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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
३०६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तथाऽन्ये ऋषयस्तत्र समायाताः सहस्रशः।<br>पार्थिवा जानपदाश्च मुक्त्वाैकं तमृतध्वजम्॥ १७<br>ततः स्नाताश्च कार्त्तिक्यामृषयः पुष्करेष्वथ।<br>राजानश्च महाभागा नाभागेश्वाकुसंयुताः॥ १८<br>गालवोऽपि समं ताभ्यां कन्यकाभ्यामवातरत्।<br>स्नातुं स पुष्करे तीर्थे मध्यमे धनुषाकृतौ॥ १९<br>निमग्नश्चापि ददृशे महामत्स्यं जलेशयम्।<br>बह्वीभिर्मत्स्यकन्याभिः प्रीयमाणं पुनः पुनः॥ २०वहाँ केवल उन ऋतध्वजके सिवाय अन्य हजारों ऋषि, राजा एवं जनपद-निवासी भी आये। उसके बाद ऋषियों एवं नाभाग तथा इक्ष्वाकु आदि महाभाग्यवान् राजाओंने कार्तिकी पूर्णिमाके दिन पुष्करतीर्थमें स्नान किया। गालव भी उन दोनों कन्याओंके साथ धनुषकी आकृतिवाले मध्यम पुष्करतीर्थमें स्नान करनेके लिये उतरे। (जलमें) निमग्न होनेपर उन्होंने देखा कि एक जलचर महामत्स्य जलमें स्थित है और अनेक मत्स्य-कन्याएँ उसे पुनः-पुनः प्रसन्न करनेमें लगी हुई हैं॥ १७–२०॥
स ताश्चाह तिमिर्मुग्धा यूयं धर्मं न जानथ।<br>जनापवादं घोरं हि न शक्तः सोढुमुलबणम्॥ २१<br><br>तास्तमूचुर्महामत्स्यं किं न पश्यसि गालवम्।<br>तापसं कन्यकाभ्यां वै विचरन्तं यथेच्छया॥ २२<br><br>यद्यसावपि धर्मात्मा न बिभेति तपोधनः।<br>जनापवादात् तत्किं त्वं बिभेषि जलमध्यगः॥ २३<br><br>ततस्ताश्चाह स तिमिर्नैष वेत्ति तपोधनः।<br>रागान्धो नापि च भयं विजानाति सुबालिशः॥ २४उस मत्स्यने उन (मछलियों)-से कहा—भोली प्रकृति होनेके कारण तुम सभी लोक-धर्म नहीं जानती हो। मैं जनताद्वारा किये जानेवाले कठोर अपवाद (निन्दा) सहन नहीं कर सकता। (तब) उन सभी (मछलियों)-ने कहा—क्या तुम स्वच्छन्दतासे विचरते हुए तपस्वी गालवको दो कन्याओंके साथ नहीं देख रहे हो? यदि धर्मात्मा एवं तपस्वी होते हुए भी वे लोक-निन्दासे नहीं डरते तो जलमें रहनेवाले तुम क्यों डर रहे हो? उसके बाद उस तिमि (मत्स्य)-ने उनसे कहा—तपस्वी लोक-निन्दाको नहीं जानते एवं प्रेममें अन्धा होनेसे प्रचण्डमूर्ख बनकर लोक-निन्दाके भयको भी नहीं समझते॥ २१–२४॥
तच्छ्रुत्वा मत्स्यवचनं गालवो व्रीडया युतः।<br>नोत्तार निमग्नोऽपि तस्थौ स विजितेन्द्रियः॥ २५<br><br>स्नात्वा ते अपि रम्भोरू समुत्तीर्य तटे स्थिते।<br>प्रतीक्षन्त्यौ मुनिवरं तद्दर्शनसमुत्सुके॥ २६<br><br>वृत्ता च पुष्करे यात्रा गता लोका यथागतम्।<br>ऋषयः पार्थिवाश्चान्ये नाना जानपदास्तदा॥ २७<br><br>तत्र स्थितैका सुदती विश्वकर्मतनूरुहा।<br>चित्राङ्गदा सुचार्वङ्गी वीक्षन्ती तनुमध्यमे॥ २८मत्स्यके उस वचनको सुनकर गालव लज्जित हो गये। (फिर तो) वे जितेन्द्रिय मुनि जलमें निमग्न होनेपर भी ऊपर नहीं आये, भीतर ही डूबे रहे। वे दोनों कदली-सदृश ऊरूवाली सुन्दरियाँ स्नान करनेके बाद जलसे बाहर निकल कर तीरपर खड़ी हो गयीं एवं मुनिश्रेष्ठका दर्शन करनेके लिये उत्कण्ठित होकर उनकी प्रतीक्षा करने लगीं। पुष्करकी यात्रा पूरी होनेपर सभी ऋषि, राजा और नगरवासी लोग जहाँसे आये थे, वहाँ चले गये। वहाँ केवल सुन्दर दाँतोंवाली एवं पतली सुन्दर शरीरवाली विश्वकर्माकी कन्या चित्राङ्गदा उन दोनों कृशोदरियों (कन्याओं)-को देखती हुई रह गयी॥ २५–२८॥
