भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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पृष्ठ 315

अध्याय ६५ ] गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त [ ३०५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततस्तं वीक्ष्य देवेशं ते उभे अपि कन्यके।<br>स्नापयेतां विधानेन पूजयेतामहर्निशम् ॥ ३<br><br>ताभ्यां स्थिताभ्यां तत्रैव ऋषिरभ्यागमद् वनम्।<br>द्रष्टुं श्रीकण्ठमव्यक्तं गालवो नाम नामतः ॥ ४वस्तुएँ पड़ी हुई देखीं। उसके बाद उन देवेशका दर्शन कर वे दोनों कन्याएँ विधिसे दिन-रात श्रीकण्ठ भगवान्‌को स्नान करातीं एवं उनका पूजन करती थीं। उसी स्थानपर उन दोनोंके रहते हुए गालव नामके ऋषि अव्यक्तस्वरूपवाले श्रीकण्ठका दर्शन करनेके लिये इस वनमें आये ॥ १–४ ॥
स दृष्ट्वा कन्यकायुग्मं कस्येदमिति चिन्तयन्।<br>प्रविवेश शुचिः स्नात्वा कालिन्द्या विमले जले ॥ ५<br><br>ततोऽनुपूजयामास श्रीकण्ठं गालवो मुनिः।<br>गायेते सुस्वरं गीतं यक्षासुरसुते ततः॥ ६<br><br>ततः स्वरं समाकर्ण्य गालवस्ते अजानत।<br>गन्धर्वकन्यके चैते संदेहो नात्र विद्यते ॥ ७<br><br>सम्पूज्य देवमीशानं गालवस्तु विधानतः।<br>कृतजप्यः समध्यास्ते कन्याभ्यामभिवादितः ॥ ८उन्होंने उन दोनों कन्याओंको देखकर 'ये किसकी कन्याएँ हैं'—इस प्रकार सोचते-विचारते हुए कालिन्दीके विमल जलमें प्रवेश किया। गालव ऋषिने स्नान करनेके बाद पवित्र होकर श्रीकण्ठ महादेवकी पूजा की। उसके बाद यक्ष और असुरकी दोनों कन्याओंने मधुर स्वरसे गीत गाया। तब (उनके) स्वरको सुनकर गालवने यह जान लिया कि ये दोनों निस्सन्देह गन्धर्वकी ही कन्याएँ हैं। गालवने विधिसे श्रीकण्ठदेवकी पूजा कर जप किया। उसके बाद दोनों कन्याओंसे अभिवन्दित होकर वे बैठ गये ॥ ५–८ ॥
ततः पप्रच्छ स मुनिः कन्यके कस्य कथ्यताम्।<br>कुलालङ्कारकरणे भक्तियुक्ते भवस्य हि॥ ९<br><br>तमूचतुर्मुनिश्रेष्ठं याथातथ्यं शुभानने।<br>जातो विदितवृत्तान्तो गालवस्तपसां वरः॥ १०<br><br>समुष्य तत्र रजनीं ताभ्यां सम्पूजितो मुनिः।<br>प्रातरुत्थाय गौरीशं सम्पूज्य च विधानतः॥ ११<br><br>ते उपेत्याब्रवीद्यास्ये पुष्कारारण्यमुत्तमम्।<br>आमन्त्रयामि वां कन्ये समनुज्ञातुमर्हथः॥ १२उसके बाद उन मुनिने उन दोनों कन्याओंसे पूछा—कन्याओ! तुम दोनों यह बतलाओ कि शङ्करमें भक्ति करनेवाली कुलकी शोभारूपा तुम दोनों किनकी कन्याएँ हो? शुभानने! उन दोनों कन्याओंने उन मुनिश्रेष्ठसे सत्य बातें बतलायीं। तब तपस्वियोंमें श्रेष्ठ गालवने सम्पूर्ण वृत्तान्त (पूर्णतः) जान लिया। उन दोनोंसे सत्कृत होकर मुनिने वहाँ रात्रिमें निवास किया और प्रातःकाल उठकर विधिपूर्वक गौरीपति शङ्करका पूजन किया। उसके बाद उन दोनोंके पास जाकर उन्होंने कहा—मैं परम उत्तम पुष्कर वनमें जाऊँगा। मैं तुम दोनोंसे अनुरोधकर विदा लेना चाहता हूँ। तुम दोनों मुझे अनुज्ञा (अनुमति) दो ॥ ९–१२ ॥
ततस्ते ऊचतुर्ब्रह्मन् दुर्लभं दर्शनं तव।<br>किमर्थं पुष्कारारण्यं भवान् यास्यत्यथादरात्॥ १३<br><br>ते उवाच महातेजा महत्कार्यसमन्वितः।<br>कार्तिकी पुण्यदा भाविमासान्ते पुष्करेषु हि॥ १४<br><br>ते ऊचतुर्वयं यामो भवान् यत्र गमिष्यति।<br>न त्वया स्म विना ब्रह्मन्निह स्थातुं हि शक्नुवः ॥ १५<br><br>बाढमाह ऋषिश्रेष्ठस्ततो नत्वा महेश्वरम्।<br>गते ते ऋषिणा सार्द्धं पुष्कारारण्यमादरात् ॥ १६उसके बाद उन दोनोंने कहा—ब्रह्मन्! आपका दर्शन दुर्लभ है। किस कारण आप पुष्कारारण्यमें जा रहे हैं। इसके बाद धार्मिक कृत्य करनेवाले महातेजस्वी (मुनि)-ने उन दोनोंसे आदरपूर्वक कहा—आगे महीनेके अन्तमें पुष्करमें पुण्यदायिनी कार्तिकी पूर्णिमा होगी। उन दोनोंने कहा—(तो) आप जहाँ जायँगे, वहीं हम भी चलेंगी। ब्रह्मन्! आपके बिना हम दोनों यहाँ नहीं रह सकतीं। ऋषिश्रेष्ठने कहा—ठीक है। उसके बाद आदरपूर्वक महेश्वरको प्रणामकर ऋषिके साथ वे दोनों (कन्याएँ) पुष्कारारण्य चली गयीं ॥ १३–१६ ॥