भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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४३०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ८६
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्राणाद् वायुः समभवत् कामाद् ब्रह्मा पितामहः।<br>क्रोधात् त्रिनयनो रुद्रः शीर्ष्णोः द्यौः समवर्तत ॥ २८<br><br>इन्द्राग्नी वदनात् तुभ्यं पशवो मलसम्भवाः।<br>ओषध्यो रोमसम्भूता विराजस्त्वं नमोऽस्तु ते ॥ २९<br><br>पुष्पहास नमस्तेऽस्तु महाहास नमोऽस्तु ते।<br>ॐकारस्त्वं वषट्कारो वौषट्त्वं च स्वधा सुधा ॥ ३०<br><br>स्वाहाकार नमस्तुभ्यं हन्तकार नमोऽस्तु ते।<br>सर्वाकार निराकार वेदाकार नमोऽस्तु ते ॥ ३१<br><br>त्वं हि वेदमयो देवः सर्वदेवमयस्तथा।<br>सर्वतीर्थमयश्चैव सर्वयज्ञमयस्तथा ॥ ३२मनसे चन्द्रमा उत्पन्न हुए हैं। आपके प्राणसे वायु, कामसे पितामह ब्रह्मा, क्रोधसे त्रिनेत्र रुद्र और सिरसे द्युलोक आविर्भूत हुए हैं। आपके मुखसे इन्द्र और अग्नि, मलसे पशु तथा रोमसे ओषधियाँ उत्पन्न हुईं। आप विराज हैं। आपको नमस्कार है। हे पुष्पहास! आपको प्रणाम है। हे महाहास! आपको प्रणाम है। आप ओङ्कार, वषट्कार और वौषट् हैं। आप स्वधा और सुधा हैं। हे स्वाहाकार! आपको प्रणाम है। हे हन्तकार! आपको प्रणाम है। हे सर्वाकार! हे निराकार! हे वेदाकार! आपको प्रणाम है। आप वेदमय देव तथा सर्वदेवमय हैं। आप सर्वतीर्थमय और सर्वयज्ञमय हैं॥ २५–३२ ॥
नमस्ते यज्ञपुरुष यज्ञभागभुजे नमः।<br>नमः सहस्रधाराय शतधाराय ते नमः ॥ ३३<br><br>भूर्भुवःस्वःस्वरूपाय गोदायामृतदायिने।<br>सुवर्णब्रह्मदात्रे च सर्वदात्रे च ते नमः ॥ ३४<br><br>ब्रह्मेशाय नमस्तुभ्यं ब्रह्मादे ब्रह्मरूपधृक्।<br>परब्रह्म नमस्तेऽस्तु शब्दब्रह्म नमोऽस्तु ते ॥ ३५<br><br>विद्यास्त्वं वेद्यरूपस्त्वं वेदनीयस्त्वमेव च।<br>बुद्धिस्त्वमपि बोध्यश्च बोधस्त्वं च नमोऽस्तु ते ॥ ३६<br><br>होता होमश्च हव्यं च हूयमानश्च हव्यवाट्।<br>पाता पोता च पूतश्च पावनीयश्च ॐ नमः ॥ ३७<br><br>हन्ता च हन्यमानश्च ह्रियमाणस्त्वमेव च।<br>हर्त्ता नेता च नीतिश्च पूज्योऽग्र्यो विश्वधार्यसि ॥ ३८<br><br>स्रुकस्रुवौ परधामासि कपालोलूखलोऽरणिः।<br>यज्ञपात्रारण्येस्त्वमेकधा बहुधा त्रिधा ॥ ३९<br><br>यज्ञस्त्वं यजमानस्त्वमीड्यस्त्वमसि याजकः।<br>ज्ञाता ज्ञेयस्तथा ज्ञानं ध्येयो ध्याताऽसि चेश्वर ॥ ४०<br><br>ध्यानयोगश्च योगी च गतिर्मोक्षो धृतिः सुखम्।<br>योगाङ्गानि त्वमीशानः सर्वगस्त्वं नमोऽस्तु ते ॥ ४१यज्ञपुरुष! आपको प्रणाम है। हे यज्ञभागके भोक्तः! आपको प्रणाम है। सहस्रधार और शतधारको प्रणाम है। भूर्भुवःस्वःस्वरूप, गोदाता, अमृतदाता, सुवर्ण और ब्रह्म (संसारके निमित्त और उपादान कारण आदि)-के भी जन्मदाता तथा सर्वदाता आपको प्रणाम है। आप ब्रह्मेशको नमस्कार है। हे ब्रह्मादि! हे ब्रह्मरूपधारिन्! हे परमब्रह्म! आपको प्रणाम है। हे शब्दब्रह्म! आपको प्रणाम है। आप ही विद्या, आप ही वेद्यरूप तथा आप ही जानने योग्य हैं। आप ही बुद्धि, बोध्य और बोधरूप हैं। आपको प्रणाम है। आप होता, होम, हव्य, हूयमान द्रव्य तथा हव्यवाट्, पाता, पोता, पूत तथा पावनीय ओङ्कार हैं। आपको नमस्कार है। आप हन्ता, हन्यमान, ह्रियमाण, हर्ता, नेता, नीति, पूज्य, श्रेष्ठ तथा संसारको धारण करनेवाले हैं। आप स्रुक्, स्रुव, परधाम, कपाली, उलूखल, अरणि, यज्ञपात्र, आरणेय, एकधा, त्रिधा और बहुधा हैं। आप यज्ञ हैं और आप यजमान हैं। आप स्तुत्य और याजक हैं। आप ज्ञाता, ज्ञेय, ज्ञान, ध्येय, ध्याता तथा ईश्वर हैं। आप ध्यानयोग, योगी, गति, मोक्ष, धृति, सुख, योगाङ्ग, ईशान एवं सर्वग हैं। आपको नमस्कार है॥ ३३–४१ ॥