ते स्थिते चापि वीक्षन्त्यौ प्रतीक्षन्त्यौ च गालवम्।<br>संस्थिते निर्जने तीर्थे गालवोऽन्तर्जले तथा॥ २९वे दोनों भी (उसे) देखती एवं गालवकी प्रतीक्षा करती हुई निर्जन तीर्थमें पड़ी रहीं और गालव जलके

६६- दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप, प्रह्लादका अन्धकको उपदेश और अन्धक-शिव-सन्दर्भ

अध्याय ६५ ] गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त [ ३०७


श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततोऽभ्यागाद् वेदवती नाम्ना गन्धर्वकन्यका।<br>पर्जन्यतनया साध्वी घृताचीगर्भसम्भवा॥ ३०<br><br>सा चाभ्येत्य जले पुण्ये स्नात्वा मध्यमपुष्करे।<br>ददर्श कन्यात्रितयमुभयोस्तटयोः स्थितम्॥ ३१<br><br>चित्राङ्गदामथाभ्येत्य पर्यपृच्छदनिष्ठुरम्।<br>कासि केन च कार्येण निर्जने स्थितवत्यसि॥ ३२भीतर ही स्थित रहे। उसके बाद वेदवती नामकी गन्धर्व-कन्या वहाँ आयी। वह साध्वी घृताचीके गर्भसे उत्पन्न हुई थी एवं पर्जन्य नामक गन्धर्वकी पुत्री थी। उसने आकर मध्यम पुष्करतीर्थके पवित्र जलमें स्नान किया और दोनों तटोंपर स्थित (उन) तीनों कन्याओंको देखा। इसके बाद चित्राङ्गदाके समीप जाकर उसने सरलतासे पूछा—तुम कौन हो? और किस कार्यसे इस निर्जन स्थानमें स्थित हो?॥ २९—३२॥
सा तामुवाच पुत्रीं मां विन्दस्व सुरवर्धकेः।<br>चित्राङ्गदेति सुश्रोणि विख्यातां विश्वकर्मणः॥ ३३<br><br>साहमभ्यागता भद्रे स्नातुं पुण्यां सरस्वतीम्।<br>नैमिषे काञ्चनाक्षीं तु विख्यातां धर्ममातरम्॥ ३४<br><br>तत्रागताथ राज्ञाऽहं दृष्टा वैदर्भकेण हि।<br>सुरथेन स कामार्तो मामेव शरणं गतः॥ ३५<br><br>मयात्मा तस्य दत्तश्च सखीभिर्वार्यमाणया।<br>ततः शप्ताऽस्मि तातेन वियुक्तास्मि च भूभुजा॥ ३६उस (चित्राङ्गदा)-ने उस (वेदवती)-से कहा—हे सुश्रोणि! मुझे देवशिल्पी विश्वकर्माकी चित्राङ्गदा नामसे प्रसिद्ध पुत्री जानो। भद्रे! मैं नैमिषमें धर्मकी जननी काञ्चनाक्षी नामसे प्रसिद्ध पवित्र सरस्वती नदीमें स्नान करने आयी थी। वहाँ आनेपर विदर्भवंशमें उत्पन्न राजा सुरथने मुझे देखा और कामपीड़ित होकर मेरी शरणमें आया। सखियोंके रोकनेपर भी मैंने उन्हें अपनेको समर्पित कर दिया। उसके बाद पिताजीने मुझे शाप दे दिया और मैं राजासे वियोगिनी हो गयी॥ ३३—३६॥
