भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३५६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ७२
पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा तान् बालान् परिसान्त्व्य दितिः स्वयम्।<br>देवराज्ञा सहैतांस्तु प्रेषयामास भामिनी॥ ४१<br>एवं पुरा स्वानपि सोदरान् स<br>गर्भस्थितानुज्जरितुं भयार्तः।<br>बिभेद वज्रेण ततः स गोत्रभित्<br>ख्यातो महर्षे भगवान् महेन्द्रः॥ ४२पुलस्त्यजी बोले— भामिनी दितिने ऐसा कहनेके बाद उन बालकोंको सान्त्वना देकर उन्हें देवराजके साथ ही भेज दिया। महर्षे! इस प्रकार पूर्वकालमें भयार्त होकर महेन्द्रने गर्भस्थित अपने ही सहोदरोंके विनाशके लिये उन्हें वज्रद्वारा काट दिया। इसीसे वे 'गोत्रभित्' नामसे प्रसिद्ध हो गये॥ ४१-४२॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ७१॥


बहत्तरवाँ अध्याय

स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत चाक्षुष-मन्वन्तरोंके मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन

नारद उवाच<br>यदमी भवता प्रोक्ता मरुतो दितिजोत्तमाः।<br>तत् केन पूर्वमासन् वै मरुन्मार्गेण कथ्यताम्॥ १<br><br>पूर्वमन्वन्तरेष्वेव समतीतेषु सत्तम।<br>के त्वासन् वायुमार्गस्थास्तन्मे व्याख्यातुमर्हसि॥ २नारदजीने कहा— (पुलस्त्यजी!) आपने दितिसे उत्पन्न उत्तम मरुद्गणोंका जो वर्णन किया उसके विषयमें यह कहिये कि पहले वे मरुत् किस मार्गमें अवस्थित थे; सत्तम! आप मुझे विशेषरूपसे यह बतलाइये कि पूर्व मन्वन्तरके बीत जानेपर कौन (मरुत्) वायुमार्गमें स्थित थे?॥ १-२॥
पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां पूर्वमरुतामुत्पत्तिं कथयामि ते।<br>स्वायम्भुवं समारभ्य यावन्मन्वन्तरं त्विदम्॥ ३<br><br>स्वायम्भुवस्य पुत्रोऽभून्मनोर्नाम प्रियव्रतः।<br>तस्यासीत् सवनो नाम पुत्रस्त्रैलोक्यपूजितः॥ ४<br><br>स चानपत्यो देवर्षे नृपः प्रेतगतिं गतः।<br>ततोऽरूदत् तस्य पत्नी सुदेवा शोकविह्वला॥ ५<br><br>न ददाति तदा दग्धुं समालिङ्ग्य स्थिता पतिम्।<br>नाथ नाथेति बहुशो विलपन्ती त्वनाथवत्॥ ६पुलस्त्यजी बोले— (नारदजी!) स्वायम्भुव मन्वन्तरसे लेकर इस मन्वन्तरतकके पहलेतकके मरुद्गणोंकी उत्पत्ति आपसे कहता हूँ, उसे सुनिये—स्वायम्भुव मनुके पुत्रका नाम प्रियव्रत था। तीनों लोकोंमें सत्कार प्राप्त सवन उन प्रियव्रतके पुत्र थे। देवर्षे! वे राजा पुत्रहीन ही मृत्युको प्राप्त हो गये। उसके बाद उनकी सुदेवा नामकी पत्नी शोकसे विह्वल होकर रोने लगी। उसने उस मृत-शरीरको दाह-संस्कार करनेके लिये नहीं दिया। पतिके गलेसे लिपटी हुई वह 'हा नाथ, हा नाथ' कहती हुई असहायकी भाँति अत्यधिक विलाप करने लगी॥ ३-६॥
तामन्तरिक्षादशरीरिणी वाक्<br>प्रोवाच मा राजपत्नीह रोदीः।उस समय आकाशसे अशरीरिणीवाणीने उससे