वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४३८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८८ | | :--- | :--- |
| संस्कृत | हिन्दी |
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| यज्ञोपवीतं पुलहस्त्वहं च सितवाससी।<br>मृगाजिनं कुम्भयोनिर्भरद्वाजस्तु मेखलाम् ॥ ४५<br>पालाशनददद् दण्डं मरीचिर्ब्रह्मणः सुतः।<br>अक्षसूत्रं वारुणिस्तु कौशयं वेदमथाङ्गिराः ॥ ४६ | पुलहने यज्ञोपवीत, मैं (पुलस्त्य)-ने दो शुक्ल वस्त्र, अगस्त्यने मृगचर्म तथा भरद्वाजने मेखला दी। ब्रह्माके पुत्र मरीचिने पलाशदण्ड, वारुणि (वसिष्ठ)-ने अक्षसूत्र एवं अङ्गिराने रेशमी वस्त्र तथा वेद दिया॥ ४२—४६॥ |
| छत्रं प्रादाद् रघू राजा उपानद्युगलं नृगः।<br>कमण्डलुं बृहत्तेजाः प्रादाद्विष्णोर्बृहस्पतिः ॥ ४७<br>एवं कृतोपनयनो भगवान् भूतभावनः।<br>संस्तूयमानो ऋषिभिः साङ्गं वेदमधीयत ॥ ४८<br>भरद्वाजादाङ्गिरसात् सामवेदं महाध्वनिम्।<br>महदाख्यानसंयुक्तं गन्धर्वसहितं मुने ॥ ४९<br>मासेनैकेन भगवान् ज्ञानश्रुतिमहार्णवः।<br>लोकाचारप्रवृत्त्यर्थमभूच्छ्रुतिविशारदः ॥ ५०<br>सर्वशास्त्रेषु नैपुण्यं गत्वा देवोऽक्षयोऽव्ययः।<br>प्रोवाच ब्राह्मणश्रेष्ठं भरद्वाजमिदं वचः ॥ ५१ | राजा रघुने छत्र, नृगने एक जोड़ा जूता एवं अत्यन्त तेजस्वी बृहस्पतिने विष्णुको कमण्डलु दिया। इस प्रकार उपनयन-संस्कार हो जानेपर ऋषियोंसे संस्तुत होते हुए भगवान् भूतभावनने (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष-इन) अङ्गोंके साथ चारों वेदोंका अध्ययन किया। मुने! उन्होंने आङ्गिरस भरद्वाजसे गन्धर्वविद्याके साथ महान् आख्यानोंसे पूर्ण महाध्वन्यात्मक सामवेदका अध्ययन किया। इस प्रकार ज्ञानस्वरूप वेदके अगाध समुद्र भगवान् एक मासमें लोकाचारके व्यवहारके लिये वेदविशारद हो गये। समस्त शास्त्रोंमें निपुण होकर अक्षय, अव्यय वामनने ब्राह्मणश्रेष्ठ भरद्वाजजीसे यह वचन कहा— ॥ ४७-५१ ॥ |
| श्रीवामन उवाच<br><br>ब्रह्मन् व्रजामि देह्याज्ञां कुरुक्षेत्रं महोदयम्।<br>तत्र दैत्यपतेः पुण्यो हयमेधः प्रवर्तते ॥ ५२<br><br>समाविष्टानि पश्यस्व तेजांसि पृथिवीतले।<br>ये संनिधानाः सततं मदंशाः पुण्यवर्धनाः।<br>तेनाहं प्रतिजानामि कुरुक्षेत्रं गतो बलिः ॥ ५३ | श्रीवामनजीने कहा— ब्रह्मन्! मैं अत्यन्त उत्तम कुरुक्षेत्रतीर्थमें जाना चाहता हूँ। आप आज्ञा दीजिये। वहाँ दैत्यराज बलिका पवित्र अश्वमेधयज्ञ हो रहा है। देखिये, पृथ्वीतलपर पुण्यकी वृद्धि करनेवाले मेरे स्थानोंमें तेजोंका समावेश हो रहा है। अतः मुझे यह मालूम हो रहा है कि बलि कुरुक्षेत्रमें स्थित हैं॥ ५२-५३॥ |
| भरद्वाज उवाच<br><br>स्वेच्छया तिष्ठ वा गच्छ नाहमाज्ञापयामि ते।<br>गमिष्यामो वयं विष्णो बलेरध्वरं मा खिद ॥ ५४<br>यद् भवन्तमहं देव परिपृच्छामि तद् वद।<br>केषु केषु विभो नित्यं स्थानेषु पुरुषोत्तम।<br>सान्निध्यं भवतो ब्रूहि ज्ञातुमिच्छामि तत्त्वतः ॥ ५५ | भरद्वाजजीने कहा— आप अपनी इच्छासे यहाँ रहें अथवा जायँ। मैं आपको आदेश नहीं दूँगा। विष्णो! हमलोग बलिके यज्ञमें जायँगे। आप चिन्ता न करें। देव! मैं आपसे जो पूछता हूँ उसे आप बतलायें। विभो! पुरुषोत्तम! मैं यथार्थरूपसे यह जानना चाहता हूँ कि आप किन-किन स्थानोंमें रहते हैं॥ ५४-५५ ॥ |
| वामन उवाच<br><br>श्रूयतां कथयिष्यामि येषु येषु गुरो अहम्।<br>निवसामि सुपुण्येषु स्थानेषु बहुरूपवान् ॥ ५६ | श्रीवामनजी बोले— गुरो! अनेक रूपोंसे युक्त होकर जिन-जिन पवित्र स्थानोंमें मैं रहता हूँ, उनका मैं वर्णन कर रहा हूँ; उसे आप सुनें। |