मर्तुं कृतमतिर्भद्रे वारिता गुह्यकेन च।<br>श्रीकण्ठमगमं द्रष्टुं ततो गोदावरं जलम्॥ ३७<br><br>तस्मादिमं समायाता तीर्थप्रवरमुत्तमम्।<br>न चापि दृष्टः सुरथः स मनोह्लादनः पतिः॥ ३८<br><br>भवती चात्र का बाले वृत्ते यात्राफलेऽधुना।<br>समागता हि तच्छंस मम सत्येन भामिनि॥ ३९<br><br>साब्रवीच्छ्रूयतां याऽस्मि मन्दभाग्या कृशोदरी।<br>यथा यात्राफले वृत्ते समायाताऽस्मि पुष्करम्॥ ४०भद्रे! मैंने मरनेका विचार किया; परंतु गुह्यकने मुझे रोक दिया। उसके बाद मैं श्रीकण्ठभगवान्‌का दर्शन करनेके लिये गयी और वहाँसे गोदावर जलके निकट गयी, (और अब) वहाँसे मैं इस श्रेष्ठ उत्तम तीर्थमें आ गयी हूँ। किंतु मनको आनन्दित करनेवाले उन सुरथ पतिको मैंने नहीं देखा। बाले! यात्राफलके समाप्त होनेपर (पर्वकी समाप्ति हो जानेपर) आज यहाँ आनेवाली आप कौन हैं? भामिनि! मुझे सच-सच बतलाओ। उसने कहा—कृशोदरि! मैं मन्दभागिनी कौन हूँ तथा यात्राफलके समाप्त होनेपर पुष्करमें क्यों आयी हूँ, उसे सुनो॥ ३७—४०॥
पर्जन्यस्य घृताच्यां तु जाता वेदवतीति हि।<br>रममाणा वनोद्देशे दृष्टाऽस्मि कपिना सखि॥ ४१<br><br>स चाभ्येत्याब्रवीत् का त्वं यासि देववतीति हि।<br>आनीतास्याश्रमात् केन भूपृष्ठान्मेरुपर्वतम्॥ ४२<br><br>ततो मयोक्तो नैवास्मि कपे देववतीत्यहम्।<br>नाम्ना वेदवतीत्येवं मेरोरपि कृताश्रया॥ ४३मैं पर्जन्य नामक गन्धर्वकी पुत्री हूँ तथा घृताचीके गर्भसे उत्पन्न हुई हूँ। मेरा नाम वेदवती है। सखि! वनप्रदेशमें भ्रमण कर रही मुझको एक बन्दरने देखा। उसने समीपमें आकर मुझसे कहा—तुम कौन हो? कहाँ जा रही हो? (निश्चय ही तुम) देववती हो। पृथ्वीपर रहनेवाले आश्रमसे मेरुपर्वतपर तुम्हें कौन लाया है? इसपर मैंने कहा—कपे! मैं देववती नहीं हूँ, मेरा नाम वेदवती है। मेरुपर्वतपर ही मैंने अपना
३०८श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६५

| ततस्तेनातिदुष्टेन वानरेण हृषिद्रुता।<br>समारूढास्मि सहसा बन्धुजीवं नगोत्तमम्॥ ४४ | आश्रम बना लिया है। उसके बाद अत्यन्त दुष्ट उस बन्दरसे खदेड़ी जाती हुई मैं बन्धुजीव (गुलदुपहरिया) के उत्तम वृक्षपर शीघ्रतासे चढ़ गयी॥ ४१-४४॥ | | तेनापि वृक्षस्तरसा पादाक्रान्तस्त्वभज्यत।<br>ततोऽस्य विपुलां शाखां समालिङ्ग्य स्थिता त्वहम्॥ ४५<br><br>ततः प्लवङ्गमो वृक्षं प्राक्षिपत् सागराम्भसि।<br>सह तेनैव वृक्षेण पतितास्म्यहमाकुला॥ ४६<br><br>ततोऽम्बरतलाद् वृक्षं निपतन्तं यदृच्छया।<br>ददृशुः सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च॥ ४७<br><br>ततो हाहाकृतं लोकैर्मां पतन्तीं निरीक्ष्य हि।<br>ऊचुश्च सिद्धगन्धर्वाः कष्टं सेयं महात्मनः॥ ४८<br><br>इन्द्रद्युम्नस्य महिषी गदिता ब्रह्मणा स्वयम्।<br>मनोः पुत्रस्य वीरस्य सहस्रक्रतुयाजिनः॥ ४९ | उसने शीघ्र ही पैरके आघातसे उस वृक्षको तोड़ दिया। उसके बाद मैं उस वृक्षकी एक बड़ी डालीको पकड़कर स्थित रही। फिर बन्दरने उस वृक्षको समुद्रके जलमें फेंक दिया। मैं अत्यन्त घबड़ाकर उस वृक्षके साथ ही जलमें गिर पड़ी। उसके बाद चर और अचर सभी प्राणियोंने आकाशसे गिरनेवाले उस वृक्षको देखा। उसके बाद उसीके साथ मुझको भी गिरती हुई देखकर सभी लोग हाहाकार करने लगे। सिद्ध और गन्धर्वलोग कहने लगे—हाय! यह कष्टकी बात है। इसके सम्बन्धमें तो ब्रह्माने स्वयं कहा था कि यह कन्या हजारों यज्ञोंके करनेवाले मनुके वीर पुत्र इन्द्रद्युम्नकी राजरानी होगी (पर यह क्या हो गया!)