भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४४०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ८१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
नारायणं बदर्यां च वाराहे गरुडासनम्।<br>जयेशं भद्रकर्णे च विपाशायां द्विजप्रियम्॥ ४<br>रूपधारमिरावत्यां कुरुक्षेत्रे कुरुध्वजम्।<br>कृतशौचे नृसिंहं च गोकर्णे विश्वकर्माणम्॥ ५<br>प्राचीने कामपालं च पुण्डरीकं महाम्भसि।<br>विशाखयूपे ह्यजितं हंसं हंसपदे तथा॥ ६<br>पयोष्णीयामखण्डं च वितस्तायां कुमारिलम्।<br>मणिमत्पर्वते शम्भुं ब्रह्मण्ये च प्रजापतिम्॥ ७<br>मधुनाद्यां चक्रधरं शूलबाहुं हिमालये।<br>विद्धि विष्णुं मुनिश्रेष्ठ स्थितमोषधिसानुनि॥ ८बदरिकाश्रममें नारायण, वाराहमें गरुडासन, भद्रकर्णमें जयेश एवं विपाशा नदीके तटपर द्विजप्रिय विद्यमान हैं। इरावतीमें रूपधार, कुरुक्षेत्रमें कुरुध्वज, कृतशौचमें नृसिंह और गोकर्णमें विश्वकर्मा वर्तमान हैं। प्राचीन स्थानमें कामपाल, महाम्भस्में पुण्डरीक, विशाखयूपमें अजित तथा हंसपदमें हंसरूप विद्यमान हैं। पयोष्णीमें अखण्ड, वितस्तामें कुमारिल, मणिमान् पर्वतपर शम्भु एवं ब्रह्मण्यमें प्रजापति रूप स्थित हैं। मुनिश्रेष्ठ! मधुनदीमें चक्रधर, हिमालयमें शूलबाहु और ओषधिप्रस्थमें मेरे विष्णुरूपको अवस्थित जानें॥ १-८॥
भृगुतुङ्गे सुवर्णाक्षं नैमिषे पीतवाससम्।<br>गयायां गोपतिं देवं गदापाणिमधीश्वरम्॥ ९<br>त्रैलोक्यनाथं वरदं गोप्रतारे कुशेशयम्।<br>अर्द्धनारीश्वरं पुण्ये माहेन्द्रे दक्षिणे गिरौ॥ १०<br>गोपालमुत्तरे नित्यं महेन्द्रे सोमपीथिनम्।<br>वैकुण्ठमपि सह्याद्रौ पारियात्रे पराजितम्॥ ११<br>कशेरुदेशे देवेशं विश्वरूपं तपोधनम्।<br>मलयाद्रौ च सौगन्धिं विन्ध्यपादे सदाशिवम्॥ १२<br>अवन्तिविषये विष्णुं निषधेष्वमरेश्वरम्।<br>पाञ्चालिकं च ब्रह्मर्षे पाञ्चालेषु व्यवस्थितम्॥ १३<br>महोदये हयग्रीवं प्रयागे योगशायिनम्।<br>स्वयम्भुवं मधुवने अयोगन्थिं च पुष्करे॥ १४<br>तथैव विप्रप्रवर वाराणस्यां च केशवम्।<br>अविमुक्तकमत्रैव लोलश्चात्रैव गीयते॥ १५<br>पद्मायां पद्मकिरणं समुद्रे वडवामुखम्।<br>कुमारधारे बाह्लीशं कार्तिकेयं च बर्हिणम्॥ १६भृगुतुङ्गमें सुवर्णाक्ष, नैमिषमें पीतवासा एवं गयामें गोपति गदाधर ईश्वररूपसे वर्तमान हैं। गोप्रतारमें वरदायक, तीनों लोकोंके स्वामी कुशेशय एवं पवित्र महेन्द्र-पर्वतपर दक्षिणमें अर्धनारीश्वर रूप विद्यमान है। महेन्द्र-पर्वतपर, उत्तरमें सोमपीथी गोपाल, सह्याद्रिपर्वतपर वैकुण्ठ एवं पारियात्रमें अपराजितरूप स्थित है। कशेरुदेशमें तपोधन, विश्वरूप देवेश, मलयपर्वतपर सौगन्धि तथा विन्ध्यपादमें सदाशिव रूप वर्तमान है। ब्रह्मर्षे! अवन्तिदेशमें विष्णु, निषधदेशमें अमरेश्वर और पाञ्चालदेशमें मेरा पाञ्चालिक रूप अवस्थित है। महोदयमें हयग्रीव, प्रयागमें योगशायी, मधुवनमें स्वयम्भुव और पुष्करमें अयोगन्थि रूप विद्यमान है। विप्रश्रेष्ठ! उसी प्रकार वाराणसीमें मेरा केशवरूप तथा यहींपर अविमुक्तक तथा लोलरूप स्थित कहा गया है। पद्मामें पद्मकिरण, समुद्रमें वडवामुख तथा कुमारधारमें बाह्लीश, वहीं और कार्तिकेयरूपसे स्थित हैं॥ ९-१६॥
अजेशे शम्भुमनघं स्थाणुं च कुरुजाङ्गले।<br>वनमालिनमाहुर्मां किष्किन्धावासिनो जनाः॥ १७अजेशमें अनघ शम्भु तथा कुरुजाङ्गलमें स्थाणूमूर्ति हैं। किष्किन्धाके निवासी लोग मुझे वनमाली कहते हैं।
वीरं कुवलयारूढं शङ्खचक्रगदाधरम्।<br>श्रीवत्साङ्कमुदाराङ्गं नर्मदायां श्रियः पतिम्॥ १८नर्मदाके क्षेत्रमें मुझे वीर, कुवलयारूढ, शङ्ख-चक्र-गदाधर, श्रीवत्साङ्क एवं उदाराङ्ग श्रीपति कहा जाता है।
माहिष्मत्यां त्रिनयनं तत्रैव च हुताशनम्।<br>अर्बुदे च त्रिसौपर्णं क्ष्माधरं शूकराचले॥ १९माहिष्मतीमें मेरा त्रिनयन एवं हुताशन रूप विद्यमान हैं। इसी प्रकार अर्बुदमें त्रिसौपर्ण एवं शूक्राचलमें मेरा क्ष्माधर रूप अवस्थित है।
त्रिणाचिकेतं ब्रह्मर्षे प्रभासे च कपर्दिनम्।<br>तथैवात्रापि विख्यातं तृतीयं शशिशेखरम्॥ २०ब्रह्मर्षे! प्रभासमें मेरा त्रिणाचिकेत, कपर्दी और तृतीय शशिशेखर रूप विख्यात है।