लोकपतौ कथं तु॥ १६बलिने कहा— भार्गव! मैंने निम्नकोटिकी वृत्तिवाले याचकके आनेपर भी यह बात नहीं कही कि मेरे पास कुछ नहीं है और मैं देना नहीं चाहता तो लोकपति जनार्दनके याचक बनकर आनेपर मैं इस प्रकार कैसे कह सकता हूँ।
एवं च श्रूयते श्लोकः सतां कथयतां विभो।<br>सद्भावो ब्राह्मणेष्वेव कर्तव्यो भूतिमिच्छता।<br>दृश्यते हि तथा तच्च सत्यं ब्राह्मणसत्तम॥ १७विभो! सज्जनोंके द्वारा कही गयी इस तरहकी पवित्र वाणी सुनी जाती है कि ऐश्वर्य चाहनेवाले मनुष्यको ब्राह्मणोंके प्रति अच्छे भाव रखने चाहिये। ब्राह्मणश्रेष्ठ! यह सत्य भी मालूम होता है कि
पूर्वाभ्यासेन कर्माणि सम्भवन्ति नृणां स्फुटम्।<br>वाक्कायमानशानीह योन्यन्तरगतान्यपि॥ १८वचन, शरीर एवं मनके द्वारा किये गये मनुष्योंके कर्म दूसरी योनियोंमें भी पहलेके अभ्याससे स्पष्टरूपसे प्रकट होते हैं।
किं वा त्वया द्विजश्रेष्ठ पौराणी न श्रुता कथा।<br>या वृत्ता मलये पूर्वं कोशकारसुतस्य तु॥ १९द्विजश्रेष्ठ! प्राचीन कालमें मलयपर्वतपर घटित हुई कोशकारके पुत्रकी प्राचीन कथाको क्या आपने नहीं सुना है? ॥ १६—१९॥
शुक्र उवाच<br>कथयस्व महाबाहो कोशकारसुताश्रयाम्।<br>कथां पौराणिकीं पुण्यां महाकौतूहलं हि मे॥ २०शुक्राचार्यने कहा— महाबाहो! कोशकारकी पुत्रसम्बन्धिनी पवित्र प्राचीन कथाको मुझसे कहो। उसे सुननेके लिये मुझे महान् कौतूहल हो रहा है॥ २०॥
बलिरुवाच<br>शृणुष्व कथयिष्यामि कथामेतां मखान्तरे।<br>पूर्वाभ्यासनिबद्धां हि सत्यां भृगुकुलोद्वह॥ २१बलिने कहा— भृगुकुलश्रेष्ठ! पूर्वके अभ्याससे सम्बद्ध इस सत्य कथाको मैं यज्ञमें कह रहा हूँ; आप सुनें।
मुद्गलस्य मुनेः पुत्रो ज्ञानविज्ञानपारगः।<br>कोशकार इति ख्यात आसीद् ब्रह्मांस्तपोरतः॥ २२ब्रह्मन्! महर्षि मुद्गलका कोशकार नामसे प्रसिद्ध एवं ज्ञान और विज्ञानसे सम्पन्न एक तपस्वी पुत्र था।
तस्यासीद् दयिता साध्वी धर्मिष्ठा नामतः श्रुता।<br>सती वात्स्यायनसुता धर्मशीला पतिव्रता॥ २३उसकी पत्नीका नाम था धर्मिष्ठा। वह वात्स्यायनकी कन्या पतिव्रता, साध्वी, धर्मका आचरण करनेवाली तथा पतिकी सेवा करनेमें निष्ठा रखनेवाली थी।
तस्यामस्य सुतो जातः प्रकृत्या वै जडाकृतिः।<br>मूकवन्नालपति स न च पश्यति चान्धवत्॥ २४उस स्त्रीके गर्भसे एक पुत्र हुआ, जो स्वभावसे ही मूढ़ था। वह गूँगे मनुष्यकी तरह न बोलता और अन्धेकी भाँति वह देखता भी नहीं था।
तं जातं ब्राह्मणी पुत्रं जडं मूकं त्वचक्षुषम्।<br>मन्यमाना गृहद्वारि षष्ठेऽहनि समुत्सृजत्॥ २५अपने उस जन्मे हुए पुत्रको मूर्ख, गूँगा और अंधा समझकर ब्राह्मणीने छठे दिन उसे घरके द्वारपर फेंक दिया।
४४६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ९०
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततोऽभ्यागाद् दुराचारा राक्षसी जातहारिणी।<br>स्वं शिशुं कृशमादाय सूर्पाक्षी नाम नामतः॥ २६<br>तत्रोत्सृज्य स्वपुत्रं सा जग्राह द्विजनन्दनम्।<br>तमादाय जगामाथ भोक्तुं शालोदरे गिरौ॥ २७<br>ततस्तामागतां वीक्ष्य तस्या भर्ता घटोदरः।<br>नेत्रहीनः प्रत्युवाच किमानीतस्त्वया प्रिये॥ २८उसके बाद सूर्पाक्षी नामकी एक दुराचारिणी एवं नवजात बालकोंको चुरा लेनेवाली राक्षसी अपने दुबले-पतले पुत्रको लेकर वहाँ आयी और अपने पुत्रको वहाँ छोड़कर उसने ब्राह्मणपुत्रको उठा लिया। उसे लेकर खानेके लिये शालोदर नामक पर्वतपर चली गयी। उसके बाद उसे आयी हुई जानकर घटोदर नामके उसके अंधे पतिने पूछा—प्रिये! तुम क्या लायी हो?॥ २१—२८॥
