वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| अध्याय ६५ ] | गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त | ३०१ |
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| तस्मिन्नरपतिः श्रीमानिन्द्रद्युम्नो मनोः सुतः।<br>समध्यास्ते स विज्ञाय सार्घपात्रो विनिर्ययौ॥ ५८<br><br>सम्यक् सम्पूजितस्तेन सजाबालिर्ऋतध्वजः।<br>स चेक्ष्वाकुसुतो धीमान् शकुनिर्भ्रातृजोऽर्चितः॥ ५९<br><br>ततो वाक्यं मुनिः प्राह इन्द्रद्युम्नमृतध्वजः।<br>राजन् नष्टाऽबलास्माकं नन्दयन्तीति विश्रुता॥ ६०<br><br>तस्यार्थे चैव वसुधा अस्माभिरटिता नृप।<br>तस्मादुत्तिष्ठ मार्गस्व साहाय्यं कर्तुमर्हसि॥ ६१<br><br>अथोवाच नृपो ब्रह्मन् ममापि ललनोत्तमा।<br>नष्टा कृतश्रमस्यापि कस्याहं कथयामि ताम्॥ ६२<br><br>आकाशात् पर्वताकारः पतनामो नगोत्तमः।<br>सिद्धानां वाक्यमाकर्ण्य बाणैश्छिन्नः सहस्रधा॥ ६३<br><br>न चैव सा वरारोहा विभिन्ना लाघवान्मया।<br>न च जानामि सा कुत्र तस्माद् गच्छामि मार्गितुम्॥ ६४<br><br>इत्येवमुक्त्वा स नृपः समुत्थाय त्वरान्वितः।<br>स्यन्दनानि द्विजाभ्यां स भ्रातृपुत्राय चार्पयत्॥ ६५<br><br>तेऽधिरुह्य रथांस्तूर्णं मार्गन्ते वसुधां क्रमात्।<br>बदर्याश्रममासाद्य ददृशुस्तपसां निधिम्॥ ६६<br><br>तपसा कर्शितं दीनं मलपङ्कजटाधरम्।<br>निःश्वासायासपरमं प्रथमे वयसि स्थितम्॥ ६७<br><br>तमुपेत्याब्रवीद् राजा इन्द्रद्युम्नो महाभुजः।<br>तपस्विन् यौवने घोरमास्थितोऽसि सुदुश्चरम्॥ ६८<br><br>तपः किमर्थं तच्छंस किमभिप्रेतमुच्यताम्।<br>सोऽब्रवीत् को भवान् ब्रूहि ममात्मानं सुहृत्तया॥ ६९<br><br>परिपृच्छसि शोकार्तं परिखिन्नं तपोऽन्वितम्।<br>स प्राह राजाऽस्मि विभो तपस्विञ्शाकले पुरे॥ ७०<br><br>मनोः पुत्रः प्रियो भ्राता इक्ष्वाकोः कथितं तव।<br>स चास्मै पूर्वचरितं सर्वं कथितवान् नृपः॥ ७१ | वहाँ मनुके पुत्र श्रीमान् राजा इन्द्रद्युम्न निवास कर रहे थे। वे इस समाचारको जानकर अर्घपात्र हाथमें लिये बाहर निकले। उन्होंने विधिपूर्वक सुन्दर रीतिसे जाबालि और ऋतध्वजकी पूजा की तथा उस इक्ष्वाकुनन्दन बुद्धिमान् भतीजे शकुनिकी भी अर्चना की। उसके बाद ऋतध्वज मुनिने इन्द्रद्युम्नसे कहा—राजन्! हमलोगोंकी नन्दयन्ती नामसे प्रसिद्ध (अयानी) कन्या खो गयी है। राजन्! उसके लिये हमलोगों ने सारी पृथ्वीपर भ्रमण किया है। इसलिये (कृपया) उठिये, पता लगाइये और हमारी सहायता कीजिये॥ ५८—६१॥<br><br>इसके बाद राजाने कहा—ब्रह्मन्! मेरी भी एक उत्तम लाडिली कन्या खो गयी है। उसे ढूँढ़नेमें मैं परिश्रम कर चुका हूँ। उसके विषयमें मैं किससे कहूँ। सिद्धोंका वचन सुनकर आकाशसे नीचे गिरनेवाले पर्वतके समान श्रेष्ठ वृक्षको मैंने बाणोंसे हजारों टुकड़ोंमें काट डाला। मेरे हस्तकौशलसे उस सुन्दरी कन्याको चोट नहीं लगी। मैं नहीं जानता हूँ कि वह कहाँ है? अतः उसे ढूँढ़नेके लिये मैं (भी) चल रहा हूँ। ऐसा कहनेके बाद वे राजा शीघ्रतासे उठे। उन्होंने उन दोनों ब्राह्मणों तथा अपने भतीजेके लिये रथ दे दिये॥ ६२—६५॥<br><br>वे रथोंपर चढ़कर शीघ्रतासे क्रमशः पृथ्वीपर खोज करने लगे। (इस क्रममें) उन लोगोंने बदरिकाश्रममें जाकर तपस्या करनेसे दुबले और धूल-मिट्टीसे भरे, जटा धारण किये हुए, जोर-जोरसे साँस ले रहे एक तपोमूर्ति युवकको देखा। महाबाहु राजा इन्द्रद्युम्नने उसके पास जाकर कहा—तपस्विन्! यह बतलाओ कि युवा-अवस्थामें ही तुम अत्यन्त दुष्कर कठोर तप क्यों कर रहे हो? यह भी बतलाओ कि तुम्हारी अभिलाषा क्या है? उसने कहा—आप मुझसे यह बतलायें कि चिन्तासे ग्रस्त अत्यन्त दुःखी एवं तपश्चर्यासे युक्त मुझसे प्रेमपूर्वक पूछनेवाले आप कौन हैं? उसने कहा—तपस्विन्! विभो! मैं मनुका पुत्र एवं इक्ष्वाकुका प्रिय भाई शाकलपुरका राजा हूँ। मैंने अपना परिचय कह दिया। उस राजाने भी उनसे पहलेकी सारी कथा कह सुनायी॥ ६६—७१॥ |