॥ ४५-४९॥ | | तां वाणीं मधुरां श्रुत्वा मोहमस्यागता ततः।<br>न च जाने स केनापि वृक्षश्छिन्नः सहस्रधा॥ ५०<br><br>ततोऽस्मि वेगाद् बलिना हृतानलसखेन हि।<br>समानीतास्म्यहमिमं त्वं दृष्टा चाद्य सुन्दरि॥ ५१<br><br>तदुत्तिष्ठस्व गच्छावः पृच्छावः क इमे स्थिते।<br>कन्यके अनुपश्ये हि पुष्करस्योत्तरे तटे॥ ५२<br><br>एवमुक्त्वा वराङ्गी सा तया सुत नुकन्यया।<br>जगाम कन्यके द्रष्टुं प्रष्टुं कार्यसमुत्सुका॥ ५३ | उस मधुर वाणीको सुननेके बाद मुझे मूर्च्छा आ गयी। मैं यह नहीं जानती कि उस वृक्षको किसने सहस्रों टुकड़ोंमें काट डाला। उसके बाद अग्निके सखा बलवान् वायुने मुझे शीघ्रतासे यहाँ ला दिया है। सुन्दरि! तुमको आज मैंने यहाँ देखा है। इसलिये उठो, हम दोनों चलें; और फिर पूछें तथा देखें कि पुष्करतीर्थके उत्तरी तटपर दिखायी देनेवाली ये दोनों कन्याएँ कौन हैं? ऐसा कहकर इस कार्यके करनेमें उत्कण्ठित वह सुन्दरी उस सुन्दर तथा दुर्बल देहवाली कन्याके साथ उस पारकी दोनों कन्याओंको देखने तथा वस्तुस्थिति पूछनेके लिये वहाँ गयी॥ ५०-५३॥ | | ततो गत्वा पर्यपृच्छत् ते ऊचतुरभे अपि।<br>याथातथ्यं तयोस्ताभ्यां स्वमात्मानं निवेदितम्॥ ५४<br><br>ततस्ताश्चतुरोपीह सप्तगोदावरं जलम्।<br>सम्प्राप्य तीर्थे तिष्ठन्ति अर्चन्त्यो हाटकेश्वरम्॥ ५५<br><br>ततो बहून् वर्षगणान् बभ्रमुस्ते जनास्त्रयः।<br>तासामर्थाय शकुनिर्जाबालिः स ऋतध्वजः॥ ५६<br><br>भारवाही ततः खिन्नो दशाब्दशतिके गते।<br>काले जगाम निर्वेदात् समं पित्रा तु शाकलम्॥ ५७ | उसके बाद वहाँ जाकर उसने उन दोनोंसे पूछा। उन दोनोंने अपनी सच्ची घटना उन दोनोंसे बतायीं। उसके बाद चारों कन्याएँ सप्तगोदावर जलके समीप जाकर हाटकेश्वर भगवान्‌की पूजा करती हुई तीर्थमें रहने लगीं। इधर शकुनि, जाबालि और ऋतध्वज—ये तीनों व्यक्ति उन कन्याओंके लिये अनेक वर्षोंतक भ्रमण करते रहे। तब एक हजार वर्ष बीत जानेपर भार-वहन करनेवाले (जाबालि) खिन्न होकर पिताके साथ शाकल जनपदमें चले गये॥ ५४-५७॥ |

अध्याय ६५ ]गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त३०१

| तस्मिन्नरपतिः श्रीमानिन्द्रद्युम्नो मनोः सुतः।<br>समध्यास्ते स विज्ञाय सार्घपात्रो विनिर्ययौ॥ ५८<br><br>सम्यक् सम्पूजितस्तेन सजाबालिर्ऋतध्वजः।<br>स चेक्ष्वाकुसुतो धीमान् शकुनिर्भ्रातृजोऽर्चितः॥ ५९<br><br>ततो वाक्यं मुनिः प्राह इन्द्रद्युम्नमृतध्वजः।<br>राजन् नष्टाऽबलास्माकं नन्दयन्तीति विश्रुता॥ ६०<br><br>तस्यार्थे चैव वसुधा अस्माभिरटिता नृप।<br>तस्मादुत्तिष्ठ मार्गस्व साहाय्यं कर्तुमर्हसि॥ ६१<br><br>अथोवाच नृपो ब्रह्मन् ममापि ललनोत्तमा।<br>नष्टा कृतश्रमस्यापि कस्याहं कथयामि ताम्॥ ६२<br><br>आकाशात् पर्वताकारः पतनामो नगोत्तमः।<br>सिद्धानां वाक्यमाकर्ण्य बाणैश्छिन्नः सहस्रधा॥ ६३<br><br>न चैव सा वरारोहा विभिन्ना लाघवान्मया।<br>न च जानामि सा कुत्र तस्माद् गच्छामि मार्गितुम्॥ ६४<br><br>इत्येवमुक्त्वा स नृपः समुत्थाय त्वरान्वितः।<br>स्यन्दनानि द्विजाभ्यां स भ्रातृपुत्राय चार्पयत्॥ ६५<br><br>तेऽधिरुह्य रथांस्तूर्णं मार्गन्ते वसुधां क्रमात्।<br>बदर्याश्रममासाद्य ददृशुस्तपसां निधिम्॥ ६६<br><br>तपसा कर्शितं दीनं मलपङ्कजटाधरम्।<br>निःश्वासायासपरमं प्रथमे वयसि स्थितम्॥ ६७<br><br>तमुपेत्याब्रवीद् राजा इन्द्रद्युम्नो महाभुजः।<br>तपस्विन् यौवने घोरमास्थितोऽसि सुदुश्चरम्॥ ६८<br><br>तपः किमर्थं तच्छंस किमभिप्रेतमुच्यताम्।<br>सोऽब्रवीत् को भवान् ब्रूहि ममात्मानं सुहृत्तया॥ ६९<br><br>परिपृच्छसि शोकार्तं परिखिन्नं तपोऽन्वितम्।<br>स प्राह राजाऽस्मि विभो तपस्विञ्शाकले पुरे॥ ७०<br><br>मनोः पुत्रः प्रियो भ्राता इक्ष्वाकोः कथितं तव।<br>स चास्मै पूर्वचरितं सर्वं कथितवान् नृपः॥ ७१ | वहाँ मनुके पुत्र श्रीमान् राजा इन्द्रद्युम्न निवास कर रहे थे। वे इस समाचारको जानकर अर्घपात्र हाथमें लिये बाहर निकले। उन्होंने विधिपूर्वक सुन्दर रीतिसे जाबालि और ऋतध्वजकी पूजा की तथा उस इक्ष्वाकुनन्दन बुद्धिमान् भतीजे शकुनिकी भी अर्चना की। उसके बाद ऋतध्वज मुनिने इन्द्रद्युम्नसे कहा—राजन्! हमलोगोंकी नन्दयन्ती नामसे प्रसिद्ध (अयानी) कन्या खो गयी है। राजन्! उसके लिये हमलोगों ने सारी पृथ्वीपर भ्रमण किया है। इसलिये (कृपया) उठिये, पता लगाइये और हमारी सहायता कीजिये॥ ५८—६१॥<br><br>इसके बाद राजाने कहा—ब्रह्मन्! मेरी भी एक उत्तम लाडिली कन्या खो गयी है। उसे ढूँढ़नेमें मैं परिश्रम कर चुका हूँ। उसके विषयमें मैं किससे कहूँ। सिद्धोंका वचन सुनकर आकाशसे नीचे गिरनेवाले पर्वतके समान श्रेष्ठ वृक्षको मैंने बाणोंसे हजारों टुकड़ोंमें काट डाला। मेरे हस्तकौशलसे उस सुन्दरी कन्याको चोट नहीं लगी। मैं नहीं जानता हूँ कि वह कहाँ है? अतः उसे ढूँढ़नेके लिये मैं (भी) चल रहा हूँ। ऐसा कहनेके बाद वे राजा शीघ्रतासे उठे। उन्होंने उन दोनों ब्राह्मणों तथा अपने भतीजेके लिये रथ दे दिये॥ ६२—६५॥<br><br>वे रथोंपर चढ़कर शीघ्रतासे क्रमशः पृथ्वीपर खोज करने लगे। (इस क्रममें) उन लोगोंने बदरिकाश्रममें जाकर तपस्या करनेसे दुबले और धूल-मिट्टीसे भरे, जटा धारण किये हुए, जोर-जोरसे साँस ले रहे एक तपोमूर्ति युवकको देखा। महाबाहु राजा इन्द्रद्युम्नने उसके पास जाकर कहा—तपस्विन्! यह बतलाओ कि युवा-अवस्थामें ही तुम अत्यन्त दुष्कर कठोर तप क्यों कर रहे हो? यह भी बतलाओ कि तुम्हारी अभिलाषा क्या है? उसने कहा—आप मुझसे यह बतलायें कि चिन्तासे ग्रस्त अत्यन्त दुःखी एवं तपश्चर्यासे युक्त मुझसे प्रेमपूर्वक पूछनेवाले आप कौन हैं? उसने कहा—तपस्विन्! विभो! मैं मनुका पुत्र एवं इक्ष्वाकुका प्रिय भाई शाकलपुरका राजा हूँ। मैंने अपना परिचय कह दिया। उस राजाने भी उनसे पहलेकी सारी कथा कह सुनायी॥ ६६—७१॥ |

