भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ८८ ] बलिका कुरुक्षेत्रमें आना, वहाँके मुनियोंका पलायन, वामनका आविर्भाव ४३७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवमश्वे समुत्सृष्टे वितथे यज्ञकर्मणि।<br>गते च मासत्रितये हूयमाने च पावके ॥ ३३<br>पूज्यमानेषु दैत्येषु मिथुनस्थे दिवाकरे।<br>सुषुवे देवजननी माधवं वामनाकृतिम् ॥ ३४<br>तं जातमात्रं भगवन्तमीशं<br>नारायणं लोकपतिं पुराणम्।<br>ब्रह्मा समभ्येत्य समं महर्षिभिः<br>स्तोत्रं जगादाथ विभोर्महर्षे ॥ ३५<br>नमोऽस्तु ते माधव सत्त्वमूर्ते<br>नमोऽस्तु ते शाश्वत विश्वरूप।<br>नमोऽस्तु ते शत्रुवनेन्धनाग्ने<br>नमोऽस्तु वै पापमहादवाग्ने ॥ ३६<br>नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन।<br>नमस्ते जगदाधार नमस्ते पुरुषोत्तम ॥ ३७<br>नारायण जगन्मूर्ते जगन्नाथ गदाधर।<br>पीतवासः श्रियःकान्त जनार्दन नमोऽस्तु ते ॥ ३८<br>भवांस्त्राता च गोप्ता च विश्वात्मा सर्वगोऽव्ययः।<br>सर्वधारी धराधारी रूपधारी नमोऽस्तु ते ॥ ३९<br>वर्धस्व वर्धिताशेषत्रैलोक्य सुरपूजित।<br>कुरुष्व दैवतपते मघोनोऽश्रुप्रमार्जनम् ॥ ४०<br>त्वं धाता च विधाता च संहर्ता त्वं महेश्वरः।<br>महालय महायोगिन् योगशायिन् नमोऽस्तु ते ॥ ४१इस प्रकार उस अश्वके छोड़े जानेपर यज्ञकर्मके चलते हुए अग्निमें हवन करते तीन मास व्यतीत हो जानेपर तथा दैत्योंके पूजित होने और सूर्यके मिथुन-राशिमें सङ्क्रमण करनेपर देवमाता अदितिने वामनके आकारवाले माधवको जन्म दिया। महर्षे! उन भगवान्, ईश, नारायण लोकपति पुराण-पुरुषके अवतार होते ही ब्रह्मा महर्षियोंके साथ उनके निकट गये तथा (उन) विभुकी स्तुति करने लगे। हे माधव! हे सत्त्वमूर्ते! आपको नमस्कार है। हे शाश्वत! हे विश्वरूप! आपको नमस्कार है। शत्रुरूपी वनके ईंधनके लिये हे अग्निस्वरूप! आपको नमस्कार है। पापरूपी वनके लिये हे महादवाग्निस्वरूप! आपको नमस्कार है। हे पुण्डरीकाक्ष! आपको नमस्कार है। हे विश्वकी सृष्टि करनेवाले! आपको नमस्कार है। हे जगत्के आधार! आपको नमस्कार है। हे पुरुषोत्तम! आपको नमस्कार है। हे नारायण! हे जगन्मूर्ते! हे जगन्नाथ! हे गदाधर! हे पीताम्बर धारण करनेवाले! हे लक्ष्मीपते! हे जनार्दन! आपको नमस्कार है। आप पालन करनेवाले, रक्षक, विश्वकी आत्मा, सर्वत्र गमन करनेवाले, अविनाशी, सबको धारण करनेवाले, पृथिवीको धारण करनेवाले तथा रूप धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। हे देवपूजित! हे सारी त्रिलोकीको बढ़ानेवाले! आपका अभ्युदय हो। हे दैवतपते! आप इन्द्रके आँसू पोंछें। आप धाता, विधाता, संहर्ता, महेश्वर, महालय, महायोगी और योगशायी हैं। आपको नमस्कार है॥ ३३—४१॥
इत्थं स्तुतो जगन्नाथः सर्वात्मा सर्वगो हरिः।<br>प्रोवाच भगवान् मह्यं कुरूपनयनं विभो ॥ ४२<br>ततश्चकार देवस्य जातकर्मादिकाः क्रियाः।<br>भरद्वाजो महातेजा बार्हस्पत्यस्तपोधनः ॥ ४३<br>व्रतबन्धं तथेशस्य कृतवान् सर्वशास्त्रवित्।<br>ततो ददुः प्रीतियुताः सर्व एव वरान् क्रमात् ॥ ४४इस प्रकारकी स्तुति किये जानेपर सर्वात्मा, सर्वगामी जगन्नाथभगवान् श्रीहरिने कहा—विभो! मेरा उपनयन-संस्कार कीजिये। उसके बाद बृहस्पतिवंशमें उत्पन्न महातेजस्वी तपोधन भरद्वाजने वामनकी जातकर्म आदि सभी क्रियाएँ सम्पन्न करायीं। उसके पश्चात् सभी शास्त्रोंके वेत्ता भरद्वाजने ईश्वरका व्रतबन्ध (यज्ञोपवीत) कराया। उसके बाद अन्य सभीने प्रसन्न होकर वटुकको क्रमशः श्रेष्ठ दान दिये।