भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३१२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६५
संस्कृतहिन्दी
अभिजानीहि भवतः शापाद्वानरतां गतम्।<br>सुबहूनि च पापानि मया यानि कृतानि हि॥ १०३<br>कपिचापल्यदोषेण तानि मे यान्तु संक्षयम्।<br>ततो ऋतध्वजः प्राह शापस्यान्तो भविष्यन्ति॥ १०४<br>यदा घृताच्यां तनयं जनिष्यसि महाबलम्।<br>इत्येवमुक्तः संहृष्टः स तदा कपिकुञ्जरः॥ १०५आपके शापसे (ही) मैं बन्दर हो गया हूँ। कपिकी (स्वाभाविक) चञ्चलतारूपी दोषसे मैंने जिन बहुत-से पापोंको किया है, वे सभी नष्ट हो जायँ। उसके बाद ऋतध्वजने कहा—जब तुम घृताचीसे महाबलवान् पुत्र उत्पन्न करोगे तब शापका अन्त होगा। तब ऐसा कहनेपर वह कपिश्रेष्ठ अत्यन्त हर्षित हो गया॥ १००—१०५॥
स्नातुं तूर्णं महानद्यामवतीर्णः कृशोदरि।<br>ततस्तु सर्वे क्रमशः स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः॥ १०६<br>जग्मुर्हृष्टा रथेभ्यस्ते घृताची दिवमुत्पतत्।<br>तमन्वेव महावेगः स कपिः प्लवतां वरः॥ १०७<br>ददृशे रूपसम्पन्नां घृताचीं स प्लवङ्गमः।<br>सापि तं बलिनां श्रेष्ठं दृष्ट्वैव कपिकुञ्जरम्॥ १०८<br>ज्ञात्वाऽथ विश्वकर्माणं कामयामास कामिनी।<br>ततोऽनुपर्वतश्रेष्ठे ख्याते कोलाहले कपिः॥ १०९<br>रमयामास तां तन्वीं सा च तं वानरोत्तमम्।<br>एवं रमन्तौ सुचिरं सम्प्राप्तौ विन्ध्यपर्वतम्॥ ११०कृशोदरि! वह शीघ्र ही महानदीमें स्नान करनेके लिये उतरा। उसके बाद वे सब क्रमशः स्नानकर पितरों और देवोंके तर्पण-अर्चन कर रथसे चले गये एवं घृताची स्वर्गमें उड़ गयी। महावेगशाली श्रेष्ठ कपिने भी उसका अनुसरण किया। उस बन्दरने रूपसे सम्पन्न घृताचीको देखा। उस कामिनी (घृताची)-ने भी बलवानोंमें श्रेष्ठ उत्तम कपिको देखकर एवं उसे विश्वकर्मा जानकर उसकी कामना की। उसके बाद कोलाहल नामसे विख्यात श्रेष्ठ पर्वतपर उस बन्दरने घृताचीके साथ एवं घृताचीने उस श्रेष्ठ बन्दरके साथ आनन्द-क्रीड़ा की। इस प्रकार बहुत दिनोंतक क्रीड़ा करते हुए वे दोनों विन्ध्यपर्वतपर पहुँचे॥ १०६—११०॥
रथैः पञ्चापि तत्तीर्थं सम्प्राप्तास्ते नरोत्तमाः।<br>मध्याह्नसमये प्रीताः सप्तगोदावरं जलम्॥ १११<br>प्राप्य विश्रामहेत्वर्थमवतेरुस्त्वरान्विताः।<br>तेषां सारथयश्चाश्वान् स्नात्वा पीतोदकाप्लुतान्॥ ११२<br>रमणीये वनोद्देशे प्रचारार्थं समुत्सृजन्।<br>शाद्वलाढ्येषु देशेषु मुहूर्त्तादेव वाजिनः॥ ११३<br>तृप्ताः समाद्रवन् सर्वे देवायतनमुत्तमम्।<br>तुरङ्गखुरनिर्घोषं श्रुत्वा ता योषितां वराः॥ ११४<br>किमेतदिति चोक्त्वैव प्रजग्मुहाटकेश्वरम्।<br>आरुह्य बलभीं तास्तु समुदैक्षन्त सर्वशः॥ ११५वे पाँचों श्रेष्ठ व्यक्ति भी उल्लसित होकर रथद्वारा दोपहरके समय सप्तगोदावर जलवाले उस तीर्थमें पहुँचे। वहाँ जाकर वे विश्राम करनेके लिये शीघ्रतासे नीचे उतरे। उनके सारथियोंने भी स्नान किया एवं घोड़ोंको जल पिलाकर तथा नहला-धुलाकर (उन्हें) सुन्दर वन-प्रदेशमें विचरण करनेके लिये छोड़ दिया। मुहूर्तभरमें ही हरियालीसे हरे-भरे स्थानमें वे घोड़े तृप्त हो गये। उसके बाद वे सभी (घोड़े) उत्तम देव-मन्दिरके पास दौड़ने लगे। घोड़ोंके तापका शब्द सुनकर श्रेष्ठ स्त्रियाँ 'यह क्या है' ऐसा कहकर हाटकेश्वर (-के मन्दिरमें) गयीं एवं छतपर चढ़कर सभी ओर देखने लगीं॥ १११—११५॥
अपश्यंस्तीर्थसलिले स्नायमानान् नरोत्तमान्।<br>ततश्चित्राङ्गदा दृष्ट्वा जटामण्डलधारिणम्।<br>सुरथं हसती प्राह संरोहत्पुलका सखीम्॥ ११६उन कन्याओंने तीर्थके जलमें स्नान करते हुए उन श्रेष्ठ पुरुषोंको देखा। फिर चित्राङ्गदाने जटा-मण्डल धारण करनेवाले नृपति सुरथको देखा। रोमाञ्चित होकर उसने हँसती हुई सखीसे कहा—
योऽसौ युवा नीलघनप्रकाशः<br>संदृश्यते दीर्घभुजः सुरूपः।नीले मेघके समान वर्ण तथा लम्बी भुजाओंवाला वह जो सुन्दर युवा पुरुष