भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ६७ ] नन्दिद्वारा आहूत गणोंका वर्णन, गणोंको सदाशिवका दर्शन और गणोंद्वारा मन्दरका भर जाना ३२३


सड़सठवाँ अध्याय

नन्दिद्वारा आहूत गणोंका वर्णन, उनसे हरि और हरका एकत्व प्रतिपादन, गणोंको सदाशिवका दर्शन और गणोंद्वारा मन्दरका भर जाना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुलस्त्य उवाच<br>हरोऽपि शम्बरे याते समाहूयाथ नन्दिनम्।<br>प्राहामन्त्रय शैलादीन् ये स्थितास्तव शासने॥ १<br>ततो महेशवचनान्नन्दी तूर्णतरं गतः।<br>उपस्पृश्य जलं श्रीमान् सस्मार गणनायकान्॥ २<br>नन्दिना संस्मृताः सर्वे गणनाथाः सहस्रशः।<br>समुत्पत्य त्वरायुक्ताः प्रणतास्त्रिदशेश्वरम्॥ ३<br>आगतांश्च गणान्नन्दी कृताञ्जलिपुटोऽव्ययः।<br>सर्वान् निवेदयामास शङ्कराय महात्मने॥ ४पुलस्त्यजी बोले— शम्बरके चले जानेपर शंकरने भी नन्दीको बुलाकर कहा—नन्दिन्! तुम्हारे शासनमें जो पर्वत आदि रहते हैं, उन्हें इस (माङ्गलिक) कार्यमें आनेके लिये आमन्त्रित करो। उसके बाद महेशके कहनेसे नन्दी शीघ्रातिशीघ्र गये और उन्होंने जलका आचमन कर गणनायकोंका स्मरण किया। नन्दीसे स्मरण किये गये सभी गणनाथोंने हजारोंकी संख्यामें शीघ्रतासे आकर त्रिदशेश्वर शंकरको प्रणाम किया। अविनाशी नन्दीने महात्मा शंकरसे हाथ जोड़कर सभी आये हुए गणोंको निवेदित किया॥ १–४॥
नन्द्युवाच<br>यानेतान् पश्यसे शम्भो त्रिनेत्राञ्जटिलाञ्शुचीन्।<br>एते रुद्रा इति ख्याताः कोट्य एकादशैव तु॥ ५<br>वानरास्यान् पश्यसे यान् शार्दूलसमविक्रमान्।<br>एतेषां द्वारपालास्ते मन्नामानो यशोधनाः॥ ६<br>षण्मुखान् पश्यसे यांश्च शक्तिपाणीञ्शिखिध्वजान्।<br>षट् च षष्टिश्चता कोट्यः स्कन्दनाम्नः कुमारकान्॥ ७<br>एतावत्यस्तथा कोट्यः शाखा नाम षडाननाः।<br>विशाखास्तावदेवोक्ता नैगमेयाश्च शङ्कर॥ ८नन्दीने कहा— शम्भो! तीन नेत्रोंवाले और जटा धारण करनेवाले तथा पवित्र जिन गणोंको आप देख रहे हैं, उन्हें रुद्र कहते हैं। इनकी संख्या ग्यारह कोटि है। बन्दरके समान मुँह और सिंहके समान पराक्रमवाले जिन्हें आप देख रहे हैं, वे मेरे नामको धारण करनेवाले यशस्वी इनके द्वारपाल हैं। हाथमें शक्ति लिये तथा मयूरध्वजी जिन छः मुखवालोंको आप देख रहे हैं, वे स्कन्द नामके कुमार हैं। इनकी संख्या छाछठ करोड़ है। शंकर! इतने ही छः मुख धारण करनेवाले शाखा नामके गण हैं और इतने ही विशाख और नैगमेय नामके गण हैं॥ ५–८॥
सप्तकोटिशतं शम्भो अमी वै प्रमथोत्तमाः।<br>एकैकं प्रति देवेश तावत्यो ह्यपि मातरः॥ ९<br>भस्मारुणितदेहाश्च त्रिनेत्राः शूलपाणयः।<br>एते शैवा इति प्रोक्तास्तव भक्ता गणेश्वराः॥ १०<br>तथा पाशुपताश्चान्ये भस्मप्रहरणा विभो।<br>एते गणास्त्वसंख्याताः सहायर्थं समागताः॥ ११<br>पिनाकधारिणो रौद्रा गणाः कालमुखापरे।<br>तव भक्ताः समायाता जटामण्डलिनोऽद्भुताः॥ १२शम्भो! इन उत्तम प्रमथोंकी संख्या सात सौ करोड़ है। देवेश! प्रत्येकके साथ उतनी ही मातृकाएँ भी हैं। इन भस्मविभूषित शरीरवाले शूलपाणि त्रिनेत्रधारियोंको शैव कहा जाता है। ये सभी गणेश्वर आपके भक्त हैं। विभो! भस्मरूपी अस्त्र धारण करनेवाले अन्य अनगिनत पाशुपत गण सहायताके लिये आये हैं। पिनाक धारण करनेवाले जटामण्डलसे युक्त, अद्भुत भयङ्कर कालमुख नामक आपके अन्य गण (भी) आये हैं॥ ९–१२॥