भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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३१४श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सोमराज कामराज रञ्जक अञ्जनराजकन्याहृदचल-<br>वसते समुद्रशायिन् गजमुख घण्टेश्वर गोकर्ण ब्रह्मयोने।<br>सहस्रवक्त्राक्षिचरण हाटकेश्वर नमोऽस्तु ते॥हे सोमराज! हे कामराज! हे रञ्जक! हे अञ्जनराजकन्या (काली)-के हृदयमें सदा रहनेवाले! हे समुद्रशायिन्! हे गजमुख! हे घण्टेश्वर! हे गोकर्ण! हे ब्रह्मयोने! हे हजार मुख, आँख एवं चरणवाले! हे हाटकेश्वर! आपको नमस्कार है।
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ताः सर्व एवर्षिपार्थिवाः।<br>द्रष्टुं त्रैलोक्यकर्तारं त्र्यम्बकं हाटकेश्वरम्॥ १२१<br>समारूढाश्च सुस्नाता ददृशुर्योषितश्च ताः।<br>स्थितास्तु पुरतस्तस्य गायन्त्यो गेयमुत्तमम्॥ १२२<br>ततः सुदेवतनयो विश्वकर्मसुतां प्रियाम्।<br>दृष्ट्वा हृषितचित्तस्तु संरोहत्पुलको बभौ॥ १२३<br>ऋतध्वजोऽपि तन्वङ्गीं दृष्ट्वा चित्राङ्गदां स्थिताम्।<br>प्रत्यभिज्ञाय योगात्मा बभौ मुदितमानसः॥ १२४<br>ततस्तु सहसाऽभ्येत्य देवेशं हाटकेश्वरम्।<br>सम्पूजयन्तस्त्र्यक्षं ते स्तुवन्तः संस्थिताः क्रमात्॥ १२५इसी बीच समस्त ऋषि एवं राजालोग तीनों लोकोंके कर्ता भगवान् त्र्यम्बक हाटकेश्वरका दर्शन करने वहाँ पहुँच गये और भलीभाँति स्नान करनेके बाद ऊपर चढ़कर उन लोगोंने देवताके अभिमुख बैठकर गीत गाती हुई (स्तुति करती हुई) स्त्रियोंको देखा। उसके बाद वसुदेवके पुत्र अपनी प्रिया विश्वकर्माकी पुत्रीको देखकर हर्षसे गद्गद हो गये। योगी ऋतध्वज भी तन्वङ्गी चित्राङ्गदाको वहाँ स्थित देख एवं पहचानकर महान् हर्षमें भर गये। उसके बाद सभी व्यक्ति शीघ्र ही देवाधिदेव हाटकेश्वर भगवान्‌के निकट गये एवं त्रिलोचनकी पूजाकर क्रमशः खड़े होकर स्तुति करने लगे॥ १२१-१२५॥
चित्राङ्गदापि तान् दृष्ट्वा ऋतध्वजपुरोगमान्।<br>समं ताभिः कृशाङ्गीभिरभ्युत्थायाभ्यवादयत्॥ १२६<br>स च ताः प्रतिनन्द्यैव समं पुत्रेण तापसः।<br>समं नृपतिभिर्हृष्टः संविवेश यथासुखम्॥ १२७<br>ततः कपिवरः प्राप्तो घृताच्या सह सुन्दरि।<br>स्नात्वा गोदावरीतीर्थे दिदृक्षुर्हाटकेश्वरम्॥ १२८<br>ततोऽपश्यत् सुतां तन्वीं घृताची शुभदर्शनाम्।<br>साऽपि तां मातरे दृष्ट्वा हृष्टाऽभूद्वरवणिनी॥ १२९चित्राङ्गदाने भी उन ऋतध्वज आदिको देखकर उन तन्वङ्गी (कन्याओं)-के साथ उठकर प्रणाम किया। पुत्रसहित उन तपस्वीने उन्हें आशीर्वाद दिया और वे प्रसन्नतासे राजाओंके साथ सुखपूर्वक बैठ गये। सुन्दरि! उसके बाद गोदावरीतीर्थमें स्नानकर हाटकेश्वर भगवान्‌का दर्शन करनेकी इच्छावाला वह श्रेष्ठ बन्दर भी घृताचीके साथ वहाँ पहुँचा। फिर घृताचीने अपनी शोभाशालिनी कृशाङ्गी पुत्रीको देखा। वह सुन्दरी भी अपनी उस माताको देखकर हर्षित हो गयी॥ १२६-१२९॥
ततो घृताची स्वां पुत्रीं परिष्वज्य न्यपीडयत्।<br>स्नेहात् सवाष्पनयनां मुहुस्तां परिजिघ्रती॥ १३०उसके बाद घृताचीने अपनी पुत्रीको भलीभाँति गले लगाया। स्नेहसे आँखोंमें आँसू भरकर वह (अपनी) पुत्रीको बार-बार सूँघने लगी—आशीर्वादात्मक शुभ भावना करने लगी।
ततो ऋतध्वजः श्रीमान् कपिं वचनमब्रवीत्।<br>गच्छानेतुं गुह्यकं त्वमञ्जनाद्रौ महाञ्जनम्॥ १३१उसके बाद श्रीमान् ऋतध्वजने कपिसे कहा—तुम महाजन नामके गुह्यकको ले आनेके