वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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अध्याय ७२ ] स्वायम्भुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत चाक्षुष-मन्वन्तरोंके मरुद्गणकी उत्पत्तिका वर्णन ३५७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यद्यस्ति ते सत्यमनुत्तमं तदा<br>भवत्वयं ते पतिना सहाग्निः॥ ७<br>सा तां वाणीमन्तरिक्षान्निशम्य<br>प्रोवाचेदं राजपुत्री सुदेवा।<br>शोचाम्येनं पार्थिवं पुत्रहीनं<br>नैवात्मानं मन्दभाग्यं विहङ्ग॥ ८<br>सोऽथाब्रवीन्मा रुदस्वायताक्षि<br>पुत्रास्त्वत्तो भूमिपालस्य सप्त।<br>भविष्यन्ति वह्निमारोह शीघ्रं<br>सत्यं प्रोक्तं श्रद्दधत्स्व त्वमद्य॥ ९<br>इत्येवमुक्ता खचरेण बाला<br>चितौ समारोप्य पतिं वराहम्।<br>हुताशमासाद्य पतिव्रता तं<br>संचिन्तयन्ती ज्वलनं प्रपन्ना॥ १० | कहा—राजपत्नि! तुम रोओ मत। यदि तुम्हारा सत्य (पति-सेवा)-व्रत श्रेष्ठ है तो यह अग्नि पतिके साथ तुम्हारे हितके लिये हो। आकाशसे हुई उस वाणीको सुनकर राजपुत्री सुदेवाने कहा—आकाशचारिन्! मैं इस सुत-हीन राजाके लिये सोच कर रही हूँ; न कि अपने दुर्भाग्यके लिये। उस आकाशवाणीने फिर कहा—विशालनयने! तुम रोओ मत। तुम्हारे गर्भसे तो राजाको सात पुत्र होंगे। तुम शीघ्र चितापर चढ़ जाओ। मैं सच कहता हूँ। इसपर तुम आज विश्वास करो। आकाशचारीके ऐसा कहनेपर उस बालाने श्रेष्ठ पतिको चितापर रखा और पतिका ध्यान करती हुई जलती चितामें प्रवेश कर वह पतिव्रता अग्निकी शरणमें चली गयी (जल मरी) ॥ ७–१०॥ |
| ततो मुहूर्तान्नृपतिः श्रिया युतः<br>समुत्तस्थौ सहितो भार्ययाऽसौ।<br>खमुत्पपाताथ स कामचारी<br>समं महिष्या च सुनाभपुत्र्या॥ ११<br>तस्याम्बरे नारद पार्थिवस्य<br>जाता रजोग्ना महिषी तु गच्छतः।<br>स दिव्ययोगात् प्रतिसंस्थितोऽम्बरे<br>भार्यासहायो दिवसानि पञ्च॥ १२<br>ततस्तु षष्ठेऽहनि पार्थिवेन<br>रितुर्न वन्ध्योऽद्य भवेद् विचिन्त्य।<br>रराम तन्व्या सह कामचारी<br>ततोऽम्बरात् प्राच्यवतास्य शुक्रम्॥ १३<br>शुक्रोत्सर्गावसाने तु नृपतिर्भार्यया सह।<br>जगाम दिव्यया गत्या ब्रह्मलोकं तपोधन॥ १४ | उसके बाद क्षणभरमें शोभासे सम्पन्न वह राजा पत्नीके साथ उठा और सुनाभकी पुत्री अपनी राजरानीके साथ आकाशमें जाकर स्वच्छन्दतासे भ्रमण करने लगा। नारदजी! आकाशमें जाते हुए उस राजाकी रानी रजस्वला हो गयी। वह राजा दिव्ययोगसे आकाशमें भार्या (सुदेवा)-के साथ पाँच दिनोंतक रहा। उसके बाद छठे दिन आज ऋतु व्यर्थ न हो जाय—ऐसा सोचकर कामचारी राजा भार्याके साथ विहार करने लगा। उसके बाद आकाशसे उसका शुक्र स्खलित हो गया। तपोधन! शुक्र-त्याग करनेके पश्चात् राजा पत्नीके साथ दिव्यगतिसे ब्रह्मलोकको चला गया॥ ११–१४॥ |
| तदम्बरात् प्रचलितमभ्रवर्णं<br>शुक्रं समाना नलिनी वपुष्मती।<br>चित्रा विशाला हरितालिनी च<br>सप्तर्षिपत्न्यो ददृशुर्यथेच्छया॥ १५<br>तद् दृष्ट्वा पुष्करे न्यस्तं प्रत्यैच्छन्त तपोधन।<br>मन्यमानास्तदमृतं सदा यौवनलिप्सया॥ १६<br>ततः स्नात्वा च विधिवत् सम्पूज्य तान् निजान् पतीन्।<br>पतिभिः समनुज्ञाताः पपुः पुष्करसंस्थितम्॥ १७ | समाना, नलिनी, वपुष्मती, चित्रा, विशाला, हरिता एवं अलिनी—इन सात ऋषि-पत्नियोंने आकाशसे गिरते हुए अभ्रकके समान वर्णवाले शुक्रको इच्छाभर देखा। तपोधन! उसे देखकर उसको अमृत समझती हुई उन सबोंने स्थायी युवावस्था प्राप्त करनेकी लालसासे उसे कमलमें रख लिया। उसके बाद वे स्नान करके अपने-अपने पतियोंका पूजनकर उन पतियोंकी अनुमतिसे कमलमें रखे राजाके उस शुक्रको अमृत मानती हुई |