भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 444, कुल 489 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 444
४३४श्रीवामनपुराण[ अध्याय ८८

| अप्रतर्क्यं चतुर्बाहुं सहस्त्रांशुं तपोमयम्।<br>नमस्ये धर्मराजानं देवं गरुडवाहनम्॥ २६<br><br>सर्वभूतगतं शान्तं निर्मलं सर्वलक्षणम्।<br>महायोगिनमव्यक्तं नमस्ये पापनाशनम्॥ २७<br><br>निरञ्जनं निराकारं निर्गुणं निर्मलं पदम्।<br>नमस्ये पापहन्तारं शरण्यं शरणं व्रजे॥ २८<br><br>एतत् पवित्रं परमं पुराणं<br>प्रोक्तं त्वगस्त्येन महर्षिणा च।<br>धन्यं यशस्यं बहुपापनाशनं<br>संकीर्तनात् स्मरणात् संश्रवाच्च॥ २९ | मैं अनुमानसे परे, चार भुजाधारी, सहस्रांशु, तपोमूर्ति, धर्मराज गरुड़वाहन देवको नमस्कार करता हूँ। मैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें व्याप्त, शान्तस्वरूप, निर्मल, समस्त लक्षणोंसे युक्त, महान् योगी, अव्यक्तस्वरूप एवं पाप नाश करनेवाले भगवान्‌को नमस्कार करता हूँ। मैं निरञ्जन, निराकार, गुणोंसे रहित, निर्मलपदस्वरूप, पाप हरण करनेवालेको नमस्कार करता हूँ तथा शरणागतकी रक्षा करनेवालेकी शरणमें जाता हूँ। महर्षि अगस्त्यने इस परम पवित्र पुरातन स्तोत्रको कहा था। इसके कथन, स्मरण तथा श्रवण करनेसे अनेक पापोंका विनाश हो जाता है और मनुष्य धन्य एवं यशस्वी हो जाता है॥ २५—२९॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्तासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८७॥


अट्टासीवाँ अध्याय

बलिको कुरुक्षेत्रमें आना, वहाँके मुनियोंका पलायन, वामनका आविर्भाव, उनकी स्तुति, बलिके यज्ञमें जानेकी उत्कण्ठा और भरद्वाजसे स्वस्थानका कथन

पुलस्त्य उवाचपुलस्त्यजी बोले—
गतेऽथ तीर्थयात्रायां प्रह्लादे दानवेश्वरे।<br>कुरुक्षेत्रं समभ्यागाद् यष्टुं वैरोचनो बलिः॥ १दानवेश्वर प्रह्लादके तीर्थयात्राके लिये चले जानेपर विरोचनका पुत्र बलि कुरुक्षेत्रमें यज्ञ करनेके लिये गया।
तस्मिन् महाधर्मयुते तीर्थे ब्राह्मणपुङ्गवः।<br>शुक्रो द्विजातिप्रवरानामन्रयत् भार्गवान्॥ २उस महान् धर्मयुक्त तीर्थमें ब्राह्मणश्रेष्ठ शुक्राचार्यने द्विजोंमें अत्यन्त श्रेष्ठ भार्गवोंको आमन्त्रित किया।
भृगूनामन्त्र्यमाणान् वै श्रुत्वात्रेयाः सगौतमाः।<br>कौशिकाङ्गिरसश्चैव तत्यजुः कुरुजाङ्ग्लान्॥ ३भृगुवंशीय ब्राह्मणोंका आमन्त्रित किया जाना सुनकर अत्रि, गौतम, कौशिक और अङ्गिरागोत्रीय ब्राह्मणोंने कुरुजाङ्गलका त्याग कर दिया।
उत्तराशां प्रजग्मुस्ते नदीमनु शतद्रुकाम्।<br>शातद्रवे जले स्नात्वा विपाशां प्रययुस्ततः॥ ४वे उत्तर दिशामें शतद्रु नदीके तटपर गये। शतद्रुके जलमें स्नान करनेके बाद वे वहाँसे विपाशा नदीके निकट चले गये।
विज्ञाय तत्राप्यरतिं स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः।<br>प्रजग्मुः किरणां पुण्यां दिनेशकिरणच्युताम्॥ ५वहाँ भी मनके अनुकूल न होनेके कारण वे सब स्नान करनेके पश्चात् पितरों एवं देवोंका पूजन कर सूर्यकी किरणोंसे उत्पन्न किरणा नदीके समीप गये।