वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| अध्याय ९० ] | भगवान् वामनके आगमनसे पृथ्वीकी क्षुब्धता | ४४७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तं क्षिप्तमात्रं जग्राह कोशकारः स्वकं सुतम्।<br>सा चाभ्येत्य ग्रहीतुं स्वं नाशकद राक्षसी सुतम्॥ ४०<br>इतश्चेतश्च विभ्रष्टा सा भर्तारमुपागमत्।<br>कथयामास यद् वृत्तं स्वद्विजात्मजहारिणम्॥ ४१<br>एवं गतायां राक्षस्यां ब्राह्मणेन महात्मना।<br>स राक्षसशिशुर्ब्रह्मन् भार्यायै विनिवेदितः॥ ४२<br>स चात्मतनयः पित्रा कपिलायाः सवत्सयाः।<br>दध्ना संयोजितोऽत्यर्थं क्षीरेणेक्षुरसेन च॥ ४३<br>द्वावेव वर्धितौ बालौ संजातौ सप्तवार्षिकौ।<br>पित्रा च कृतनामानौ निशाकरदिवाकरौ॥ ४४ | फेंकते ही कोशकारने अपने उस पुत्रको पकड़ लिया। परंतु वह राक्षसी वहाँ जाकर अपने पुत्रको नहीं पकड़ सकी। दोनों ओरसे हाथ धोकर वह अपने पतिके पास गयी और अपने पुत्र तथा ब्राह्मणपुत्र दोनोंके खोनेकी घटना कह सुनायी। ब्रह्मन्! इस प्रकार राक्षसीके चले जानेपर महात्मा ब्राह्मणने अपनी पत्नीको उस राक्षस-पुत्रको दे दिया। पिताने अपने पुत्रको सवत्सा कपिला गायके दूध, दही और ईखके रससे पाला-पोसा। दोनों ही बालक बढ़कर सात वर्षके हो गये। पिताने उन दोनोंका नाम निशाकर और दिवाकर रखा॥ ३७-४४॥ |
| नैशाचरिर्दिवाकीर्तिर्निशाकीर्तिः स्वपुत्रकः।<br>तयोश्चकार विप्रोऽसौ व्रतबन्धक्रियां क्रमात्॥ ४५ | राक्षसके बालकका नाम दिवाकीर्ति (दिवाकर) और ब्राह्मणके बालकका नाम निशाकीर्ति (निशाकर) था। ब्राह्मणने क्रमशः दोनोंका उपनयन-संस्कार किया। |
| व्रतबन्धे कृते वेदं पपाठासौ दिवाकरः।<br>निशाकरो जडतया न पपाठेति नः श्रुतम्॥ ४६ | उपनयन (जनेऊ) हो जानेपर दिवाकर वेदपाठ करने लगा। किंतु निशाकर जड़ताके कारण वेदाध्ययन नहीं करता था—ऐसा हमलोगोंने सुना है। |
| तं बान्धवाश्च पितरौ माता भ्राता गुरुस्तथा।<br>पर्यनिन्दंस्तथा ये च जना मलयवासिनः॥ ४७ | माता, पिता, भाई, बन्धुजन, गुरु और दूसरे मलयके निवासी उसकी निन्दा करने लगे। |
| ततः स पित्रा क्रुद्धेन क्षिप्तः कूपे निरूदके।<br>महाशिलां चोपरि वै पिधानमवरोपयत्॥ ४८ | उसके बाद पिताने कुपित होकर उसे जलरहित कुएँमें फेंक दिया और ऊपरसे एक बड़ी शिलासे ढँक दिया। |
| एवं क्षिप्तस्तदा कूपे बहुवर्षगणान् स्थितः।<br>तत्रास्त्यामलकीगुल्मः पोषाय फलितोऽभवत्॥ ४९ | इस प्रकार कुएँमें फेंक दिये जानेपर वह बालक बहुत दिनोंतक वहाँ पड़ा रहा। उस कुएँमें एक आँवलेका छोटा वृक्ष (क्षुप) था। उस बालकके लालन-पालनके लिये उसमें फल लग गये। |
| ततो दशसु वर्षेषु समतीतेषु भार्गव।<br>तस्य माताऽगमत् कूपं तमन्धं शिलयाचितम्॥ ५० | भार्गव! उसके बाद दस वर्ष बीत जानेपर उसकी माँ अन्धकार-भरे तथा पत्थरसे ढके हुए उस कुएँके पास गयी। |
| सा दृष्ट्वा निचितं कूपं शिलया गिरिकल्पया।<br>उच्चैः प्रोवाच केनेयं कूपोपरि शिला कृता॥ ५१ | उस कुएँको पर्वतके सदृश शिलासे ढके हुए देखकर उसने ऊँचे स्वरसे कहा—कुएँके ऊपर इस पत्थरको किसने रखा है? |
| कूपान्तस्थः स तां वाणीं श्रुत्वा मातुर्निशाकरः।<br>प्राह प्रदत्ता पित्रा मे कूपोपरि शिला त्वियम्॥ ५२ | कुएँके अंदर पड़े हुए पुत्र निशाकरने माताकी वाणी सुनकर कहा—मेरे पिताजीने कुएँपर इस शिलाको रखा है। |