३१० श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
श्रुत्वा प्रोवाच राजर्षिर्मा मुञ्चस्व कलेवरम्।<br>आगच्छ यामि तन्वङ्गीं विचेतुं भ्रातृजोऽसि मे॥ ७२<br>इत्युक्त्वा सम्परिष्वज्य नृपं धमनिसंततम्।<br>समारोप्य रथं तूर्णं तापसाभ्यां न्यवेदयत्॥ ७३<br>ऋतध्वजः सपुत्रस्तु तं दृष्ट्वा पृथिवीपतिम्।<br>प्रोवाच राजन्नेह्येहि करिष्यामि तव प्रियम्॥ ७४<br>यासौ चित्राङ्गदा नाम त्वया दृष्टा हि नैमिषे।<br>सप्तगोदावरं तीर्थं सा मयैव विसर्जिता॥ ७५(ऊपर कही बातोंको) सुनकर राजर्षिने कहा— तुम अपने शरीरका त्याग मत करो। तुम मेरे भतीजे हो। आओ, मैं उस सुन्दरीकी खोज करने जा रहा हूँ। इतना कहकर उन्होंने उभरी शिराओंसे भरे हुए राजाको गले लगाया और उन्हें रथपर चढ़ाकर शीघ्र उन दोनों तपस्वियोंके पास पहुँचा दिया। पुत्रके सहित ऋतध्वजने उन राजाको देखकर कहा—राजन्! आइये! आइये! मैं आपका प्रिय कार्य करूँगा। आपने नैमिषारण्यमें जिस चित्राङ्गदाको देखा था, उसे मैंने ही सप्तगोदावर नामके तीर्थमें छोड़ दिया था॥ ७२–७५॥
तदागच्छथ गच्छामः सौदेवस्यैव कारणात्।<br>तत्रास्माकं समेष्यन्ति कन्यास्तिस्रस्तथापराः॥ ७६<br>इत्येवमुक्त्वा स ऋषिः समाश्वास्य सुदेवजम्।<br>शकुनिं पुरतः कृत्वा सेन्द्रद्युम्नः सपुत्रकः॥ ७७<br>स्यन्दनेनाश्वयुक्तेन गन्तुं समुपचक्रमे।<br>सप्तगोदावरं तीर्थं यत्र ताः कन्यका गताः॥ ७८<br>एतस्मिन्नन्तरे तन्वी घृताची शोकसंयुता।<br>विचचारोदयगिरिं विचिन्वन्ती सुतां निजाम्॥ ७९तो आइये, हमलोग सुदेवके पुत्रके कार्यसे ही वहाँ चलें। वहाँपर हमलोगोंको अन्य तीन कन्याएँ भी मिलेंगी। इस प्रकार कहकर उन्होंने ऋषि सुदेवके पुत्रको सान्त्वना दे करके एवं शकुनिको आगे कर इन्द्रद्युम्न और पुत्रके साथ घोड़े जुते रथसे सप्तगोदावर तीर्थमें जानेकी योजना बनायी—जहाँ वे कन्याएँ गयी थीं। इस बीच दुर्बलाङ्गी घृताची शोकसे चिन्तित होकर अपनी कन्याको ढूँढ़ती हुई उदयगिरिपर विचरण करने लगी॥ ७६–७९॥
तमाससाद च कपिं पर्यपृच्छत् तथाप्सराः।<br>किं बाला न त्वया दृष्टा कपे सत्यं वदस्व माम्॥ ८०<br>तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा स कपिः प्राह बालिकाम्।<br>दृष्टा देववती नाम्ना मया न्यस्ता महाश्रमे॥ ८१<br>कालिन्द्या विमले तीर्थे मृगपक्षिसमन्विते।<br>श्रीकण्ठायतनस्याग्रे मया सत्यं तवोदितम्॥ ८२<br>सा प्राह वानरपते नाम्ना वेदवतीति सा।<br>न हि देववती ख्याता तदागच्छ व्रजावहे॥ ८३वहाँ घृताची अप्सराको वह बन्दर मिल गया। घृताची अप्सराने उससे पूछा—कपे! मुझसे सच कहो कि क्या तुमने लड़कीको नहीं देखा है? उसके वचनको सुनकर उस कपिने कहा—मैंने देववती नामकी बालिकाको देखा है और उसे मृगों तथा पक्षियोंसे भरे कालिन्दीके विमलतीर्थमें श्रीकण्ठके मन्दिरके सामने स्थित महाश्रममें रख दिया है। मैंने तुमसे यह सत्य बात कही है। उस (घृताची)-ने कहा—कपिराज! वह वेदवती नामसे विख्यात है, वह देववती नहीं है। तो आओ; हम दोनों वहाँ चलें॥ ८०–८३॥
