वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ४४४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ९० | | :--- | :--- |
| शुक्र उवाच<br>शृणुष्व दैत्येश्वर येन भागान्<br>नामी प्रतीच्छन्ति हि आसुरीयान्।<br>हुताशना मन्त्रहुतानपीह<br>नूनं समागच्छति वासुदेवः॥ ८<br>तदङ्घ्रिविक्षेपमपारयन्ती<br>मही सशैला चलिता दितीश।<br>तस्यां चलत्यां मकरालयामी<br>उद्वृत्तवेला दितिजाद्य जाताः॥ ९ | शुक्राचार्यने कहा— दैत्येश्वर! सुनो। निश्चय ही वासुदेव आ रहे हैं। इसीलिये अग्निदेव मन्त्रके द्वारा आहुति देनेपर भी आसुरीय भागोंको नहीं ग्रहण कर रहे हैं। दितीश! उनके चरण रखनेके भारको सहन न कर सकनेके कारण पर्वतोंसहित पृथ्वी काँप रही हैं। दितिज! पृथ्वीके कम्पनसे ये समुद्र आज तटका उल्लङ्घन कर गये हैं॥ ८-९॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>शुक्रस्य वचनं श्रुत्वा बलिर्भार्गवमब्रवीत्।<br>धर्मं सत्यं च पथ्यं च सर्वोत्साहसमीरितम्॥ १० | पुलस्त्यजी बोले— शुक्राचार्यका वचन सुनकर बलिने उनसे धर्मसे युक्त, सत्य, कल्याणप्रद और सभी प्रकारके उत्साहसे भरा वचन कहा॥ १०॥ | | बलिरुवाच<br>आयाते वासुदेवे वद मम<br>भगवन् धर्मकामार्थतत्त्वं<br>किं कार्यं किं च देयं मणिकनक-<br>मथो भूगजाश्वादिकं वा।<br>किं वा वाच्यं मुरारेर्निजहित-<br>मथवा तद्धितं वा प्रयुञ्जे<br>तथ्यं पथ्यं प्रियं भो मम वद<br>शुभदं तत्करिष्ये न चान्यत्॥ ११ | बलिने कहा— भगवन्! वासुदेवके आनेपर मेरे करने योग्य धर्म, काम एवं अर्थके तत्त्वको बतलायें। मैं उन्हें मणि, स्वर्ण, पृथ्वी, हाथी अथवा अश्वमेंसे क्या दान करूँ? मैं मुरारिसे क्या कहूँ? अपना अथवा उनका क्या कल्याण सिद्ध करूँ? आप मुझे कल्याणकारी, मङ्गलमय तथा प्रिय तथ्य बतलायें। मैं वही करूँगा, अन्य कुछ नहीं करूँगा॥ ११॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>तद्वाक्यं भार्गवः श्रुत्वा दैत्यनाथेरितं वरम्।<br>विचिन्त्य नारद प्राह भूतभव्यविदीश्वरः॥ १२<br>त्वया कृता यज्ञभुजोऽसुरेन्द्रा<br>बहिष्कृता ये श्रुतिदृष्टमार्गे।<br>श्रुतिप्रमाणं मखभोजिनो बहिः<br>सुरास्तदर्थं हरिरभ्युपैति॥ १३<br>तस्याध्वरं दैत्यसमागतस्य<br>कार्यं हि किं मां परिपृच्छसे यत्।<br>कार्यं न देयं हि विभो तृणाग्रं<br>यदध्वरे भूकनकादिकं वा॥ १४ | पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! दैत्यपतिद्वारा कहे गये उस उत्तम वचनको सुननेके पश्चात् भूत एवं भविष्यके जाननेवाले भार्गवने विचार कर कहा— तुमने श्रुतिद्वारा प्रतिपादित मार्गमें अनधिकृत असुरेन्द्रों (दैत्यों)-को यज्ञभागका भोक्ता बनाया है एवं वेदप्रमाणके अनुसार यज्ञभोक्ता देवोंको अधिकाररहित कर दिया है। इसी कारण हरि आ रहे हैं। दैत्य! तुमने मुझसे जो प्रश्न किया कि यज्ञमें उनके आनेपर क्या करना चाहिये, तो (उसके विषयमें मेरा यह कहना है कि) यज्ञमें तिनकेके नोकके बराबर भी पृथ्वी या सुवर्ण आदि (कुछ भी) उन्हें नहीं देना चाहिये। |