वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७४] बलि-बाणका देवताओंसे युद्ध, बलिकी विजय, प्रह्लादका स्वर्गमें आना ३६७
| विष्णुनाऽथ समादिष्टा देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>युयुधुर्दानवैः सार्धं विष्णुस्त्वन्तरधीयत॥ ३<br><br>माधवं गतमाज्ञाय शुक्नो बलिमुवाच ह।<br>गोविन्देन सुरास्त्यक्तास्त्वं जयस्वाधुना बले॥ ४<br>स पुरोहितवाक्येन प्रीतो याते जनार्दने।<br>गदामादाय तेजस्वी देवसैन्यमभिद्रुतः॥ ५<br>बाणो बाहुसहस्रेण गृह्य प्रहरणान्यथ।<br>देवसैन्यमभिद्रुत्य निजघान सहस्रशः॥ ६<br>मयोऽपि मायामास्थाय तैस्तै रूपान्तरैर्मुने।<br>योधयामास बलवान् सुराणां च वरूथिनीम्॥ ७<br>विद्युज्जिह्वः पारिभद्रो वृषपर्वा शतेक्षणः।<br>विपाको विक्षरः सैन्यं तेऽपि देवानुपाद्रवन्॥ ८<br>ते हन्यमाना दितिजैर्देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>गते जनार्दने देवे प्रायशो विमुखाऽभवन्॥ ९<br>तान् प्रभग्नान् सुरगणान् बलिबाणपुरोगमाः।<br>पृष्ठतश्चाद्रवन् सर्वे त्रैलोक्यविजिगीषवः॥ १०<br>सम्बाध्यमाना दैतेयैर्देवाः सेन्द्रा भयातुराः।<br>त्रिविष्टपं परित्यज्य ब्रह्मलोकमुपागताः॥ ११<br>ब्रह्मलोकं गतेष्वित्थं सेन्द्रेष्वपि सुरेषु वै।<br>स्वर्गभोक्ता बलिर्जातः सपुत्रभ्रातृबान्धवः॥ १२<br>शक्रोऽभूद् भगवान् ब्रह्मन् बलिबाणो यमोऽभवत्।<br>वरुणोऽभून्मयः सोमो राहुर्ह्लादो हुताशनः॥ १३<br><br>स्वर्भानुरभवत् सूर्यः शुक्रश्चासीद् बृहस्पतिः।<br>येऽन्येऽप्यधिकृता देवास्तेषु जाताः सुरारयः॥ १४<br><br>पञ्चमस्य कलेरादौ द्वापरान्ते सुदारुणः।<br>देवासुरोऽभूत् संग्रामो यत्र शक्रोऽप्यभूद् बलिः॥ १५<br><br>पातालाः सप्त तस्यासन् वशे लोकत्रयं तथा।<br>भूर्भुवःस्वरिति ख्यातं दशलोकाधिपो बलिः॥ १६<br>स्वर्गे स्वयं निवसति भुञ्जन् भोगान् सुदुर्लभान्।<br>तत्रोपासन्त गन्धर्वा विश्वावसुपुरोगमाः॥ १७ | युद्ध कीजिये। विष्णुसे आदेश पाकर इन्द्र आदि देवता दानवोंके साथ युद्ध करने लगे। किंतु विष्णु अदृश्य हो गये। विष्णुको वहाँसे चला गया जानकर शुक्रने बलिसे कहा—बले! विष्णुने देवताओंको अकेले युद्धके लिये छोड़ दिया है। अब तुम जय प्राप्त करो॥ १-४॥<br><br>दुष्टजनोंको ताड़ना देनेवाले भगवान् विष्णुके चले जानेपर तेजस्वी बलि पुरोहित (शुक्राचार्य)-के वाक्यसे हर्षित हो गदा लेकर देवसेनाकी ओर दौड़ा। बाणासुरने हजार हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लेकर देवसेनापर चढ़ाई कर दी और हजारोंका वध कर दिया। मुने! बलवान् मय दानव भी मायाके द्वारा विभिन्न रूपोंको धारणकर अमरोंकी सेनाके साथ युद्ध करने लगा। विद्युज्जिह्व, पारिभद्र, वृषपर्वा, शतेक्षण, विपाक तथा विक्षर भी देवताओंकी सेनापर टूट पड़े॥ ५-८॥<br><br>भगवान् विष्णुके चले जानेपर इन्द्र आदि देवता दैत्योंके द्वारा मारे जानेपर युद्धसे पराङ्मुख हो गये। तीनों लोकोंपर विजय पानेकी इच्छावाले बलि एवं बाण आदि सभी (दैत्य) भागते हुए देवताओंके पीछे दौड़ पड़े। दैत्योंके द्वारा पीड़ित इन्द्र आदि देवता डरकर और स्वर्गको छोड़कर ब्रह्मलोक चले गये। फिर तो इन्द्रके साथ ही देवताओंके ब्रह्मलोक चले जानेपर बलि अपने पुत्र, भाई और बान्धवोंके साथ स्वर्गका भोक्ता हो गया॥ ९-१२॥<br><br>ब्रह्मन्! भाग्यशाली बलि इन्द्र हुआ और बाण यम बना। मय दानव वरुण बन गया, राहु चन्द्र बना और ह्लाद अग्नि बन गया। केतु सूर्य बना और शुक्राचार्य बृहस्पति बन गये। इसी प्रकार अन्य विभिन्न अधिकार-प्राप्त देवताओंके पदोंपर असुरोंने अधिकार जमा लिया। पाँचवें कलियुगके प्रारम्भ और द्वापरयुगके आखिरी भागमें देवताओं और दैत्योंका भयङ्कर युद्ध हुआ, जब कि बलि इन्द्र बन गया। सातों पाताल और भूः, भुवः, स्वः नामके प्रसिद्ध तीनों लोक उसके वशमें हो गये थे। इस प्रकार बलि दस लोकोंका शासक बन गया था॥ १३-१६॥<br><br>इन्द्र बना हुआ बलि अत्यन्त दुर्लभ भोगोंको स्वयं भोगता हुआ स्वर्गमें रहने लगा। वहाँ विश्वावसु आदि |