भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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| अध्याय ७३ ] | बलि, मय-प्रभृति दैत्योंका देवताओंके साथ युद्ध और कालनेमिका वध | ३६३ | | :--- | :--- |

| वामपार्श्वमवष्टभ्य शाल्वः प्रथितविक्रमः।<br>प्रयाति दक्षिणं घोरं तारकाख्यो भयङ्करः॥ १३ | बलि, पीछे कालनेमि, बायीं ओर प्रसिद्ध पराक्रमवाला शाल्व तथा दाहिनी बगलमें भयङ्कर तारक नामका असुर कुशलतासे चल रहा था॥ ९—१३॥ | | दानवानां सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च।<br>सम्प्रायातानि युद्धाय देवैः सह कलिप्रिय॥ १४<br><br>श्रुत्वाऽसुराणामुद्योगं शक्रः सुरपतिः सुरान्।<br>उवाच याम दैत्यांस्तान् योद्धुं सबलसंयुतान्॥ १५<br><br>इत्येवमुक्त्वा वचनं सुरराट् स्यन्दनं बली।<br>समारुरोह भगवान् यतमातलिवाजिनम्॥ १६<br><br>समारूढे सहस्राक्षे स्यन्दनं देवतागणाः।<br>स्वं स्वं वाहनमारुह्य निश्चेरुर्युद्धकाङ्क्षिणः॥ १७ | कलिप्रिय (नारदजी) ! हजारों, दस-दस लाखों, (ही नहीं,) दस-दस करोड़ोंकी संख्यामें—असंख्य दैत्य देवताओंसे युद्ध करनेके लिये निकल पड़े। असुरोंकी (इस प्रकारकी) युद्ध करनेकी तैयारीको सुनकर देवताओंके स्वामी इन्द्रने देवताओंसे कहा—देवताओ! हम सब देवगण भी लड़ाई करनेके लिये दल-बलके साथ आये हुए दैत्योंसे लड़नेके लिये चलें। इस प्रकारकी घोषणा कर बलवान् भगवान् देवपति इन्द्र अपने सारथि मातलिद्वारा नियन्त्रित घोड़ोंवाले रथपर चढ़ गये। इन्द्रके रथपर चढ़ जानेपर देवतालोग भी अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर युद्धकी इच्छासे बाहर निकल चले॥ १४—१७॥ | | आदित्या वसवो रुद्राः साध्या विश्वेऽश्विनौ तथा।<br>विद्याधरा गुह्यकाश्च यक्षराक्षसपन्नगाः॥ १८<br><br>राजर्षयस्तथा सिद्धा नानाभूताश्च संहताः।<br>गजानन्ये रथानन्ये हयानन्ये समारुहन्॥ १९<br><br>विमानानि च शुभ्राणि पक्षिवाहानि नारद।<br>समारुह्याद्रवन् सर्वे यतो दैत्यबलं स्थितम्॥ २०<br><br>एतस्मिन्नन्तरे धीमान् वैनतेयः समागतः।<br>तस्मिन् विष्णुः सुरश्रेष्ठ अधिरुह्य समभ्यगात्॥ २१ | आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, विद्याधर, गुह्यक, यक्ष, राक्षस, पन्नग, राजर्षि, सिद्ध तथा अनेक प्रकारके भूत एकत्र हो गये। कुछ हाथियोंपर, कुछ रथोंपर और कुछ घोड़ोंपर आरूढ़ हुए। नारदजी! कुछ देवगण पक्षियोंद्वारा वाहित होनेवाले उज्ज्वल विमानोंपर चढ़कर वहाँ पहुँच गये, जहाँ दैत्योंकी सेना (पहलेसे) डटी हुई थी। इसी समय बुद्धिमान् गरुड़जी आ गये। देवोंमें श्रेष्ठ विष्णु उनपर आरूढ़ होकर आ गये॥ १८—२१॥ | | तमागतं सहस्राक्षस्त्रैलोक्यपतिमव्ययम्।<br>ववन्द मूर्ध्नावनतः सह सर्वैः सुरोत्तमैः॥ २२<br><br>ततोऽग्रे देवसैन्यस्य कार्तिकेयो गदाधरः।<br>पालयञ्जघनं विष्णुर्याति मध्ये सहस्रदृक्॥ २३<br><br>वामं पार्श्वमवष्टभ्य जयन्तो व्रजते मुने।<br>दक्षिणं वरुणः पार्श्वमवष्टभ्याव्रजद् बली॥ २४<br><br>ततोऽमराणां पृतना यशस्विनी<br>स्कन्देन्द्रविष्ण्वम्बुपसूर्यपालिता ।<br>नानास्त्रशस्त्रोद्यतदोःसमूहा<br>समाससादारिबलं महीध्रे॥ २५ | फिर तो हजार आँखोंवाले इन्द्रने सभी देवताओंके साथ सिर झुकाकर उन आये हुए तीनों लोकोंके स्वामी नित्य (विष्णुभगवान्)-की वन्दना की। उसके बाद कार्तिकेय देवसेनाके अग्रभागकी, गदाधारी श्रीविष्णु सेनाके पीछे भागकी और सहस्रलोचन इन्द्र बीचभागकी रक्षा करते हुए चलने लगे। नारद मुने! जयन्त बायीं ओरकी सेनाको समेटकर चले एवं बलवान् वरुण दाहिनी बगलकी सेनाको समेटकर चले। उसके बाद नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको धारण करनेवालोंसे गठित और स्कन्द, विष्णु, वरुण एवं सूर्यसे संरक्षित देवोंकी यशस्विनी सेना शत्रुसैन्यके निकट पर्वतपर पहुँच गयी॥ २२—२५॥ | | उदयाद्रितटे रम्ये शुभे समशिलातले।<br>निर्वृक्षे पक्षिरहिते जातो देवासुरो रणः॥ २६ | उदयाचलके वृक्ष एवं पक्षियोंसे रहित रमणीय शुभ एवं समतल पथरीले मैदानमें देवों और दैत्योंका |