वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| अध्याय ९० ] | भगवान् वामनके आगमनसे पृथ्वीकी क्षुब्धता | ४४३ |
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नब्बेवाँ अध्याय
भगवान् वामनके आगमनसे पृथ्वीकी क्षुब्धता, बलि और शुक्रके संवाद-प्रसङ्गमें कोशकारकी कथा
| पुलस्त्य उवाच<br>ततः समागच्छति वासुदेवे<br>मही चकम्पे गिरयश्च चेलुः।<br>क्षुब्धाः समुद्रा दिवि ऋक्षमण्डलो<br>बभौ विपर्यस्तगतिर्महर्षे॥ १<br>यज्ञः समागात् परमाकुलत्वं<br>न वेद्मि किं मे मधुहा करिष्यति।<br>यथा प्रदग्धोऽस्मि महेश्वरेण<br>किं मां न संधक्ष्यति वासुदेवः॥ २<br>ऋक्साममन्त्राहूतिभिर्हुताभि-<br>र्वितानकीयान् ज्वलनास्तु भागान्।<br>भक्त्या द्विजेन्द्रैरपि सम्प्रपादितान्<br>नैव प्रतीच्छन्ति विभोर्भयेन॥ ३<br>तान् दृष्ट्वा घोररूपांस्तु उत्पातान् दानवेश्वरः।<br>पप्रच्छोशनसं शुक्रं प्रणिपत्य कृताञ्जलिः॥ ४<br>किमर्थमाचार्य मही सशैला<br>रम्भेव वाताभिहता चचाल।<br>किमासुरीयान् सुहुतानपीह<br>भागान् न गृह्णन्ति हुताशनाश्च॥ ५<br>क्षुब्धाः किमर्थं मकरालयाश्च भो<br>ऋक्षा न खे किं प्रचरन्ति पूर्ववत्।<br>दिशः किमर्थं तमसा परिप्लुता<br>दोषेण कस्याद्य वदस्व मे गुरो॥ ६ | **पुलस्त्यजी बोले—**महर्षे! उसके बाद वामनका रूप धारण करनेवाले वासुदेवके आनेपर पृथ्वी काँपने लगी, पर्वत अपने स्थानसे डिग गये, समुद्रमें जोरसे लहरें उठने लगीं और आकाशमें तारासमूहकी गति अव्यवस्थित हो गयी। यज्ञ भी अत्यन्त व्याकुल हो गया और सोचने लगा—न जाने मधुसूदन भगवान् वासुदेव आकर मेरी क्या गति करेंगे? जैसे महेश्वरने मुझे दग्ध कर दिया था, क्या वासुदेव भी मुझे वैसे ही दग्ध (ध्वस्त) तो नहीं कर देंगे? अग्नि विष्णुके भयसे श्रेष्ठ द्विजोंके द्वारा श्रद्धापूर्वक ऋग्वेद एवं सामवेदके मन्त्रोंकी आहुतियोंसे हवन किये गये यज्ञीय भागोंको ग्रहण नहीं कर रहे थे। उन घोर उत्पातोंको देखकर दानवेश्वर (बलि)-ने उशना शुक्राचार्यको प्रणाम किया तथा हाथ जोड़कर उनसे पूछा—आचार्यजी! पर्वतोंके साथ पृथ्वी वायुके झोंकेसे केलेके वृक्षके समान क्यों काँप रही है और अग्निदेव भी विधिपूर्वक हवन किये गये आसुरीय भागोंको क्यों नहीं स्वीकार कर रहे हैं? समुद्रमें भयंकर लहरें क्यों उठ रही हैं? आकाशमें नक्षत्र पहलेकी भाँति क्यों नहीं सुव्यवस्थित रूपसे स्थित हैं और दिशाएँ क्यों अन्धकारसे भर गयी हैं? गुरो! मुझे आप कृपया यह बतलायें कि किसके अपराधसे यह सब हो रहा है?॥ १—६॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>शुक्रस्तद् वाक्यमाकर्ण्य विरोचनसुतेरितम्।<br>अथ ज्ञात्वा कारणं च बलिं वचनमब्रवीत्॥ ७ | **पुलस्त्यजी बोले—**विरोचनपुत्रके द्वारा कहे गये उस वाक्यको सुननेके बाद पूछे गये प्रश्नके कारणको जानकर शुक्राचार्यने बलिसे कहा—॥ ७॥ |