भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३०८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६५

| ततस्तेनातिदुष्टेन वानरेण हृषिद्रुता।<br>समारूढास्मि सहसा बन्धुजीवं नगोत्तमम्॥ ४४ | आश्रम बना लिया है। उसके बाद अत्यन्त दुष्ट उस बन्दरसे खदेड़ी जाती हुई मैं बन्धुजीव (गुलदुपहरिया) के उत्तम वृक्षपर शीघ्रतासे चढ़ गयी॥ ४१-४४॥ | | तेनापि वृक्षस्तरसा पादाक्रान्तस्त्वभज्यत।<br>ततोऽस्य विपुलां शाखां समालिङ्ग्य स्थिता त्वहम्॥ ४५<br><br>ततः प्लवङ्गमो वृक्षं प्राक्षिपत् सागराम्भसि।<br>सह तेनैव वृक्षेण पतितास्म्यहमाकुला॥ ४६<br><br>ततोऽम्बरतलाद् वृक्षं निपतन्तं यदृच्छया।<br>ददृशुः सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥ ४७<br><br>ततो हाहाकृतं लोकैर्मां पतन्तीं निरीक्ष्य हि।<br>ऊचुश्च सिद्धगन्धर्वाः कष्टं सेयं महात्मनः॥ ४८<br><br>इन्द्रद्युम्नस्य महिषी गदिता ब्रह्मणा स्वयम्।<br>मनोः पुत्रस्य वीरस्य सहस्रक्रतुयाजिनः॥ ४९ | उसने शीघ्र ही पैरके आघातसे उस वृक्षको तोड़ दिया। उसके बाद मैं उस वृक्षकी एक बड़ी डालीको पकड़कर स्थित रही। फिर बन्दरने उस वृक्षको समुद्रके जलमें फेंक दिया। मैं अत्यन्त घबड़ाकर उस वृक्षके साथ ही जलमें गिर पड़ी। उसके बाद चर और अचर सभी प्राणियोंने आकाशसे गिरनेवाले उस वृक्षको देखा। उसके बाद उसीके साथ मुझको भी गिरती हुई देखकर सभी लोग हाहाकार करने लगे। सिद्ध और गन्धर्वलोग कहने लगे—हाय! यह कष्टकी बात है। इसके सम्बन्धमें तो ब्रह्माने स्वयं कहा था कि यह कन्या हजारों यज्ञोंके करनेवाले मनुके वीर पुत्र इन्द्रद्युम्नकी राजरानी होगी (पर यह क्या हो गया!)॥ ४५-४९॥ | | तां वाणीं मधुरां श्रुत्वा मोहमस्यागता ततः।<br>न च जाने स केनापि वृक्षश्छिन्नः सहस्रधा॥ ५०<br><br>ततोऽस्मि वेगाद् बलिना हृतानलसखेन हि।<br>समानीतास्म्यहमिमं त्वं दृष्टा चाद्य सुन्दरि॥ ५१<br><br>तदुत्तिष्ठस्व गच्छावः पृच्छावः क इमे स्थिते।<br>कन्यके अनुपश्ये हि पुष्करस्योत्तरे तटे॥ ५२<br><br>एवमुक्त्वा वराङ्गी सा तया सुत नुकन्यया।<br>जगाम कन्यके द्रष्टुं प्रष्टुं कार्यसमुत्सुका॥ ५३ | उस मधुर वाणीको सुननेके बाद मुझे मूर्च्छा आ गयी। मैं यह नहीं जानती कि उस वृक्षको किसने सहस्रों टुकड़ोंमें काट डाला। उसके बाद अग्निके सखा बलवान् वायुने मुझे शीघ्रतासे यहाँ ला दिया है। सुन्दरि! तुमको आज मैंने यहाँ देखा है। इसलिये उठो, हम दोनों चलें; और फिर पूछें तथा देखें कि पुष्करतीर्थके उत्तरी तटपर दिखायी देनेवाली ये दोनों कन्याएँ कौन हैं? ऐसा कहकर इस कार्यके करनेमें उत्कण्ठित वह सुन्दरी उस सुन्दर तथा दुर्बल देहवाली कन्याके साथ उस पारकी दोनों कन्याओंको देखने तथा वस्तुस्थिति पूछनेके लिये वहाँ गयी॥ ५०-५३॥ | | ततो गत्वा पर्यपृच्छत् ते ऊचतुरभे अपि।<br>याथातथ्यं तयोस्ताभ्यां स्वमात्मानं निवेदितम्॥ ५४<br><br>ततस्ताश्चतुरोपीह सप्तगोदावरं जलम्।<br>सम्प्राप्य तीर्थे तिष्ठन्ति अर्चन्त्यो हाटकेश्वरम्॥ ५५<br><br>ततो बहून् वर्षगणान् बभ्रमुस्ते जनास्त्रयः।<br>तासामर्थाय शकुनिर्जाबालिः स ऋतध्वजः॥ ५६<br><br>भारवाही ततः खिन्नो दशाब्दशतिके गते।<br>काले जगाम निर्वेदात् समं पित्रा तु शाकलम्॥ ५७ | उसके बाद वहाँ जाकर उसने उन दोनोंसे पूछा। उन दोनोंने अपनी सच्ची घटना उन दोनोंसे बतायीं। उसके बाद चारों कन्याएँ सप्तगोदावर जलके समीप जाकर हाटकेश्वर भगवान्‌की पूजा करती हुई तीर्थमें रहने लगीं। इधर शकुनि, जाबालि और ऋतध्वज—ये तीनों व्यक्ति उन कन्याओंके लिये अनेक वर्षोंतक भ्रमण करते रहे। तब एक हजार वर्ष बीत जानेपर भार-वहन करनेवाले (जाबालि) खिन्न होकर पिताके साथ शाकल जनपदमें चले गये॥ ५४-५७॥ |