भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ८६ ] स्तोत्रोंके क्रममें पुलस्त्यजीद्वारा उपदिष्ट महेश्वर-कथित पापप्रशमनस्तोत्र ४२७

हुताशनेन प्रहिता मम जिह्वाग्रसंस्थिता।<br>जगादैनं स्तवं विष्णोः सर्वेषां चोपशान्तिदम्॥ ११३<br><br>अनेनैव जगन्नाथं त्वमाराधय केशवम्।<br>ततः शापापनोदं तु स्तुते लप्स्यसि केशवे॥ ११४<br><br>अहर्निशं हृषीकेशं स्तवेनानेन राक्षस।<br>स्तुहि भक्तिं दृढां कृत्वा ततः पापाद् विमोक्ष्यसे॥ ११५<br><br>स्तुतो हि सर्वपापानि नाशयिष्यत्यसंशयम्।<br>स्तुतो हि भक्त्या नृणां वै सर्वपापहरो हरिः॥ ११६<br><br>पुलस्त्य उवाच<br>ततः प्रणम्य तं विप्रं प्रसाद्य स निशाचरः।<br>तदैव तपसे श्रीमान् शालग्राममगाद् वशी॥ ११७<br><br>अहर्निशं स एवैनं जपन् सारस्वतं स्तवम्।<br>देवक्रियारतिर्भूत्वा तपस्तेपे निशाचरः॥ ११८<br><br>समाराध्य जगन्नाथं स तत्र पुरुषोत्तमम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकमवाप्तवान्॥ ११९<br><br>एतत्ते कथितं ब्रह्मन् विष्णोः सारस्वतं स्तवम्।<br>विप्रवक्त्रस्थया सम्यक् सरस्वत्या समीरिमितम्॥ १२०<br><br>य एतत् परमं स्तोत्रं वासुदेवस्य मानवः।<br>पठिष्यति स सर्वेभ्यः पापेभ्यो मोक्षमाप्स्यति॥ १२१उसे मैंने तुमसे कह दिया। अग्निदेवसे भेजी गयी एवं मेरी जिह्वाके अग्रभागमें स्थित सरस्वतींने सभीको शान्ति देनेवाले इस विष्णुस्तोत्रको कहा है। तुम इसीसे जगत्स्वामी केशवकी आराधना करो। उसके बाद केशवकी स्तुति करनेसे तुम शापसे मुक्त हो जाओगे। राक्षस! इस स्तुतिके द्वारा दृढ़ भक्तिपूर्वक दिन-रात हृषीकेशकी स्तुति करो। तब तुम पापसे मुक्त हो जाओगे। स्तुति किये गये हरि निःसंदेह समस्त पापोंको नष्ट करेंगे। भक्तिपूर्वक स्तुति करनेसे सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाले हरि मनुष्योंके सब पापोंका नाश कर देते हैं॥ ११२—११६॥<br><br>पुलस्त्यजी बोले—उसके बाद आत्मनिष्ठ वह राक्षस ब्राह्मणको प्रणाम एवं प्रसन्न करनेके पश्चात् उसी समय तपस्याके लिये शालग्राम नामक स्थानमें चला गया। वह राक्षस दिन-रात इसी सारस्वतस्तोत्रका जप करते हुए देवक्रियामें लीन होकर तप करने लगा। वहाँ पुरुषोत्तम जगन्नाथकी पूजा कर सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर उसने विष्णुलोक प्राप्त किया। ब्रह्मन्! मैंने तुमसे ब्राह्मणके मुखसे सरस्वतीद्वारा कहा गया विष्णुका यह सारस्वतस्तोत्र कहा। वासुदेवके इस श्रेष्ठ स्तोत्रको पढ़नेवाला मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जायगा॥ ११७—१२१॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पचासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८५॥


छियासीवाँ अध्याय

स्तोत्रोंके क्रममें पुलस्त्यजीद्वारा उपदिष्ट महेश्वर-कथित पापप्रशमनस्तोत्र

पुलस्त्य उवाच<br><br>नमस्तेऽस्तु जगन्नाथ देवदेव नमोऽस्तु ते।<br>वासुदेव नमस्तेऽस्तु बहुरूप नमोऽस्तु ते॥ १पुलस्त्यजी बोले—हे जगन्नाथ! आपको नमस्कार है। हे देवदेव! आपको नमस्कार है। हे वासुदेव! आपको नमस्कार है। हे अनन्त रूप धारण करनेवाले!