भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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अध्याय ८९ ] वामनभगवान्‌का विविध स्थानोंमें निवास-वर्णन और कुरुजाङ्गलके लिये प्रस्थान करना ४४१


| उदये शशिनं सूर्य ध्रुवं च त्रितयं स्थितम्।<br>हेमकूटे हिरण्याक्षं स्कन्दं शरवणे मुने॥ २१<br>महालये स्मृतं रुद्रमुत्तरेषु कुरुष्वथ।<br>पद्मनाभं मुनिश्रेष्ठ सर्वसौख्यप्रदायकम्॥ २२<br>सप्तगोदावरे ब्रह्मन् विख्यातं हाटकेश्वरम्।<br>तत्रैव च महाहंसं प्रयागेऽपि वटेश्वरम्॥ २३<br>शोणे च रुक्मकवचं कुण्डिने घ्राणतर्पणम्।<br>भिल्लीवने महायोगं माद्रेषु पुरुषोत्तमम्॥ २४ | उदयगिरिमें चन्द्र, सूर्य और ध्रुव—ये तीन मूर्तियाँ अवस्थित हैं। मुने! हेमकूटमें हिरण्याक्ष एवं शरवणमें स्कन्द नामक रूप विद्यमान है। मुनिश्रेष्ठ ! महालयमें रुद्र एवं उत्तरकुरुमें हर प्रकारका सुख प्रदान करनेवाला पद्मनाभ रूप विख्यात है। ब्रह्मन्! सप्तगोदावरमें हाटकेश्वर एवं महाहंस तथा प्रयागमें वटेश्वर रूप अवस्थित है। शोणमें रुक्मकवच, कुण्डिनमें घ्राणतर्पण, भिल्लीवनमें महायोग, माद्रमें पुरुषोत्तम रूप विद्यमान है॥ १७—२४॥ | | प्लक्षावतरणे विश्वं श्रीनिवासं द्विजोत्तम।<br>शूर्पारके चतुर्बाहुं मगधायां सुधापतिम्॥ २५<br>गिरिव्रजे पशुपतिं श्रीकण्ठं यमुनातटे।<br>वनस्पतिं समाख्यातं दण्डकारण्यवासिनम्॥ २६<br>कालिञ्जरे नीलकण्ठं सरय्वां शम्भुमुत्तमम्।<br>हंसयुक्तं महाकोश्यां सर्वपापप्रणाशनम्॥ २७<br>गोकर्णे दक्षिणे शर्वं वासुदेवं प्रजामुखे।<br>विन्ध्यशृङ्गे महाशौरिं कन्यायां मधुसूदनम्॥ २८<br>त्रिकूटशिखरे ब्रह्मन् चक्रपाणिमीश्वरम्।<br>लौहदण्डे हृषीकेशं कोसलायां मनोहरम्॥ २९<br>महाबाहुं सुराष्ट्रे च नवराष्ट्रे यशोधरम्।<br>भूधरं देविकानद्यां महोदायां कुशप्रियम्॥ ३०<br>गोमत्यां छादितगदं शङ्खोद्धारे च शङ्खिनम्।<br>सुनेत्रं सैन्धवारण्ये शूरं शूरपुरे स्थितम्॥ ३१<br>रुद्राख्यं च हिरण्वत्यां वीरभद्रं त्रिविष्टपे।<br>शङ्कुकर्णं च भीमायां भीमं शालवने विदुः॥ ३२ | द्विजोत्तम! प्लक्षावतरणमें विश्वात्मक श्रीनिवास, शूर्पारकमें चतुर्बाहु एवं मगधामें सुधापति रूप स्थित हैं। गिरिव्रजमें पशुपति, यमुनातटपर श्रीकण्ठ एवं दण्डकारण्यमें मेरा वनस्पति रूप विख्यात है। कालिञ्जरमें नीलकण्ठ, सरयूमें उत्तम शम्भु और महाकोशीमें सभी पापोंका विनाश करनेवाला हंसयुक्त रूप स्थित है। दक्षिण गोकर्णमें शर्व, प्रजामुखमें वासुदेव, विन्ध्यपर्वतके शिखरमें महाशौरि और कन्यामें मधुसूदन रूप विद्यमान है। ब्रह्मन्! त्रिकूटपर्वतकी ऊँची चोटीपर चक्रपाणि ईश्वर, लौहदण्डमें हृषीकेश तथा कोसलामें मनोहर रूप वर्तमान हैं। सुराष्ट्रमें महाबाहु, नवराष्ट्रमें यशोधर, देविका नदीमें भूधर तथा महोदामें कुशप्रिय रूप स्थित है। गोमतीमें छादितगद, शङ्खोद्धारमें शङ्खी, सैन्धवारण्यमें सुनेत्र एवं शूरपुरमें शूररूप विद्यमान है। हिरण्वतीमें रुद्र, त्रिविष्टपमें वीरभद्र, भीमामें शङ्कुकर्ण और शालवनमें भीम नामक रूपको लोग जानते हैं॥ २५—३२॥ | | विश्वामित्रं च गदितं कैलासे वृषभध्वजम्।<br>महेशं महिलाशैले कामरूपे शशिप्रभम्॥ ३३<br>बलभ्यामपि गोमित्रं कटाहे पङ्कजप्रियम्।<br>उपेन्द्रं सिंहलद्वीपे शक्राहे कुन्दमालिनम्॥ ३४<br>रसातले च विख्यातं सहस्रशिरसं मुने।<br>कालाग्निरुद्रं तत्रैव तथाऽन्यं कृत्तिवाससम्॥ ३५<br>सुतले कूर्ममचलं वितले पङ्कजासनम्।<br>महातले गुरो ख्यातं देवेशं छागलेश्वरम्॥ ३६<br>तले सहस्रचरणं सहस्रभुजमीश्वरम्।<br>सहस्राक्षं परिख्यातं मुसलाकृष्टदानवम्॥ ३७ | कैलासमें वृषभध्वज और विश्वामित्र, महिलाशैलमें महेश और कामरूपमें शशिप्रभ रूप वर्तमान हैं। बलभीमें गोमित्र, कटाहमें पङ्कजप्रिय, सिंहलद्वीपमें उपेन्द्र एवं शक्राह्नमें कुन्दमाली नामक रूप स्थित है। मुने! रसातलमें विख्यात सहस्रशीर्षा एवं कालाग्नि-रुद्र तथा कृत्तिवासा नामक रूप विद्यमान हैं। गुरो! सुतलमें अचल कूर्म, वितलमें पङ्कजासन तथा महातलमें छागलेश्वर नामक विख्यात देवेशरूप स्थित है। तलमें सहस्रचरण, सहस्रबाहु एवं मुसलसे दानवको आकृष्ट करनेवाला मेरा सहस्राक्ष- |

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