वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ८८ ] बलिका कुरुक्षेत्रमें आना, वहाँके मुनियोंका पलायन, वामनका आविर्भाव ४३५
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्यां स्नात्वाऽर्च्य देवर्षे सर्व एव महर्षयः।<br>ऐरावतीं सुपुण्योदां स्नात्वा जग्मुरथेश्वरीम्॥ ६<br><br>देविकाया जले स्नात्वा पयोष्ण्यां चैव तापसाः।<br>अवतीर्णा मुने स्नातुमात्रेयाद्याः शुभां नदीम्॥ ७<br><br>ततो निमग्ना ददृशुः प्रतिबिम्बमथात्मनः।<br>अन्तर्जले द्विजश्रेष्ठ महदाश्चर्यकारकम्॥ ८ | देवर्षे! उसमें स्नान और अर्चन करनेके बाद सभी महर्षि पवित्र जलवाली ऐरावती नदीके निकट गये तथा उसमें स्नान करके ईश्वरी नदीके तटपर चले गये। मुने! देविका और पयोष्णीमें स्नान करके आत्रेय आदि तपस्वियोंने शुभा नामकी नदीमें स्नान करनेके लिये प्रवेश किया। द्विजश्रेष्ठ! जलमें गोता लगानेपर उन लोगोंने जलके भीतर महान् आश्चर्य उत्पन्न करनेवाली अपनी-अपनी परछाई देखी॥ ६-८॥ |
| उन्मज्जने च ददृशुः पुनर्विस्मितमानसाः।<br>ततः स्नात्वा समुत्तीर्णा ऋषयः सर्व एव हि॥ ९<br><br>जग्मुस्ततोऽपि ते ब्रह्मन् कथयन्तः परस्परम्।<br>चिन्तयन्तश्च सततं किमेतदिति विस्मिताः॥ १०<br><br>ततो दूरादपश्यन्त वनषण्डं सुविस्तृतम्।<br>वनं हरगलश्यामं खगध्वनिनिनादितम्॥ ११<br><br>अतितुङ्गतया व्योम आवृण्वानं नगोत्तमम्।<br>विस्तृताभिर्जटाभिस्तु अन्तर्भूमिं च नारद॥ १२<br><br>काननं पुष्पितैर्वृक्षैरतिभाति समन्ततः।<br>दशार्द्धवर्णैः सुखदैर्नभस्तारागणैरिव॥ १३<br><br>तं दृष्ट्वा कमलैर्व्याप्तं पुण्डरीकैश्च शोभितम्।<br>तद्वत् कोकनदैर्व्याप्तं वनं पद्मवनं यथा॥ १४<br><br>प्रजग्मुस्तुष्टिमंतुलां ते ह्लादं परमं ययुः।<br>विविशुः प्रीतमनसो हंसा इव महासरः॥ १५<br><br>तन्मध्ये ददृशुः पुण्यमाश्रमं लोकपूजितम्।<br>चतुर्णां लोकपालानां वर्गाणां मुनिसत्तम॥ १६ | महर्षियोंने डुबकी लगानेके बाद जब सिर ऊपर किया, तब पुनः वैसा ही देखा; इससे वे आश्चर्यमें भर गये। उसके बाद स्नान करके सभी ऋषि बाहर निकले। ब्रह्मन्! उसके पश्चात् वे सभी लोग यह क्या है?—इस विषयमें आश्चर्यपूर्वक आपसमें बातचीत एवं विचार-विमर्श करते हुए वहाँसे भी चले गये। उसके बाद उन लोगोंने दूरसे ही अतिविस्तृत, शंकरके कण्ठकी भाँति श्यामवर्णवाले और पक्षियोंकी ध्वनिसे भरा एक वृक्षोंका समूह (वन) देखा। नारदजी! वह वन अत्यन्त ऊँचा होनेके कारण आकाशको घेरे हुए था तथा उसकी नीचेकी भूमि बिखरे हुए फूलोंसे ढकी रहती थी। वह वन तारागणोंसे जगमगाते हुए आकाशके समान खिले हुए पाँचरंगे वृक्षोंसे बहुत सुन्दर लग रहा था। कमल-वनके समान कमलोंसे व्याप्त, पुण्डरीकोंसे विभूषित एवं कोकनदोंसे भरे उस वनको देखकर वे अत्यन्त प्रसन्न एवं गद्गद हो गये। वे लोग संतुष्ट-चित्तसे उसमें इस प्रकार प्रविष्ट हुए, जिस प्रकार हंस महासरोवरमें प्रवेश करते हैं। मुनिसत्तम! उन लोगोंने उसके बीचमें लोकपालोंके चार वर्गों (धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष)-का लोकपूजित पवित्र आश्रम देखा॥ ९—१६॥ |
| धर्माश्रमं प्राङ्मुखं तु पलाशविटपावृतम्।<br>प्रतीच्याभिमुखं ब्रह्मन् अर्थस्येक्षुवनावृतम्॥ १७<br><br>दक्षिणाभिमुखं काम्यं रम्भाशोकवनावृतम्।<br>उदङ्मुखं च मोक्षस्य शुद्धस्फटिकवर्चसम्॥ १८ | ब्रह्मन्! पूर्व दिशाकी ओर मुखवाला पलाशवृक्षसे घिरा हुआ धर्माश्रम, पश्चिममुख इक्षुवनसे घिरा हुआ अर्थाश्रम, दक्षिणकी ओर कदली और अशोकके वनसे घिरा हुआ कामाश्रम तथा उत्तरकी ओर शुद्धस्फटिकके समान तेजस्वी मोक्षाश्रम स्थित था। |