वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 452, कुल 489 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४४२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ८९ ] |
|---|
| पाताले योगिनामीशं स्थितं च हरिशङ्करम्।<br>धरातले कोकनदं मेदिन्यां चक्रपाणिनम्॥ ३८<br><br>भुवर्लोके च गरुडं स्वर्लोके विष्णुमव्ययम्।<br>महर्लोके तथाऽगस्त्यं कपिलं च जने स्थितम्॥ ३९<br><br>तपोलोकेऽखिलं ब्रह्मन् वाङ्मयं सत्यसंयुतम्।<br>ब्रह्माणं ब्रह्मलोके च सप्तमे वै प्रतिष्ठितम्॥ ४० | रूप अवस्थित है। पातालमें योगीश हरिशङ्कर, धरातलपर कोकनद तथा मेदिनीमें चक्रपाणिरूप वर्तमान है। भुवर्लोकमें गरुड, स्वर्लोकमें अव्यय विष्णु, महर्लोकमें अगस्त्य तथा जनलोकमें कपिल नामक रूप विद्यमान है। ब्रह्मन्! तपोलोकमें सत्यसे संयुक्त अखिल वाङ्मय एवं सप्तम ब्रह्मलोकमें ब्रह्मा नामक रूप प्रतिष्ठित है॥ ३३—४०॥ | | सनातनं तथा शैवे परं ब्रह्म च वैष्णवे।<br>अप्रतर्क्यं निरालम्बे निराकाशे तपोमयम्॥ ४१<br><br>जम्बूद्वीपे चतुर्बाहुं कुशद्वीपे कुशेशयम्।<br>प्लक्षद्वीपे मुनिश्रेष्ठ ख्यातं गरुडवाहनम्॥ ४२<br><br>पद्मनाभं तथा क्रौञ्चे शाल्मले वृषभध्वजम्।<br>सहस्त्रांशुः स्थितः शाके धर्मराट् पुष्करे स्थितः॥ ४३<br><br>तथा पृथिव्यां ब्रह्मर्षे शालग्रामे स्थितोऽस्म्यहम्।<br>सजलस्थलपर्यन्तं चरेषु स्थावरेषु च॥ ४४<br><br>एतानि पुण्यानि ममालयानि<br>ब्रह्मन् पुराणानि सनातनानि।<br>धर्मप्रदानीह महौजसानि<br>संकीर्तनीयान्यघनाशनानि ॥ ४५<br><br>संकीर्तनात् स्मरणाद् दर्शनाच्च<br>संस्पर्शनादेव च देवतायाः।<br>धर्मार्थकामाद्यपवर्गमेव<br>लभन्ति देवा मनुजाः ससाध्याः॥ ४६<br><br>एतानि तुभ्यं विनिवेदितानि<br>ममालयानीह तपोमयानि।<br>उत्तिष्ठ गच्छामि महासुरस्य<br>यज्ञं सुराणां हि हिताय विप्र॥ ४७ | शिवलोकमें सनातन, विष्णुलोकमें परम ब्रह्म, निरालम्बमें अप्रतर्क्य और निराकाशमें तपोमय नामक रूप स्थित है। मुनिश्रेष्ठ! जम्बूद्वीपमें चतुर्बाहु, कुशद्वीपमें कुशेशय और प्लक्षद्वीपमें गरुडवाहन नामसे विख्यात रूप वर्तमान है। क्रौञ्चद्वीपमें पद्मनाभ, शाल्मलद्वीपमें वृषभध्वज, शाकद्वीपमें सहस्रांशु तथा पुष्करद्वीपमें धर्मराज नामक रूप विद्यमान हैं। ब्रह्मर्षे! इसी प्रकार पृथ्वीमें मैं शालग्रामके भीतर अवस्थित हूँ। इस प्रकार जलसे लेकर स्थलपर्यन्त समस्त चराचरमें मैं वर्तमान हूँ। ब्रह्मन्! ये ही मेरे पुण्य, पुरातन एवं सनातन धर्मप्रद, अत्यन्त ओजस्वी, सङ्कीर्तनके योग्य एवं अघोंके नाश करनेवाले निवास-स्थान हैं। देव, मनुष्य और साध्यलोग देवताके कीर्तन, स्मरण, दर्शन और स्पर्श करनेसे ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करते हैं। विप्र! मैंने आपसे अपने इन तपोमय स्थानोंको कह दिया। हे विप्र! अब आप उठिये; देवताओंका हित-साधन करनेके लिये मैं बलिके यज्ञमें जाता हूँ॥ ४१–४७॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं महर्षे<br>विष्णुर्भरद्वाजमृषिं महात्मा।<br>विलासलीलागमनो गिरीन्द्रात्<br>स चाभ्यगच्छत् कुरुजाङ्गलं हि॥ ४८ | पुलस्त्यजी बोले— महर्षे! महात्मा विष्णु महर्षि भरद्वाजसे इस प्रकारका वचन कहकर मनोहर चालसे चलते हुए गिरीन्द्रसे कुरुजाङ्गलमें पहुँचे॥ ४८॥ |
<div align="center">॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें नवासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८९॥
</div>