भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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३१० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
श्रुत्वा प्रोवाच राजर्षिर्मा मुञ्चस्व कलेवरम्।<br>आगच्छ यामि तन्वङ्गीं विचेतुं भ्रातृजोऽसि मे॥ ७२<br>इत्युक्त्वा सम्परिष्वज्य नृपं धमनिसंततम्।<br>समारोप्य रथं तूर्णं तापसाभ्यां न्यवेदयत्॥ ७३<br>ऋतध्वजः सपुत्रस्तु तं दृष्ट्वा पृथिवीपतिम्।<br>प्रोवाच राजन्नेह्येहि करिष्यामि तव प्रियम्॥ ७४<br>यासौ चित्राङ्गदा नाम त्वया दृष्टा हि नैमिषे।<br>सप्तगोदावरं तीर्थं सा मयैव विसर्जिता॥ ७५(ऊपर कही बातोंको) सुनकर राजर्षिने कहा— तुम अपने शरीरका त्याग मत करो। तुम मेरे भतीजे हो। आओ, मैं उस सुन्दरीकी खोज करने जा रहा हूँ। इतना कहकर उन्होंने उभरी शिराओंसे भरे हुए राजाको गले लगाया और उन्हें रथपर चढ़ाकर शीघ्र उन दोनों तपस्वियोंके पास पहुँचा दिया। पुत्रके सहित ऋतध्वजने उन राजाको देखकर कहा—राजन्! आइये! आइये! मैं आपका प्रिय कार्य करूँगा। आपने नैमिषारण्यमें जिस चित्राङ्गदाको देखा था, उसे मैंने ही सप्तगोदावर नामके तीर्थमें छोड़ दिया था॥ ७२–७५॥
तदागच्छथ गच्छामः सौदेवस्यैव कारणात्।<br>तत्रास्माकं समेष्यन्ति कन्यास्तिस्रस्तथापराः॥ ७६<br>इत्येवमुक्त्वा स ऋषिः समाश्वास्य सुदेवजम्।<br>शकुनिं पुरतः कृत्वा सेन्द्रद्युम्नः सपुत्रकः॥ ७७<br>स्यन्दनेनाश्वयुक्तेन गन्तुं समुपचक्रमे।<br>सप्तगोदावरं तीर्थं यत्र ताः कन्यका गताः॥ ७८<br>एतस्मिन्नन्तरे तन्वी घृताची शोकसंयुता।<br>विचचारोदयगिरिं विचिन्वन्ती सुतां निजाम्॥ ७९तो आइये, हमलोग सुदेवके पुत्रके कार्यसे ही वहाँ चलें। वहाँपर हमलोगोंको अन्य तीन कन्याएँ भी मिलेंगी। इस प्रकार कहकर उन्होंने ऋषि सुदेवके पुत्रको सान्त्वना दे करके एवं शकुनिको आगे कर इन्द्रद्युम्न और पुत्रके साथ घोड़े जुते रथसे सप्तगोदावर तीर्थमें जानेकी योजना बनायी—जहाँ वे कन्याएँ गयी थीं। इस बीच दुर्बलाङ्गी घृताची शोकसे चिन्तित होकर अपनी कन्याको ढूँढ़ती हुई उदयगिरिपर विचरण करने लगी॥ ७६–७९॥
तमाससाद च कपिं पर्यपृच्छत् तथाप्सराः।<br>किं बाला न त्वया दृष्टा कपे सत्यं वदस्व माम्॥ ८०<br>तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा स कपिः प्राह बालिकाम्।<br>दृष्टा देववती नाम्ना मया न्यस्ता महाश्रमे॥ ८१<br>कालिन्द्या विमले तीर्थे मृगपक्षिसमन्विते।<br>श्रीकण्ठायतनस्याग्रे मया सत्यं तवोदितम्॥ ८२<br>सा प्राह वानरपते नाम्ना वेदवतीति सा।<br>न हि देववती ख्याता तदागच्छ व्रजावहे॥ ८३वहाँ घृताची अप्सराको वह बन्दर मिल गया। घृताची अप्सराने उससे पूछा—कपे! मुझसे सच कहो कि क्या तुमने लड़कीको नहीं देखा है? उसके वचनको सुनकर उस कपिने कहा—मैंने देववती नामकी बालिकाको देखा है और उसे मृगों तथा पक्षियोंसे भरे कालिन्दीके विमलतीर्थमें श्रीकण्ठके मन्दिरके सामने स्थित महाश्रममें रख दिया है। मैंने तुमसे यह सत्य बात कही है। उस (घृताची)-ने कहा—कपिराज! वह वेदवती नामसे विख्यात है, वह देववती नहीं है। तो आओ; हम दोनों वहाँ चलें॥ ८०–८३॥
घृताच्यास्तद्वचः श्रुत्वा वानरस्त्वरितक्रमः।<br>पृष्ठतोऽस्याः समागच्छन्नदीमन्वेव कौशिकीम्॥ ८४<br>ते चापि कौशिकीं प्राप्ता राजर्षिप्रवरास्त्रयः।<br>द्वितयं तापसाभ्यां च रथैः परमवेगिभिः॥ ८५<br>अवतीर्य रथेभ्यस्ते स्नातुमभ्यागमन् नदीम्।<br>घृताच्यपि नदीं स्नातुं सुपुण्यामाजगाम ह॥ ८६<br>तामन्वेव कपिः प्रायाद् दृष्टो जाबालिना तथा।<br>दृष्ट्वैव पितरं प्राह पार्थिवं च महाबलम्॥ ८७घृताचीकी उस बातको सुनकर बन्दर शीघ्रतासे पग बढ़ाता हुआ उसके पीछे-पीछे कौशिकी नदीकी ओर चला। वे तीनों श्रेष्ठ राजर्षि भी दोनों तपस्वियों (जाबालि और ऋतध्वज)-के साथ बहुत तेज चलनेवाले रथोंपर चढ़कर कौशिकी नदीके समीप पहुँचे। वे लोग रथसे उतरकर स्नान करनेके लिये नदीके निकट आये। घृताची भी उस परम पवित्र नदीमें स्नान करने आयी। बन्दर भी उनके पीछे ही आ गया। जाबालिने उसे देखा। देखते ही उन्होंने पिता एवं महाबलशाली राजासे कहा— ॥ ८४–८७॥