वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३०६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तथाऽन्ये ऋषयस्तत्र समायाताः सहस्रशः।<br>पार्थिवा जानपदाश्च मुक्त्वाैकं तमृतध्वजम्॥ १७<br>ततः स्नाताश्च कार्त्तिक्यामृषयः पुष्करेष्वथ।<br>राजानश्च महाभागा नाभागेश्वाकुसंयुताः॥ १८<br>गालवोऽपि समं ताभ्यां कन्यकाभ्यामवातरत्।<br>स्नातुं स पुष्करे तीर्थे मध्यमे धनुषाकृतौ॥ १९<br>निमग्नश्चापि ददृशे महामत्स्यं जलेशयम्।<br>बह्वीभिर्मत्स्यकन्याभिः प्रीयमाणं पुनः पुनः॥ २० | वहाँ केवल उन ऋतध्वजके सिवाय अन्य हजारों ऋषि, राजा एवं जनपद-निवासी भी आये। उसके बाद ऋषियों एवं नाभाग तथा इक्ष्वाकु आदि महाभाग्यवान् राजाओंने कार्तिकी पूर्णिमाके दिन पुष्करतीर्थमें स्नान किया। गालव भी उन दोनों कन्याओंके साथ धनुषकी आकृतिवाले मध्यम पुष्करतीर्थमें स्नान करनेके लिये उतरे। (जलमें) निमग्न होनेपर उन्होंने देखा कि एक जलचर महामत्स्य जलमें स्थित है और अनेक मत्स्य-कन्याएँ उसे पुनः-पुनः प्रसन्न करनेमें लगी हुई हैं॥ १७–२०॥ |
| स ताश्चाह तिमिर्मुग्धा यूयं धर्मं न जानथ।<br>जनापवादं घोरं हि न शक्तः सोढुमुलबणम्॥ २१<br><br>तास्तमूचुर्महामत्स्यं किं न पश्यसि गालवम्।<br>तापसं कन्यकाभ्यां वै विचरन्तं यथेच्छया॥ २२<br><br>यद्यसावपि धर्मात्मा न बिभेति तपोधनः।<br>जनापवादात् तत्किं त्वं बिभेषि जलमध्यगः॥ २३<br><br>ततस्ताश्चाह स तिमिर्नैष वेत्ति तपोधनः।<br>रागान्धो नापि च भयं विजानाति सुबालिशः॥ २४ | उस मत्स्यने उन (मछलियों)-से कहा—भोली प्रकृति होनेके कारण तुम सभी लोक-धर्म नहीं जानती हो। मैं जनताद्वारा किये जानेवाले कठोर अपवाद (निन्दा) सहन नहीं कर सकता। (तब) उन सभी (मछलियों)-ने कहा—क्या तुम स्वच्छन्दतासे विचरते हुए तपस्वी गालवको दो कन्याओंके साथ नहीं देख रहे हो? यदि धर्मात्मा एवं तपस्वी होते हुए भी वे लोक-निन्दासे नहीं डरते तो जलमें रहनेवाले तुम क्यों डर रहे हो? उसके बाद उस तिमि (मत्स्य)-ने उनसे कहा—तपस्वी लोक-निन्दाको नहीं जानते एवं प्रेममें अन्धा होनेसे प्रचण्डमूर्ख बनकर लोक-निन्दाके भयको भी नहीं समझते॥ २१–२४॥ |
| तच्छ्रुत्वा मत्स्यवचनं गालवो व्रीडया युतः।<br>नोत्तार निमग्नोऽपि तस्थौ स विजितेन्द्रियः॥ २५<br><br>स्नात्वा ते अपि रम्भोरू समुत्तीर्य तटे स्थिते।<br>प्रतीक्षन्त्यौ मुनिवरं तद्दर्शनसमुत्सुके॥ २६<br><br>वृत्ता च पुष्करे यात्रा गता लोका यथागतम्।<br>ऋषयः पार्थिवाश्चान्ये नाना जानपदास्तदा॥ २७<br><br>तत्र स्थितैका सुदती विश्वकर्मतनूरुहा।<br>चित्राङ्गदा सुचार्वङ्गी वीक्षन्ती तनुमध्यमे॥ २८ | मत्स्यके उस वचनको सुनकर गालव लज्जित हो गये। (फिर तो) वे जितेन्द्रिय मुनि जलमें निमग्न होनेपर भी ऊपर नहीं आये, भीतर ही डूबे रहे। वे दोनों कदली-सदृश ऊरूवाली सुन्दरियाँ स्नान करनेके बाद जलसे बाहर निकल कर तीरपर खड़ी हो गयीं एवं मुनिश्रेष्ठका दर्शन करनेके लिये उत्कण्ठित होकर उनकी प्रतीक्षा करने लगीं। पुष्करकी यात्रा पूरी होनेपर सभी ऋषि, राजा और नगरवासी लोग जहाँसे आये थे, वहाँ चले गये। वहाँ केवल सुन्दर दाँतोंवाली एवं पतली सुन्दर शरीरवाली विश्वकर्माकी कन्या चित्राङ्गदा उन दोनों कृशोदरियों (कन्याओं)-को देखती हुई रह गयी॥ २५–२८॥ |
| ते स्थिते चापि वीक्षन्त्यौ प्रतीक्षन्त्यौ च गालवम्।<br>संस्थिते निर्जने तीर्थे गालवोऽन्तर्जले तथा॥ २९ | वे दोनों भी (उसे) देखती एवं गालवकी प्रतीक्षा करती हुई निर्जन तीर्थमें पड़ी रहीं और गालव जलके |