वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ६५ ] गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त ३११
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| स एव पुनरायाति वानरस्तात वेगवान्।<br>पूर्वं जटास्वेव बलाद्येन बद्धोऽस्मि पादपे॥ ८८<br>तज्जाबालिवचः श्रुत्वा शकुनिः क्रोधसंयुतः।<br>सशरं धनुरदाय इदं वचनमब्रवीत्॥ ८९<br>ब्रह्मन् प्रदीयतां मह्यमाज्ञां तात वदस्व माम्।<br>यावदेनं निहन्म्यद्य शरेणैकेन वानरम्॥ ९०<br>इत्येवमुक्ते वचने सर्वभूतहिते रतः।<br>महर्षिः शकुनिं प्राह हेतुयुक्तं वचो महत्॥ ९१ | तात! यह वही बन्दर फिर तेजीसे (यहाँ) आ रहा है, जिसने पहले मुझे जबरदस्ती जटाजालसे बड़के पेड़में बाँध दिया था। जाबालिके उस वचनको सुनकर अत्यन्त कुपित हुए शकुनिने बाणसहित धनुषको लेकर यह वचन कहा—ब्रह्मन्! मुझे आज्ञा दीजिये; तात! मुझसे कहिये; क्या मैं एक बाणसे ही इस बन्दरको मार डालूँ? ऐसा कहनेपर समस्त प्राणियोंकी भलाईमें लगे रहनेवाले महर्षिने शकुनिसे अत्यन्त युक्तियुक्त वचन कहा— ॥ ८८-९१ ॥ |
| न कश्चित्तात केनापि बध्यते हन्यतेऽपि वा।<br>वधबन्धौ पूर्वकर्मवश्यौ नृपतिनन्दन॥ ९२<br>इत्येवमुक्त्वा शकुनिंमृषिर्वानरमब्रवीत्।<br>एह्येहि वानरास्माकं साहाय्यं कर्तुमर्हसि॥ ९३<br>इत्येवमुक्तो मुनिना बाले स कपिकुञ्जरः।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्रणिपत्येदमब्रवीत्॥ ९४<br>ममाज्ञा दीयतां ब्रह्मन् शाधि किं करवाण्यहम्॥ ९४<br>इत्युक्ते प्राह स मुनिस्तं वानरपतिं वचः।<br>मम पुत्रस्त्वयोद्बद्धो जटासु वटपादपे॥ ९५ | तात! (वस्तुतः) न तो किसीको कोई बाँधता है और न मारता ही है। नृपतिनन्दन! वध और बन्धन पूर्वजन्ममें किये गये कर्मोंके फलाधीन होते हैं। शकुनिसे इस प्रकार कहकर मुनिने बन्दरसे कहा—बन्दर! आओ, आओ! तुम्हें हमलोगोंकी सहायता करनी चाहिये। बाले! मुनिके ऐसा कहनेपर उस श्रेष्ठ कपिने करबद्ध प्रणाम करते हुए यह कहा—ब्रह्मन्! मुझे आज्ञा दीजिये; मुझे निर्देश दीजिये कि मैं क्या करूँ? उसके ऐसा कहनेपर मुनिने उस कपिपतिसे यह वचन कहा—तुमने मेरे पुत्रको बड़के पेड़में जटाओंसे बाँध रखा था॥ ९२-९५॥ |
| न चोन्मोचयितुं वृक्षाच्छक्नुयामोऽपि यत्नतः।<br>तदनेन नरेन्द्रेण त्रिधा कृत्वा तु शाखिनः॥ ९६<br>शाखां वहति मत्सूनुः शिरसा तां विमोचय।<br>दशवर्षशतान्यस्य शाखां वै वहतोऽगमन्॥ ९७<br>न च सोऽस्ति पुमान् कश्चिद् यो ह्युन्मोचयितुं क्षमः।<br>स ऋषेर्वाक्यमाकर्ण्य कपिर्जाबालिनो जटाः॥ ९८<br>शनैरुन्मोचयामास क्षणादुन्मोचिताश्च ताः।<br>ततः प्रीतो मुनिश्रेष्ठो वरदोऽभूदृत्तध्वजः॥ ९९ | विशेष यत्न करनेपर भी हमलोग उस पेड़से इसको उन्मुक्त (अलग) नहीं कर सके। इसलिये इस राजाने उस वृक्षके तीन टुकड़े कर दिये। मेरा पुत्र आजतक सिरपर उसकी डालीको ढो रहा है। अब तुम उसे उन्मुक्त कर दो। इस डालीको ढोते हुए उसको एक हजार वर्ष बीत गये हैं। ऐसा कोई पुरुष नहीं है जो इसे छुड़ानेमें समर्थ हो। उस बन्दरने ऋषिकी बात सुनकर जाबालिकी जटाओंको धीरे-धीरे खोल दिया। वे जटाएँ क्षणभरमें ही खुल गयीं। उसके बाद प्रसन्न होकर मुनिश्रेष्ठ ऋतध्वज वर देनेके लिये तैयार हो गये॥ ९६-९९॥ |
| कपिं प्राह वृणीष्व त्वं वरं यन्मनसेप्सितम्।<br>ऋतध्वजवचः श्रुत्वा इमं वरमयाचत॥ १००<br>विश्वकर्मा महातेजाः कपित्वे प्रतिसंस्थितः।<br>ब्रह्मन् भगवान् वरं मह्यं यदि दातुमिहेच्छति॥ १०१<br>तत्स्वदत्तो महाघोरो मम शापो निवर्त्यताम्।<br>चित्राङ्गदायाः पितरं मां त्वष्टारं तपोधन॥ १०२ | (फिर) उन्होंने बन्दरसे कहा—तुम अपना मनोऽभिलषित वर माँगो। ऋतध्वजकी बात सुनकर कपि-योनिमें स्थित महातेजस्वी विश्वकर्माने यह वर माँगा—ब्रह्मन्! यदि आप मुझे वर देनेके लिये इच्छा कर रहे हैं तो मुझे दिये गये अपने महाघोर शापका निवारण कर दें। तपोधन! चित्राङ्गदाके पिता मुझ त्वष्टाको आप पहचान लें। |