भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 446, कुल 489 में से

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| ४३६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८८ | | :--- | :--- |

| कृतान्ते त्वाश्रमी मोक्षः कामस्त्रेतान्तरे श्रमी।<br>आश्रम्यर्थो द्वापरान्ते तिष्यादौ धर्म आश्रमी ॥ १९<br><br>तान्‍याश्रमाणि मुनयो दृष्ट्वात्रेयादयोऽव्ययाः।<br>तत्रैव च रतिं चक्रुरखण्डे सलिलाप्लुते ॥ २०<br><br>धर्माद्यैर्भगवान् विष्णुरखण्ड इति विश्रुतः।<br>चतुर्मूर्तिर्जगन्नाथः पूर्वमेव प्रतिष्ठितः ॥ २१<br><br>तमर्चयन्ति ऋषयो योगात्मानो बहुश्रुताः।<br>शुश्रूषयाऽथ तपसा ब्रह्मचर्येण नारद ॥ २२<br><br>एवं ते न्यवसंस्तत्र समेता मुनयो वने।<br>असुरेभ्यस्तदा भीताः स्वाश्रित्याखण्डपर्वतम् ॥ २३<br><br>तथाऽन्ये ब्राह्मणा ब्रह्मन् अश्मकुट्टा मरीचिपाः।<br>स्नात्वा जले हि कालिन्द्याः प्रजग्मुर्दक्षिणामुखाः ॥ २४ | सत्ययुगके अन्तमें मोक्ष अपने आश्रममें निवास करने लगता है, त्रेतामें काम आश्रमवासी हो जाता है, द्वापरके अन्तमें अर्थ आश्रमी बन जाता है और कलिके आदिमें धर्म आश्रममें रहना प्रारम्भ करता है। अव्यय, आत्रेय आदि मुनियोंने उन आश्रमोंको देखकर अखण्ड जलसे परिपूर्ण उस स्थानमें सुखसे रहनेका निश्चय किया। धर्म आदिके द्वारा भगवान् विष्णु अखण्ड नामसे विख्यात हैं। जगन्नाथ चार मूर्तियोंवाले हैं, यह पहलेसे ही निश्चित है। नारदजी ! बहुश्रुत योगात्मा ऋषिलोग सेवा, तप और ब्रह्मचर्यके द्वारा उनकी पूजा करते हैं। असुरोंसे त्रस्त होकर वे मुनिगण सम्मिलितरूपसे उस अखण्ड पर्वतका भलीभाँति आश्रयण कर रहने लगे। ब्रह्मन् ! केवल पत्थरसे कूटे हुए अन्नको खानेवाले वानप्रस्थी साधु तथा सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले अन्य ब्राह्मण आदि कालिन्दीके जलमें स्नान कर दक्षिण दिशाकी ओर चले गये ॥ १७—२४॥ | | अवन्तिविषयं प्राप्य विष्णुमासाद्य संस्थिताः।<br>विष्णोरपि प्रसादेन दुष्प्रवेशं महासुरैः ॥ २५<br><br>बालखिल्यादयो जग्मुरवशा दानवाद् भयात्।<br>रुद्रकोटिं समाश्रित्य स्थितास्ते ब्रह्मचारिणः ॥ २६<br><br>एवं गतेषु विप्रेषु गौतमाङ्गिरसादिषु।<br>शुक्रस्तु भार्गवान् सर्वान् निन्ये यज्ञविधौ मुने ॥ २७<br><br>अधिष्ठिते भार्गवैस्तु महायज्ञेऽमितद्युते।<br>यज्ञदीक्षां बलेः शुक्रश्चकार विधिना स्वयंम् ॥ २८<br><br>श्वेताम्बरधरो दैत्यः श्वेतमाल्यानुलेपनः।<br>मृगाजिनावृतः पृष्ठे बर्हिपत्रविचित्रितः ॥ २९<br><br>समास्ते वितते यज्ञे सदस्यैरभिसंवृतः।<br>हयग्रीवप्रलम्बाद्यैर्मयबाणपुरोगमैः ॥ ३०<br><br>पत्नी विन्ध्यावली चास्य दीक्षिता यज्ञकर्मणि।<br>ललनानां सहस्त्रस्य प्रधाना ऋषिकन्यका ॥ ३१<br><br>शुक्रेणाश्वः श्वेतवर्णो मधुमासे सुलक्षणः।<br>महीं विहर्तुमुत्सृष्टस्तारकाक्षोऽन्वगाच्च तम् ॥ ३२ | वे विष्णुभगवान्‌की कृपासे महान् असुरोंके कारण प्रवेश पानेमें कठिन अवन्ति नगरीमें पहुँचे और उनके निकट रहने लगे। दानवोंके डरसे विवश होकर बालखिल्य आदि ब्रह्मचारी ऋषि रुद्रकोटि चले गये और वहाँ रहने लगे। मुने! इस प्रकार गौतम और आङ्गिरस आदि ब्राह्मणोंके चले जानेपर शुक्राचार्य सभी भार्गववंशीय ब्राह्मणोंको यज्ञ-कार्यमें ले गये। अमिततेजस्विन्! भार्गव-वंशीय ब्राह्मणोंसे अधिकृत शुक्राचार्यने बलिको महायज्ञमें स्वयं विधिवत् यज्ञकी दीक्षा दी। श्वेत वस्त्र धारण करनेवाले, श्वेत माल्य एवं अनुलेपनसे युक्त, मृग-चर्मसे आवृत एवं मयूरपुच्छसे सुसज्जित दैत्य बलिने हयग्रीव, प्रलम्ब, मय एवं बाण आदि सदस्योंसे घिरे हुए विस्तृत यज्ञ-मण्डपमें आसन ग्रहण किया। उसकी पत्नी विन्ध्यावली भी यज्ञकर्ममें दीक्षित हुई। वह ऋषि-कन्या हजारों ललनाओंमें प्रधान थी। शुक्राचार्यने चैत्रमासमें सुलक्षण अश्व पृथ्वीपर विचरण करनेके लिये छोड़ा। तारकाक्ष नामका असुर उसके पीछे-पीछे चलने लगा ॥ २५—३२॥ |

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