वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३५४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्र नाम विभुर्लेभे शासनत्वात् शरैर्दृढैः।<br>पाकशासनतां शक्रः सर्वामरपतिर्विभुः॥ १४<br>तथाऽन्यं पुरनामानं बाणासुरसुतं शरैः।<br>सुपुङ्खैर्दारयामास ततोऽभूत् स पुरन्दरः॥ १५<br>हत्वेत्थं समरेऽजैषीद् गोत्रभिद् दानवं बलम्।<br>तच्चापि विजितं ब्रह्मन् रसातलमुपागमत्॥ १६<br>एतदर्थं सहस्राक्षः प्रेषितो मलयाचलम्।<br>त्र्यम्बकेन मुनिश्रेष्ठ किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि॥ १७ | मजबूत बाणोंसे पाकको दण्डित (शासित) करनेके कारण सभी अमरोंके पति विभु इन्द्रको पाकशासनताकी प्राप्ति हुई। इसी प्रकार उन्होंने सुन्दर पंख लगे बाणोंसे दूसरे पुर नामक बाणासुरके पुत्रका (भी) वध कर दिया। इसीसे वे पुरन्दर हुए। ब्रह्मन्! इस प्रकार उन दानवोंका नाश कर इन्द्रने युद्धमें दानव-सेनाको जीत लिया। हारा हुआ वह दानवोंका सेना-समूह रसातलमें चला गया। मुनिश्रेष्ठ! इसीलिये शंकरने इन्द्रको मलयपर्वतपर भेजा था। अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ १४-१७॥ |
| नारद उवाच<br>किमर्थं दैवतपतिर्गोत्रभित् कथ्यते हरिः।<br>एष मे संशयो ब्रह्मन् हृदि सम्परिवर्तते॥ १८ | नारदने कहा (पूछा)— ब्रह्मन्! मेरे हृदयमें यह संदेह है कि देवपति (इन्द्र)-को गोत्रभिद् क्यों कहा जाता है॥ १८॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां गोत्रभिच्छक्रः कीर्तितो हि यथा मया।<br>हते हिरण्यकशिपौ यच्चकारारिमर्दनः॥ १९<br>दितिर्विनष्टपुत्रा कश्यपं प्राह नारद।<br>विभो नाथोऽसि मे देहि शक्रहन्तारमात्मजम्॥ २०<br>कश्यपस्तामुवाचाथ यदि त्वमसितेक्षणे।<br>शौचाचारसमायुक्ता स्थास्यसे दशतीर्दश॥ २१<br>संवत्सराणां दिव्यानां ततस्त्रैलोक्यनायकम्।<br>जनयिष्यसि पुत्रं त्वं शत्रुघ्नं नान्यथा प्रिये॥ २२ | पुलस्त्यजी बोले— मैंने इन्द्रको गोत्रभिद् जैसे कहा तथा हिरण्यकशिपुके मार दिये जानेपर शत्रुमर्दन इन्द्रने जो किया? आप (सब) सुनें। नारदजी! पुत्रकी मृत्यु हो जानेपर दितिने कश्यपसे कहा—प्रभो! आप मेरे पति हैं, मुझे इन्द्रका वध करनेवाला पुत्र दीजिये। कश्यपने उससे कहा—असितनयने! यदि तुम सौ दिव्य वर्षोंतक पवित्र आचरण करोगी तो तुम तीनों लोकोंका मार्गदर्शक एवं शत्रुसंहारकारी पुत्र उत्पन्न करोगी। प्रिये! इसके सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं है॥ १९-२२॥ |
| इत्येवमुक्ता सा भर्त्रा दितिर्नियममास्थिता।<br>गर्भाधानमृषिः कृत्वा जगामोदयपर्वतम्॥ २३<br>गते तस्मिन् मुनिश्रेष्ठे सहस्त्राक्षोऽपि सत्वरम्।<br>तमाश्रममुपागम्य दितिं वचनमब्रवीत्॥ २४<br>करिष्याम्यनुशुश्रूषां भवत्या यदि मन्यसे।<br>बाढमित्यब्रवीद् देवी भाविकर्मप्रचोदिता॥ २५<br>समिदाहरणादीनि तस्याश्चक्रे पुरन्दरः।<br>विनीतात्मा च कार्यार्थी छिद्रान्वेषी भुजङ्गवत्॥ २६ | पतिके ऐसा कहनेपर दितिने नियमका निर्वाह करना प्रारम्भ कर दिया। कश्यप ऋषि गर्भाधान करके उदयगिरिपर चले गये। उन मुनिश्रेष्ठके उदयगिरिपर चले जानेके पश्चात् इन्द्रने शीघ्रतासे उस आश्रममें जाकर दितिसे यह वचन कहा—यदि आप अनुमति प्रदान करें तो मैं आपकी सेवा करूँ। भवितव्यतासे प्रेरित होकर देवीने कहा—ठीक है। विनीत बना हुआ इन्द्र अपने कार्यकी सिद्धिके लिये बिल खोजनेवाले सर्पकी भाँति अवसरकी प्रतीक्षा करते हुए उस (दिति)-के लिये लकड़ी आदि लानेका कार्य करने लगे॥ २३-२६॥ |
| एकदा सा तपोयुक्ता शौचे महति संस्थिता।<br>दशवर्षशतान्ते तु शिरःस्नाता तपस्विनी॥ २७ | एक हजार वर्ष बीत जानेपर मनोयोगसे पवित्रताका पालन करनेमें लगी हुई वह तपस्विनी एक दिन सिरसे स्नान करनेके बाद बालोंको खोले हुए अपने घुटनोंपर |