वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| अध्याय ८६ ] | स्तोत्रोंके क्रममें पुलस्त्यजीद्वारा उपदिष्ट महेश्वर-कथित पापप्रशमनस्तोत्र | ४२९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सर्वात्मन् सर्वग विभो विरिञ्चे श्वेत केशव ।<br>नील रक्त महानील अनिरुद्ध नमोऽस्तु ते ॥ १४<br><br>द्वादशात्मक कालात्मन् सामात्मन् परमात्मक ।<br>व्योमकात्मक सुब्रह्मन् भूतात्मक नमोऽस्तु ते ॥ १५<br><br>हरिकेश महाकेश गुडाकेश नमोऽस्तु ते।<br>मुञ्जकेश हृषीकेश सर्वनाथ नमोऽस्तु ते ॥ १६ | हे सर्वात्मन्! हे सर्वग! हे विभो! हे विरिञ्चिन्! हे श्वेत! हे केशव! हे नील! हे रक्त! हे महानील! हे अनिरुद्ध! आपको नमस्कार है। हे द्वादशात्मक! हे कालात्मन्! हे सामात्मन्! हे परमात्मक! हे आकाशात्मक! हे सुब्रह्मन्! हे भूतात्मक! आपको प्रणाम है। हे हरिकेश! हे महाकेश! हे गुडाकेश! आपको प्रणाम है। हे मुञ्जकेश! हे हृषीकेश! हे सर्वनाथ! आपको प्रणाम है॥ ९–१६॥ |
| सूक्ष्म स्थूल महास्थूल महासूक्ष्म शुभङ्कर।<br>श्वेतपीताम्बरधर नीलवास नमोऽस्तु ते ॥ १७<br><br>कुशेशय नमस्तेऽस्तु पद्मेशय जलेशय।<br>गोविन्द प्रीतिकर्ता च हंस पीताम्बरप्रिय ॥ १८<br><br>अधोक्षज नमस्तुभ्यं सीरध्वज जनार्दन।<br>वामनाय नमस्तेऽस्तु नमस्ते मधुसूदन ॥ १९<br><br>सहस्रशीर्षाय नमो ब्रह्मशीर्षाय ते नमः।<br>नमः सहस्रनेत्राय सोमसूर्यानलेक्षण ॥ २०<br><br>नमश्चाथर्वशिरसे महाशीर्षाय ते नमः।<br>नमस्ते धर्मनेत्राय महानेत्राय ते नमः ॥ २१<br><br>नमः सहस्रपादाय सहस्रभुजमन्यवे।<br>नमो यज्ञवराहाय महारूपाय ते नमः ॥ २२<br><br>नमस्ते विश्वदेवाय विश्वात्मन् विश्वसम्भव ।<br>विश्वरूप नमस्तेऽस्तु त्वत्तो विश्वमभूदिदम् ॥ २३<br><br>न्यग्रोधस्त्वं महाशाखस्त्वं मूलकुसुमार्चितः।<br>स्कन्धपत्राङ्कुरलतापल्लवाय नमोऽस्तु ते ॥ २४ | हे सूक्ष्म! हे स्थूल! हे महास्थूल! हे महासूक्ष्म! हे शुभङ्कर! हे उज्ज्वल-पीले वस्त्रको धारण करनेवाले! हे नीलवास! आपको प्रणाम है। हे कुशपर शयन करनेवाले! हे पद्मपर शयन करनेवाले! हे जलमें शयन करनेवाले! हे गोविन्द! हे प्रीतिकर्ता! हे हंस! हे पीताम्बरप्रिय! आपको नमस्कार है। हे अधोक्षज! हे सीरध्वज! हे जनार्दन! आपको प्रणाम है। हे वामन! आपको प्रणाम है। हे मधुसूदन! आपको प्रणाम है। आप सहस्र सिरवालेको नमस्कार है। आप ब्रह्मशीर्षको प्रणाम है। आप सहस्रनेत्र और चन्द्र, सूर्य तथा अग्निरूपी आँखवालेको प्रणाम है। अथर्वशिराको नमस्कार है। महाशीर्षको प्रणाम है। धर्मनेत्रको प्रणाम है। महानेत्रको प्रणाम है। सहस्रपादको नमस्कार है। सहस्रों भुजाओं एवं सहस्रों यज्ञोंवालेको नमस्कार है। यज्ञवराहको नमस्कार है! आप महारूपको नमस्कार है। विश्वदेवको प्रणाम है। हे विश्वात्मन्! हे विश्वसम्भव! हे विश्वरूप! आपको नमस्कार है। आपसे यह विश्व उत्पन्न हुआ है। आप न्यग्रोध और महाशाख हैं, आप ही मूलकुसुमार्चित हैं। स्कन्ध, पत्र, अङ्कुर, लता एवं पल्लवस्वरूप आपको नमस्कार है॥ १७–२४॥ |
| मूलं ते ब्राह्मणा ब्रह्मन् स्कन्धस्ते क्षत्रियाः प्रभो।<br>वैश्याः शाखा दलं शूद्रा वनस्पते नमोऽस्तु ते ॥ २५<br><br>ब्राह्मणाः साग्नयो वक्त्राः दोर्दण्डाः सायुधा नृपाः।<br>पार्श्वाद् विशश्चोरुयुगाज्जाताः शूद्राश्च पादतः ॥ २६<br><br>नेत्राद् भानुरभूत् तुभ्यं पद्भ्यां भूः श्रोत्रयोर्दिशः।<br>नाभ्या ह्यभूदन्तरिक्षं शशाङ्को मनसस्तव ॥ २७ | ब्रह्मन्! ब्राह्मण आपके मूल हैं। प्रभो! क्षत्रिय आपके स्कन्ध, वैश्य शाखा एवं शूद्र पत्ते हैं। वनस्पते! आपको नमस्कार है। अग्निसहित ब्राह्मण आपके मुख एवं शस्त्रसहित क्षत्रिय आपकी भुजाएँ हैं। वैश्य आपके दोनों जाँघोंके पार्श्वभागसे तथा शूद्र आपके चरणोंसे उत्पन्न हुए हैं। आपके नेत्रसे सूर्य उत्पन्न हुए हैं। आपके चरणोंसे पृथ्वी, कानोंसे दिशाएँ, नाभिसे अन्तरिक्ष तथा |