वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय १० ] भगवान् वामनके आगमनसे पृथ्वीकी क्षुब्धता ४४५
| वाच्यं तथा साम निरर्थकं विभो<br>कस्ते वरं दातुमलं हि शक्नुयात्।<br>यस्योदरे भूर्भुवनाकपाल-<br>रसातलेशा निवसन्ति नित्यशः॥ १५ | इस तरहका अर्थहीन और सामयुक्त वचन उनसे कहना चाहिये कि विभो! जिसके पेटमें भूलोक, भुवर्लोक एवं स्वर्लोकके स्वामी तथा रसातलके शासक सदा निवास करते हैं ऐसे आपको दान देनेमें कौन समर्थ हो सकता है? ॥ १२—१५ ॥ |
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| बलिरुवाच<br>मया न चोक्तं वचनं हि भार्गव<br>न चास्ति मह्यं न च दातुमुत्सहे।<br>समागतेऽप्यर्थिनि हीनवृत्ते<br>जनार्दने लोकपतौ कथं तु॥ १६ | बलिने कहा— भार्गव! मैंने निम्नकोटिकी वृत्तिवाले याचकके आनेपर भी यह बात नहीं कही कि मेरे पास कुछ नहीं है और मैं देना नहीं चाहता तो लोकपति जनार्दनके याचक बनकर आनेपर मैं इस प्रकार कैसे कह सकता हूँ। |
| एवं च श्रूयते श्लोकः सतां कथयतां विभो।<br>सद्भावो ब्राह्मणेष्वेव कर्तव्यो भूतिमिच्छता।<br>दृश्यते हि तथा तच्च सत्यं ब्राह्मणसत्तम॥ १७ | विभो! सज्जनोंके द्वारा कही गयी इस तरहकी पवित्र वाणी सुनी जाती है कि ऐश्वर्य चाहनेवाले मनुष्यको ब्राह्मणोंके प्रति अच्छे भाव रखने चाहिये। ब्राह्मणश्रेष्ठ! यह सत्य भी मालूम होता है कि |
| पूर्वाभ्यासेन कर्माणि सम्भवन्ति नृणां स्फुटम्।<br>वाक्कायमानशानीह योन्यन्तरगतान्यपि॥ १८ | वचन, शरीर एवं मनके द्वारा किये गये मनुष्योंके कर्म दूसरी योनियोंमें भी पहलेके अभ्याससे स्पष्टरूपसे प्रकट होते हैं। |
| किं वा त्वया द्विजश्रेष्ठ पौराणी न श्रुता कथा।<br>या वृत्ता मलये पूर्वं कोशकारसुतस्य तु॥ १९ | द्विजश्रेष्ठ! प्राचीन कालमें मलयपर्वतपर घटित हुई कोशकारके पुत्रकी प्राचीन कथाको क्या आपने नहीं सुना है? ॥ १६—१९॥ |
| शुक्र उवाच<br>कथयस्व महाबाहो कोशकारसुताश्रयाम्।<br>कथां पौराणिकीं पुण्यां महाकौतूहलं हि मे॥ २० | शुक्राचार्यने कहा— महाबाहो! कोशकारकी पुत्रसम्बन्धिनी पवित्र प्राचीन कथाको मुझसे कहो। उसे सुननेके लिये मुझे महान् कौतूहल हो रहा है॥ २०॥ |
| बलिरुवाच<br>शृणुष्व कथयिष्यामि कथामेतां मखान्तरे।<br>पूर्वाभ्यासनिबद्धां हि सत्यां भृगुकुलोद्वह॥ २१ | बलिने कहा— भृगुकुलश्रेष्ठ! पूर्वके अभ्याससे सम्बद्ध इस सत्य कथाको मैं यज्ञमें कह रहा हूँ; आप सुनें। |
| मुद्गलस्य मुनेः पुत्रो ज्ञानविज्ञानपारगः।<br>कोशकार इति ख्यात आसीद् ब्रह्मांस्तपोरतः॥ २२ | ब्रह्मन्! महर्षि मुद्गलका कोशकार नामसे प्रसिद्ध एवं ज्ञान और विज्ञानसे सम्पन्न एक तपस्वी पुत्र था। |
| तस्यासीद् दयिता साध्वी धर्मिष्ठा नामतः श्रुता।<br>सती वात्स्यायनसुता धर्मशीला पतिव्रता॥ २३ | उसकी पत्नीका नाम था धर्मिष्ठा। वह वात्स्यायनकी कन्या पतिव्रता, साध्वी, धर्मका आचरण करनेवाली तथा पतिकी सेवा करनेमें निष्ठा रखनेवाली थी। |
| तस्यामस्य सुतो जातः प्रकृत्या वै जडाकृतिः।<br>मूकवन्नालपति स न च पश्यति चान्धवत्॥ २४ | उस स्त्रीके गर्भसे एक पुत्र हुआ, जो स्वभावसे ही मूढ़ था। वह गूँगे मनुष्यकी तरह न बोलता और अन्धेकी भाँति वह देखता भी नहीं था। |
| तं जातं ब्राह्मणी पुत्रं जडं मूकं त्वचक्षुषम्।<br>मन्यमाना गृहद्वारि षष्ठेऽहनि समुत्सृजत्॥ २५ | अपने उस जन्मे हुए पुत्रको मूर्ख, गूँगा और अंधा समझकर ब्राह्मणीने छठे दिन उसे घरके द्वारपर फेंक दिया। |