साऽब्रवीद् राक्षसपते मया स्थाप्य निजं शिशुम्।<br>कोशकारद्विजगृहे तस्यानीतः प्रभो सुतः॥ २९<br>स प्राह न त्वया भद्रे भद्रमाचरितं त्विति।<br>महाज्ञानी द्विजेन्द्रोऽसौ ततः शप्स्यति कोपितः॥ ३०<br>तस्माच्छीघ्रमिमं त्यक्त्वा मनुजं घोररूपिणम्।<br>अन्यस्य कस्यचित् पुत्रं शीघ्रमानय सुन्दरि॥ ३१<br>इत्येवमुक्ता सा रौद्रा राक्षसी कामचारिणी।<br>समाजगाम त्वरिता समुत्पत्य विहायसम्॥ ३२<br>स चापि राक्षससुतो निसृष्टो गृहबाह्यतः।<br>रुरोद सुस्वरं ब्रह्मन् प्रक्षिप्याङ्गुष्ठमानने॥ ३३<br>सा क्रन्दितं चिराच्छ्रुत्वा धर्मिष्ठा पतिमब्रवीत्।<br>पश्य स्वयं मुनिश्रेष्ठ सशब्दस्तनयस्तव॥ ३४<br>त्रस्ता सा निर्जगामाथ गृहमध्यात् तपस्विनी।<br>स चापि ब्राह्मणश्रेष्ठः समपश्यत तं शिशुम्॥ ३५<br>वर्णरूपादिसंयुक्तं यथा स्वतनयं तथा।<br>ततो विहस्य प्रोवाच कोशकारो निजां प्रियाम्॥ ३६उसने कहा—राक्षसपते! प्रभो! मैं अपने बच्चेको कोशकार मुनिके घरमें रखकर उनके पुत्रको लायी हूँ। राक्षसने कहा—भद्रे! तुमने यह ठीक नहीं किया। वह श्रेष्ठ ब्राह्मण महाज्ञानी तो है; किंतु वह (इस कार्यसे) कुपित होकर (तुम्हें) शाप दे देगा। सुन्दरि! इसलिये शीघ्र इस रौद्र रूपवाले मनुष्यको छोड़कर तुम किसी दूसरेके पुत्रको ले आओ। ऐसा कहनेपर वह स्वच्छन्दचारिणी डरावनी राक्षसी आकाशमें उड़ती हुई शीघ्र (वहाँ) चली गयी। ब्रह्मन्! घरके बाहर छोड़ा गया वह राक्षसपुत्र भी मुखमें अँगूठा डालकर उच्च स्वरसे रोने लगा। उस धर्मिष्ठाने अधिक समयके बाद रुलाई सुनकर पतिसे कहा—मुनिश्रेष्ठ! पुत्रको स्वयं देखिये, आपका यह पुत्र शब्द करने लगा। डरकर वह तपस्विनी गृहके भीतरसे बाहर निकली। उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने भी उस शिशुको देखा। अपने पुत्रके ही समान रंग और रूप आदिसे युक्त उस बालकको देखकर कोशकार मुनिने हँसकर अपनी पत्नीसे कहा—॥ २९—३६॥
एतेनाविश्य धर्मिष्ठे भाव्यं भूतेन साम्प्रतम्।<br>कोऽप्यस्माकं छलयितुं सुरूपी भुवि संस्थितः॥ ३७<br>इत्युक्त्वा वचनं मन्त्री मन्त्रैस्तं राक्षसात्मजम्।<br>बबन्धोल्लिख्य वसुधां सकुशेनाथ पाणिना॥ ३८<br>एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ता सूर्पाक्षी विप्रबालकम्।<br>अन्तर्धानगता भूमौ चिक्षेप गृहदूरतः॥ ३९धर्मिष्ठे! इस बालकके अंदर अवश्य कोई भूत प्रवेश कर गया है। हमलोगोंको धोखा देनेके लिये सुन्दर रूपवाला कोई (भूत) इस स्थानपर विद्यमान है। ऐसा कहकर उस मन्त्रवेत्ताने हाथमें कुशा लेकर मन्त्रोंके द्वारा भूमिको रेखासे अङ्कितकर राक्षसपुत्रको बाँध दिया। इसी बीच सूर्पाक्षी वहाँ पहुँची और अदृश्यरूपमें (छिपकर) घरसे दूर स्थित होकर उसने ब्राह्मणके बालकको फेंका।