वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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अध्याय ६५ ] गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त [ ३०७
| श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततोऽभ्यागाद् वेदवती नाम्ना गन्धर्वकन्यका।<br>पर्जन्यतनया साध्वी घृताचीगर्भसम्भवा॥ ३०<br><br>सा चाभ्येत्य जले पुण्ये स्नात्वा मध्यमपुष्करे।<br>ददर्श कन्यात्रितयमुभयोस्तटयोः स्थितम्॥ ३१<br><br>चित्राङ्गदामथाभ्येत्य पर्यपृच्छदनिष्ठुरम्।<br>कासि केन च कार्येण निर्जने स्थितवत्यसि॥ ३२ | भीतर ही स्थित रहे। उसके बाद वेदवती नामकी गन्धर्व-कन्या वहाँ आयी। वह साध्वी घृताचीके गर्भसे उत्पन्न हुई थी एवं पर्जन्य नामक गन्धर्वकी पुत्री थी। उसने आकर मध्यम पुष्करतीर्थके पवित्र जलमें स्नान किया और दोनों तटोंपर स्थित (उन) तीनों कन्याओंको देखा। इसके बाद चित्राङ्गदाके समीप जाकर उसने सरलतासे पूछा—तुम कौन हो? और किस कार्यसे इस निर्जन स्थानमें स्थित हो?॥ २९—३२॥ |
| सा तामुवाच पुत्रीं मां विन्दस्व सुरवर्धकेः।<br>चित्राङ्गदेति सुश्रोणि विख्यातां विश्वकर्मणः॥ ३३<br><br>साहमभ्यागता भद्रे स्नातुं पुण्यां सरस्वतीम्।<br>नैमिषे काञ्चनाक्षीं तु विख्यातां धर्ममातरम्॥ ३४<br><br>तत्रागताथ राज्ञाऽहं दृष्टा वैदर्भकेण हि।<br>सुरथेन स कामार्तो मामेव शरणं गतः॥ ३५<br><br>मयात्मा तस्य दत्तश्च सखीभिर्वार्यमाणया।<br>ततः शप्ताऽस्मि तातेन वियुक्तास्मि च भूभुजा॥ ३६ | उस (चित्राङ्गदा)-ने उस (वेदवती)-से कहा—हे सुश्रोणि! मुझे देवशिल्पी विश्वकर्माकी चित्राङ्गदा नामसे प्रसिद्ध पुत्री जानो। भद्रे! मैं नैमिषमें धर्मकी जननी काञ्चनाक्षी नामसे प्रसिद्ध पवित्र सरस्वती नदीमें स्नान करने आयी थी। वहाँ आनेपर विदर्भवंशमें उत्पन्न राजा सुरथने मुझे देखा और कामपीड़ित होकर मेरी शरणमें आया। सखियोंके रोकनेपर भी मैंने उन्हें अपनेको समर्पित कर दिया। उसके बाद पिताजीने मुझे शाप दे दिया और मैं राजासे वियोगिनी हो गयी॥ ३३—३६॥ |
| मर्तुं कृतमतिर्भद्रे वारिता गुह्यकेन च।<br>श्रीकण्ठमगमं द्रष्टुं ततो गोदावरं जलम्॥ ३७<br><br>तस्मादिमं समायाता तीर्थप्रवरमुत्तमम्।<br>न चापि दृष्टः सुरथः स मनोह्लादनः पतिः॥ ३८<br><br>भवती चात्र का बाले वृत्ते यात्राफलेऽधुना।<br>समागता हि तच्छंस मम सत्येन भामिनि॥ ३९<br><br>साब्रवीच्छ्रूयतां याऽस्मि मन्दभाग्या कृशोदरी।<br>यथा यात्राफले वृत्ते समायाताऽस्मि पुष्करम्॥ ४० | भद्रे! मैंने मरनेका विचार किया; परंतु गुह्यकने मुझे रोक दिया। उसके बाद मैं श्रीकण्ठभगवान्का दर्शन करनेके लिये गयी और वहाँसे गोदावर जलके निकट गयी, (और अब) वहाँसे मैं इस श्रेष्ठ उत्तम तीर्थमें आ गयी हूँ। किंतु मनको आनन्दित करनेवाले उन सुरथ पतिको मैंने नहीं देखा। बाले! यात्राफलके समाप्त होनेपर (पर्वकी समाप्ति हो जानेपर) आज यहाँ आनेवाली आप कौन हैं? भामिनि! मुझे सच-सच बतलाओ। उसने कहा—कृशोदरि! मैं मन्दभागिनी कौन हूँ तथा यात्राफलके समाप्त होनेपर पुष्करमें क्यों आयी हूँ, उसे सुनो॥ ३७—४०॥ |
| पर्जन्यस्य घृताच्यां तु जाता वेदवतीति हि।<br>रममाणा वनोद्देशे दृष्टाऽस्मि कपिना सखि॥ ४१<br><br>स चाभ्येत्याब्रवीत् का त्वं यासि देववतीति हि।<br>आनीतास्याश्रमात् केन भूपृष्ठान्मेरुपर्वतम्॥ ४२<br><br>ततो मयोक्तो नैवास्मि कपे देववतीत्यहम्।<br>नाम्ना वेदवतीत्येवं मेरोरपि कृताश्रया॥ ४३ | मैं पर्जन्य नामक गन्धर्वकी पुत्री हूँ तथा घृताचीके गर्भसे उत्पन्न हुई हूँ। मेरा नाम वेदवती है। सखि! वनप्रदेशमें भ्रमण कर रही मुझको एक बन्दरने देखा। उसने समीपमें आकर मुझसे कहा—तुम कौन हो? कहाँ जा रही हो? (निश्चय ही तुम) देववती हो। पृथ्वीपर रहनेवाले आश्रमसे मेरुपर्वतपर तुम्हें कौन लाया है? इसपर मैंने कहा—कपे! मैं देववती नहीं हूँ, मेरा नाम वेदवती है। मेरुपर्वतपर ही मैंने अपना |