भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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अध्याय ८६ ] स्तोत्रोंके क्रममें पुलस्त्यजीद्वारा उपदिष्ट महेश्वर-कथित पापप्रशमनस्तोत्र [ ४३१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्रह्मा होता तथोद्गाता साम यूपोऽथ दक्षिणा।<br>दीक्षा त्वं त्वं पुरोडाशस्त्वं पशुः पशुवाह्यसि॥ ४२आप ब्रह्मा, होता, उद्गाता, साम, यूप, दक्षिणा तथा दीक्षा हैं। आप पुरोडाश एवं आप ही पशु तथा पशुवाही हैं।
गुह्यो धाता च परमः शिवो नारायणस्तथा।<br>महाजनो निरयनः सहस्रार्केन्दुरूपवान्॥ ४३आप गुह्य, धाता, परम, शिव, नारायण, महाजन, निराश्रय तथा हजारों सूर्य और चन्द्रमाके समान रूपवान् हैं।
द्वादशारोऽथ षण्णाभिस्त्रिव्यूहो द्वियुगस्तथा।<br>कालचक्रो भवानीशो नमस्ते पुरुषोत्तमः॥ ४४आप बारह अरों, छः नाभियों, तीन व्यूहों एवं दो युगोंवाले कालचक्र तथा ईश एवं पुरुषोत्तम हैं। आपको नमस्कार है।
पराक्रमो विक्रमस्त्वं हयग्रीवो हरीश्वरः।<br>नरेश्वरोऽथ ब्रह्मोशः सूर्येशस्त्वं नमोऽस्तु ते॥ ४५आप पराक्रम, विक्रम, हयग्रीव, हरीश्वर, नरेश्वर, ब्रह्मोश और सूर्येश हैं। आपको नमस्कार है।
अश्ववक्त्रो महामेधाः शम्भुः शक्रः प्रभञ्जनः।<br>मित्रावरुणमूर्तिस्त्वममूर्तिरनघः परः॥ ४६आप अश्ववक्त्र, महामेधा, शम्भु, शक्र, प्रभञ्जन, मित्रावरुणकी मूर्ति, अमूर्ति, निष्पाप और श्रेष्ठ हैं।
प्राग्वंशकायो भूतादिर्महाभूतोऽच्युतो द्विजः।<br>त्वमूर्ध्वकर्त्ता ऊर्ध्वश्च ऊर्ध्वरेता नमोऽस्तु ते॥ ४७आप प्राग्वंशकाय (मूलपुरुष), भूतादि, महाभूत, अच्युत और द्विज हैं। आप ऊर्ध्वकर्त्ता, ऊर्ध्व और ऊर्ध्वरेता हैं। आपको नमस्कार है।
महापातकहा त्वं च उपपातकहा तथा।<br>अनीशः सर्वपापेभ्यस्त्वामहं शरणं गतः॥ ४८आप महापातकोंका विनाश करनेवाले तथा उपपातकोंके नाशक हैं। आप सभी पापोंसे निर्लिप्त हैं। मैं आपकी शरणमें आया हूँ।
इत्येतत् परमं स्तोत्रं सर्वपापप्रमोचनम्।<br>महेश्वरेण कथितं वाराणस्यां पुरा मुने॥ ४९मुने! प्राचीन कालमें महेश्वरने सम्पूर्ण पापोंसे मुक्ति देनेवाले इस श्रेष्ठ स्तोत्रको वाराणसीमें कहा था।
केशवस्याग्रतो गत्वा स्नात्वा तीर्थे सितोदके।<br>उपशान्तस्तथा जातो रुद्रः पापवशात् ततः॥ ५०तीर्थके स्वच्छ जलमें स्नान कर केशवका दर्शन करनेसे रुद्र पापके प्रभावसे मुक्त एवं शान्त हुए थे।
एतत् पवित्रं त्रिपुरघ्नभाषितं<br>पठन् नरो विष्णुपरो महर्षे।<br>विमुक्तपापो ह्युपशान्तमूर्तिः<br>सम्पूज्यते देववरैः प्रसिद्धैः॥ ५१महर्षे! त्रिपुरारिके द्वारा कहे गये इस स्तोत्रका पाठ करनेसे विष्णुभक्त मनुष्य पापसे मुक्त और सौम्य होकर प्रसिद्ध तथा श्रेष्ठ देवताओंसे पूजित होता है॥ ४२-५१॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छियासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ८६॥