भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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४४६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ९०
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततोऽभ्यागाद् दुराचारा राक्षसी जातहारिणी।<br>स्वं शिशुं कृशमादाय सूर्पाक्षी नाम नामतः॥ २६<br>तत्रोत्सृज्य स्वपुत्रं सा जग्राह द्विजनन्दनम्।<br>तमादाय जगामाथ भोक्तुं शालोदरे गिरौ॥ २७<br>ततस्तामागतां वीक्ष्य तस्या भर्ता घटोदरः।<br>नेत्रहीनः प्रत्युवाच किमानीतस्त्वया प्रिये॥ २८उसके बाद सूर्पाक्षी नामकी एक दुराचारिणी एवं नवजात बालकोंको चुरा लेनेवाली राक्षसी अपने दुबले-पतले पुत्रको लेकर वहाँ आयी और अपने पुत्रको वहाँ छोड़कर उसने ब्राह्मणपुत्रको उठा लिया। उसे लेकर खानेके लिये शालोदर नामक पर्वतपर चली गयी। उसके बाद उसे आयी हुई जानकर घटोदर नामके उसके अंधे पतिने पूछा—प्रिये! तुम क्या लायी हो?॥ २१—२८॥
साऽब्रवीद् राक्षसपते मया स्थाप्य निजं शिशुम्।<br>कोशकारद्विजगृहे तस्यानीतः प्रभो सुतः॥ २९<br>स प्राह न त्वया भद्रे भद्रमाचरितं त्विति।<br>महाज्ञानी द्विजेन्द्रोऽसौ ततः शप्स्यति कोपितः॥ ३०<br>तस्माच्छीघ्रमिमं त्यक्त्वा मनुजं घोररूपिणम्।<br>अन्यस्य कस्यचित् पुत्रं शीघ्रमानय सुन्दरि॥ ३१<br>इत्येवमुक्ता सा रौद्रा राक्षसी कामचारिणी।<br>समाजगाम त्वरिता समुत्पत्य विहायसम्॥ ३२<br>स चापि राक्षससुतो निसृष्टो गृहबाह्यतः।<br>रुरोद सुस्वरं ब्रह्मन् प्रक्षिप्याङ्गुष्ठमानने॥ ३३<br>सा क्रन्दितं चिराच्छ्रुत्वा धर्मिष्ठा पतिमब्रवीत्।<br>पश्य स्वयं मुनिश्रेष्ठ सशब्दस्तनयस्तव॥ ३४<br>त्रस्ता सा निर्जगामाथ गृहमध्यात् तपस्विनी।<br>स चापि ब्राह्मणश्रेष्ठः समपश्यत तं शिशुम्॥ ३५<br>वर्णरूपादिसंयुक्तं यथा स्वतनयं तथा।<br>ततो विहस्य प्रोवाच कोशकारो निजां प्रियाम्॥ ३६उसने कहा—राक्षसपते! प्रभो! मैं अपने बच्चेको कोशकार मुनिके घरमें रखकर उनके पुत्रको लायी हूँ। राक्षसने कहा—भद्रे! तुमने यह ठीक नहीं किया। वह श्रेष्ठ ब्राह्मण महाज्ञानी तो है; किंतु वह (इस कार्यसे) कुपित होकर (तुम्हें) शाप दे देगा। सुन्दरि! इसलिये शीघ्र इस रौद्र रूपवाले मनुष्यको छोड़कर तुम किसी दूसरेके पुत्रको ले आओ। ऐसा कहनेपर वह स्वच्छन्दचारिणी डरावनी राक्षसी आकाशमें उड़ती हुई शीघ्र (वहाँ) चली गयी। ब्रह्मन्! घरके बाहर छोड़ा गया वह राक्षसपुत्र भी मुखमें अँगूठा डालकर उच्च स्वरसे रोने लगा। उस धर्मिष्ठाने अधिक समयके बाद रुलाई सुनकर पतिसे कहा—मुनिश्रेष्ठ! पुत्रको स्वयं देखिये, आपका यह पुत्र शब्द करने लगा। डरकर वह तपस्विनी गृहके भीतरसे बाहर निकली। उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने भी उस शिशुको देखा। अपने पुत्रके ही समान रंग और रूप आदिसे युक्त उस बालकको देखकर कोशकार मुनिने हँसकर अपनी पत्नीसे कहा—॥ २९—३६॥
एतेनाविश्य धर्मिष्ठे भाव्यं भूतेन साम्प्रतम्।<br>कोऽप्यस्माकं छलयितुं सुरूपी भुवि संस्थितः॥ ३७<br>इत्युक्त्वा वचनं मन्त्री मन्त्रैस्तं राक्षसात्मजम्।<br>बबन्धोल्लिख्य वसुधां सकुशेनाथ पाणिना॥ ३८<br>एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ता सूर्पाक्षी विप्रबालकम्।<br>अन्तर्धानगता भूमौ चिक्षेप गृहदूरतः॥ ३९धर्मिष्ठे! इस बालकके अंदर अवश्य कोई भूत प्रवेश कर गया है। हमलोगोंको धोखा देनेके लिये सुन्दर रूपवाला कोई (भूत) इस स्थानपर विद्यमान है। ऐसा कहकर उस मन्त्रवेत्ताने हाथमें कुशा लेकर मन्त्रोंके द्वारा भूमिको रेखासे अङ्कितकर राक्षसपुत्रको बाँध दिया। इसी बीच सूर्पाक्षी वहाँ पहुँची और अदृश्यरूपमें (छिपकर) घरसे दूर स्थित होकर उसने ब्राह्मणके बालकको फेंका।
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