वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६७ ] |
|---|---|
| ३२४ |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| खट्वाङ्गयोधिनो वीरा रक्तचर्मसमावृताः ।<br>इमे प्राप्ता गणा योद्धुं महाव्रतिन उत्तमाः ॥ १३<br><br>दिग्वाससो मौनिनश्च घण्टाप्रहरणास्तथा ।<br>निराश्रया नाम गणाः समायाता जगद्गुरो ॥ १४<br><br>सार्धद्विनेत्राः पद्माक्षाः श्रीवत्साङ्कितवक्षसः ।<br>समायाताः खरारूढा वृषभध्वजिनोऽव्ययाः ॥ १५<br><br>महापाशुपता नाम चक्रशूलधरास्तथा ।<br>भैरवो विष्णुना सार्द्धमभेदेनार्चितो हि यैः ॥ १६ | खट्वाङ्गसे संग्राम करनेवाले, लाल ढालसे युक्त महाव्रती नामके ये उत्तम युद्धके लिये आये हैं। जगद्गुरो! घण्टा नामके आयुधको धारण करनेवाले दिगम्बर और मौनी तथा निराश्रय नामक गण उपस्थित हुए हैं। तीन नेत्रोंवाले, पद्माक्ष एवं श्रीवत्ससे चिह्नित वक्षःस्थलवाले गरुड़ पक्षीपर चढ़े हुए तथा अविनाशी वृषभध्वजी गण यहाँ आ गये हैं। चक्र तथा शूल धारण करनेवाले महापाशुपत नामके गण आ गये हैं, जिन्होंने अभिन्नभावसे विष्णुके साथ भैरवकी पूजा (यहाँ) की है॥ १३-१६॥ |
| इमे मृगेन्द्रवदनाः शूलबाणधनुर्धराः ।<br>गणास्त्वद्रोमसम्भूता वीरभद्रपुरोगमाः ॥ १७<br><br>एते चान्ये च बहवः शतशोऽथ सहस्रशः ।<br>सहायार्थं तवायाता यथा प्रीत्यादिशस्व तान् ॥ १८<br><br>ततोऽभ्येत्य गणाः सर्वे प्रणेमुर्वृषभध्वजम् ।<br>तान् करेणैव भगवान् समाश्वास्योपवेशयत् ॥ १९<br><br>महापाशुपतान् दृष्ट्वा समुत्थाय महेश्वरः ।<br>सम्परिष्वजताध्यक्षांस्ते प्रणेमुर्महेश्वरम् ॥ २० | आपके रोमोंसे उत्पन्न ये सभी सिंहके समान मुखवाले शूल, बाण और धनुष धारण करनेवाले वीरभद्र आदि गण तथा दूसरे भी सैकड़ों एवं हजारों गण आपकी सहायताके लिये आ गये हैं। अपनी इच्छाके अनुसार आप इन्हें आदेश दें। उसके बाद सभी गणोंने पास जाकर वृषभध्वजको प्रणाम किया। भगवान्ने हाथसे उन्हें विश्वस्तकर बैठाया। महापाशुपत नामके अपने अध्यक्षोंको देखनेके बाद महेश्वरने उठकर उनको गले लगाया। उन लोगोंने महेश्वरको अभिवन्दित किया॥ १७-२०॥ |
| ततस्तदद्भुततमं दृष्ट्वा सर्वे गणेश्वराः ।<br>सुचिरं विस्मिताक्षाश्च वैलक्ष्यमगमत् परम् ॥ २१<br><br>विस्मिताक्षान् गणान् दृष्ट्वा शैलादिर्योगिनां वरः ।<br>प्राह प्रहस्य देवेशं शूलपाणिं गणाधिपम् ॥ २२<br><br>विस्मितामी गणा देव सर्व एव महेश्वर ।<br>महापाशुपतानां हि यत् त्वयालिङ्गनं कृतम् ॥ २३<br><br>तदेतेषां महादेव स्फुटं त्रैलोक्यविन्दकम् ।<br>रूपं ज्ञानं विवेकं च वदस्व स्वेच्छया विभो ॥ २४<br><br>प्रमथाधिपतेर्वाक्यं विदित्वा भूतभावनः ।<br>बभाषे तान् गणान् सर्वान् भावाभावविचारिणः ॥ २५ | उसके बाद उस अत्यन्त विचित्र दृश्यको देखकर सभी गणेश्वरोंकी आँखें आश्चर्यसे भर गयीं। उसके बाद वे सभी बहुत ही लज्जित हो गये। गणोंको अचरजभरे नेत्रोंवाला देखकर योगिश्रेष्ठ शैलादि नन्दीने हँसकर गणाधिप देवेश शूलपाणिसे कहा—देव! महेश्वर! महापाशुपतोंको आपने जो गले लगाया है, उससे ये सभी गण आश्चर्यमें पड़ गये हैं। अतः महादेव! विभो! इनके तीनों लोकोंमें विख्यात रूप, ज्ञान एवं विवेकका अपने इच्छानुसार वर्णन करें। प्रमथोंके अधिपति नन्दीकी बात सुनकर भूतभावन महादेव भाव और अभावका विचार करनेवाले उन गणोंसे कहने लगे—॥ २१-२५॥ |
| रुद्र उवाच<br>भवद्भिर्भक्तिसंयुक्तैर्हरो भावेन पूजितः ।<br>अहंकारविमूढैश्च निन्दद्भिर्वैष्णवं पदम् ॥ २६ | रुद्रने कहा— अहंकारसे विमूढ किंतु मेरी भक्तिसे युक्त आपलोगोंने वैष्णवपदकी निन्दा करते हुए |