भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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पृष्ठ 365
अध्याय ७१ ]* इन्द्रका मलयपर असुरोंसे युद्ध, मरुतोंकी उत्पत्तिकी कथा *३५५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जानुभ्यामुपरि स्थाप्य मुक्तकेशा निजं शिरः।<br>सुष्वाप केशप्रान्तैस्तु संश्लिष्टचरणाऽभवत् ॥ २८<br><br>तमन्तरमशौचस्य ज्ञात्वा वेदः सहस्रदृक्।<br>विवेश मातुरुदरं नासारन्ध्रेण नारद ॥ २९<br><br>प्रविश्य जठरं क्रुद्धो दैत्यमातुः पुरन्दरः।<br>ददर्शोर्ध्वमुखं बालं कटिन्यस्तकरं महत् ॥ ३०सिर रखकर सो गयी। उसके बालोंके ऊपरी भाग (लटककर) पैरोंसे लग गये। नारदजी! सहस्राक्ष इन्द्रदेव अपवित्रताके लिये उस अवसरको (उपयुक्त) जानकर नासिकाके छिद्रसे माताके उदरमें प्रवेश कर गये। इन्द्रने दैत्यमाताकी विशाल कोखमें प्रवेश कर कमरपर हाथ रखे ऊपरको मुख किये हुए एक बालकको देखा॥ २७-३०॥
तस्यैवास्तेऽथ ददृशे पेशीं मांसस्य वासवः।<br>शुद्धस्फटिकसंकाशां कराभ्यां जगृहेऽथ ताम् ॥ ३१<br><br>ततः कोपसमाध्मातो मांसपेशीं शतक्रतुः।<br>कराभ्यां मर्दयामास ततः सा कठिनाऽभवत् ॥ ३२<br><br>ऊर्ध्वेनार्धं च ववृधे त्वधोऽध ववृधे तथा।<br>शतपर्वाऽथ कुलिशः संजातो मांसपेशितः ॥ ३३<br><br>तेनैव गर्भं दितिजां वज्रेण शतपर्वणा।<br>चिच्छेद सप्तधा ब्रह्मन् स रुरोद च विस्वरम् ॥ ३४इन्द्रने उस बालकके मुँहमें एक शुद्ध स्फटिकके समान मांसपेशी देखी। इन्होंने उस मांसपेशीको दोनों हाथोंसे पकड़ लिया। उसके बाद क्रोधकी आगसे संतप्त हुए शतक्रतुने अपने दोनों हाथोंसे उस मांसपेशीको मसल दिया जिससे वह कठोर हो गयी (अब वह पिण्डके रूपमें हो गयी)। उस पिण्डका आधा भाग ऊपरकी ओर और आधा भाग नीचेकी ओर बढ़ गया। इस प्रकार उस मांसपेशीसे सौ पोरोंवाला वज्र बन गया। ब्रह्मन्! (इन्द्रने) उन्हीं पोरोंवाले वज्रसे दितिके द्वारा धारण किये हुए गर्भको सात भागोंमें काट डाला। फिर वह गर्भमें रहनेवाला बालक बिलखते स्वरमें रोने लगा॥ ३१-३४॥
ततोऽप्यबुध्यत दितिर्जानाच्चक्रचेष्टितम्।<br>शुश्राव वाचं पुत्रस्य रुदमानस्य नारद ॥ ३५<br><br>शक्रोऽपि प्राह मा मूढ रुदस्वेति सुघर्घरम्।<br>इत्येवमुक्त्वा चैकैकं भूयश्चिच्छेद सप्तधा ॥ ३६<br><br>ते जाता मरुतो नाम देवभूत्याः शतक्रतोः।<br>मातुरेवापचारेण चलन्ते ते पुरस्कृताः ॥ ३७<br><br>ततः सकुलिशः शक्रो निर्गम्य जठरात् तदा।<br>दितिं कृताञ्जलिपुटः प्राह भीतस्तु शापतः ॥ ३८<br><br>ममास्ति नापराधोऽयं यच्छस्तस्तनयस्तव।<br>तवैवापनयाच्छस्तस्तन्मे न क्रोद्धुमर्हसि ॥ ३९[पुलस्त्यजी कहते हैं-] नारदजी! उसके बाद दिति जग गयी और उसने इन्द्रकी की हुई चेष्टाको जान लिया। उसने रोते हुए पुत्रकी वाणी सुनी। इन्द्रने भी कहा-मूर्ख! घर्घर शब्दसे मत रोओ। ऐसा कहकर उन्होंने प्रत्येक टुकड़ेको पुनः सात-सात टुकड़ोंमें काट डाला। वे (कटे हुए टुकड़े) इन्द्रके मरुत् नामके देवभूत्य हो गये। माताके ही अनुचित कार्य करनेके कारण वे आगे चलते हैं। उसके बाद वज्र लिये हुए इन्द्रने जठरसे बाहर आकर एवं शापसे भयभीत होकर हाथ जोड़कर दितिसे कहा-आपके पुत्रको जो मैंने काटा है इसमें मेरा अपराध नहीं है। आपके ही अपचरण (पवित्रताका पालन न करने)-से वह काटा गया। अतः मेरे ऊपर आपको कुपित नहीं होना चाहिये॥ ३५-३९॥
दितिरुवाच<br>न तवात्रापराधोऽस्ति मन्ये दिष्टमिदं पुरा।<br>सम्पूर्णे त्वपि काले वै याऽशौचत्वमुपागता ॥ ४०दितिने कहा- इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। मैं इसे पूर्वनियोजित मानती हूँ। इसीसे समय पूरा होनेपर भी मैंने अपवित्रताका आचरण कर दिया॥ ४० ॥