घृताच्यास्तद्वचः श्रुत्वा वानरस्त्वरितक्रमः।<br>पृष्ठतोऽस्याः समागच्छन्नदीमन्वेव कौशिकीम्॥ ८४<br>ते चापि कौशिकीं प्राप्ता राजर्षिप्रवरास्त्रयः।<br>द्वितयं तापसाभ्यां च रथैः परमवेगिभिः॥ ८५<br>अवतीर्य रथेभ्यस्ते स्नातुमभ्यागमन् नदीम्।<br>घृताच्यपि नदीं स्नातुं सुपुण्यामाजगाम ह॥ ८६<br>तामन्वेव कपिः प्रायाद् दृष्टो जाबालिना तथा।<br>दृष्ट्वैव पितरं प्राह पार्थिवं च महाबलम्॥ ८७घृताचीकी उस बातको सुनकर बन्दर शीघ्रतासे पग बढ़ाता हुआ उसके पीछे-पीछे कौशिकी नदीकी ओर चला। वे तीनों श्रेष्ठ राजर्षि भी दोनों तपस्वियों (जाबालि और ऋतध्वज)-के साथ बहुत तेज चलनेवाले रथोंपर चढ़कर कौशिकी नदीके समीप पहुँचे। वे लोग रथसे उतरकर स्नान करनेके लिये नदीके निकट आये। घृताची भी उस परम पवित्र नदीमें स्नान करने आयी। बन्दर भी उनके पीछे ही आ गया। जाबालिने उसे देखा। देखते ही उन्होंने पिता एवं महाबलशाली राजासे कहा— ॥ ८४–८७॥

अध्याय ६५ ] गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त ३११


श्लोकअर्थ
स एव पुनरायाति वानरस्तात वेगवान्।<br>पूर्वं जटास्वेव बलाद्येन बद्धोऽस्मि पादपे॥ ८८<br>तज्जाबालिवचः श्रुत्वा शकुनिः क्रोधसंयुतः।<br>सशरं धनुरदाय इदं वचनमब्रवीत्॥ ८९<br>ब्रह्मन् प्रदीयतां मह्यमाज्ञां तात वदस्व माम्।<br>यावदेनं निहन्म्यद्य शरेणैकेन वानरम्॥ ९०<br>इत्येवमुक्ते वचने सर्वभूतहिते रतः।<br>महर्षिः शकुनिं प्राह हेतुयुक्तं वचो महत्॥ ९१तात! यह वही बन्दर फिर तेजीसे (यहाँ) आ रहा है, जिसने पहले मुझे जबरदस्ती जटाजालसे बड़के पेड़में बाँध दिया था। जाबालिके उस वचनको सुनकर अत्यन्त कुपित हुए शकुनिने बाणसहित धनुषको लेकर यह वचन कहा—ब्रह्मन्! मुझे आज्ञा दीजिये; तात! मुझसे कहिये; क्या मैं एक बाणसे ही इस बन्दरको मार डालूँ? ऐसा कहनेपर समस्त प्राणियोंकी भलाईमें लगे रहनेवाले महर्षिने शकुनिसे अत्यन्त युक्तियुक्त वचन कहा— ॥ ८८-९१ ॥
न कश्चित्तात केनापि बध्यते हन्यतेऽपि वा।<br>वधबन्धौ पूर्वकर्मवश्यौ नृपतिनन्दन॥ ९२<br>इत्येवमुक्त्वा शकुनिंमृषिर्वानरमब्रवीत्।<br>एह्येहि वानरास्माकं साहाय्यं कर्तुमर्हसि॥ ९३<br>इत्येवमुक्तो मुनिना बाले स कपिकुञ्जरः।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्रणिपत्येदमब्रवीत्॥ ९४<br>ममाज्ञा दीयतां ब्रह्मन् शाधि किं करवाण्यहम्॥ ९४<br>इत्युक्ते प्राह स मुनिस्तं वानरपतिं वचः।<br>मम पुत्रस्त्वयोद्बद्धो जटासु वटपादपे॥ ९५तात! (वस्तुतः) न तो किसीको कोई बाँधता है और न मारता ही है। नृपतिनन्दन! वध और बन्धन पूर्वजन्ममें किये गये कर्मोंके फलाधीन होते हैं। शकुनिसे इस प्रकार कहकर मुनिने बन्दरसे कहा—बन्दर! आओ, आओ! तुम्हें हमलोगोंकी सहायता करनी चाहिये। बाले! मुनिके ऐसा कहनेपर उस श्रेष्ठ कपिने करबद्ध प्रणाम करते हुए यह कहा—ब्रह्मन्! मुझे आज्ञा दीजिये; मुझे निर्देश दीजिये कि मैं क्या करूँ? उसके ऐसा कहनेपर मुनिने उस कपिपतिसे यह वचन कहा—तुमने मेरे पुत्रको बड़के पेड़में जटाओंसे बाँध रखा था॥ ९२-९५॥
न चोन्मोचयितुं वृक्षाच्छक्नुयामोऽपि यत्नतः।<br>तदनेन नरेन्द्रेण त्रिधा कृत्वा तु शाखिनः॥ ९६<br>शाखां वहति मत्सूनुः शिरसा तां विमोचय।<br>दशवर्षशतान्यस्य शाखां वै वहतोऽगमन्॥ ९७<br>न च सोऽस्ति पुमान् कश्चिद् यो ह्युन्मोचयितुं क्षमः।<br>स ऋषेर्वाक्यमाकर्ण्य कपिर्जाबालिनो जटाः॥ ९८<br>शनैरुन्मोचयामास क्षणादुन्मोचिताश्च ताः।<br>ततः प्रीतो मुनिश्रेष्ठो वरदोऽभूदृत्तध्वजः॥ ९९विशेष यत्न करनेपर भी हमलोग उस पेड़से इसको उन्मुक्त (अलग) नहीं कर सके। इसलिये इस राजाने उस वृक्षके तीन टुकड़े कर दिये। मेरा पुत्र आजतक सिरपर उसकी डालीको ढो रहा है। अब तुम उसे उन्मुक्त कर दो। इस डालीको ढोते हुए उसको एक हजार वर्ष बीत गये हैं। ऐसा कोई पुरुष नहीं है जो इसे छुड़ानेमें समर्थ हो। उस बन्दरने ऋषिकी बात सुनकर जाबालिकी जटाओंको धीरे-धीरे खोल दिया। वे जटाएँ क्षणभरमें ही खुल गयीं। उसके बाद प्रसन्न होकर मुनिश्रेष्ठ ऋतध्वज वर देनेके लिये तैयार हो गये॥ ९६-९९॥
कपिं प्राह वृणीष्व त्वं वरं यन्मनसेप्सितम्।<br>ऋतध्वजवचः श्रुत्वा इमं वरमयाचत॥ १००<br>विश्वकर्मा महातेजाः कपित्वे प्रतिसंस्थितः।<br>ब्रह्मन् भगवान् वरं मह्यं यदि दातुमिहेच्छति॥ १०१<br>तत्स्वदत्तो महाघोरो मम शापो निवर्त्यताम्।<br>चित्राङ्गदायाः पितरं मां त्वष्टारं तपोधन॥ १०२(फिर) उन्होंने बन्दरसे कहा—तुम अपना मनोऽभिलषित वर माँगो। ऋतध्वजकी बात सुनकर कपि-योनिमें स्थित महातेजस्वी विश्वकर्माने यह वर माँगा—ब्रह्मन्! यदि आप मुझे वर देनेके लिये इच्छा कर रहे हैं तो मुझे दिये गये अपने महाघोर शापका निवारण कर दें। तपोधन! चित्राङ्गदाके पिता मुझ त्वष्टाको आप पहचान लें।
३१२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६५
संस्कृतहिन्दी
अभिजानीहि भवतः शापाद्वानरतां गतम्।<br>सुबहूनि च पापानि मया यानि कृतानि हि॥ १०३<br>कपिचापल्यदोषेण तानि मे यान्तु संक्षयम्।<br>ततो ऋतध्वजः प्राह शापस्यान्तो भविष्यन्ति॥ १०४<br>यदा घृताच्यां तनयं जनिष्यसि महाबलम्।<br>इत्येवमुक्तः संहृष्टः स तदा कपिकुञ्जरः॥ १०५आपके शापसे (ही) मैं बन्दर हो गया हूँ। कपिकी (स्वाभाविक) चञ्चलतारूपी दोषसे मैंने जिन बहुत-से पापोंको किया है, वे सभी नष्ट हो जायँ। उसके बाद ऋतध्वजने कहा—जब तुम घृताचीसे महाबलवान् पुत्र उत्पन्न करोगे तब शापका अन्त होगा। तब ऐसा कहनेपर वह कपिश्रेष्ठ अत्यन्त हर्षित हो गया॥ १००—१०५॥
स्नातुं तूर्णं महानद्यामवतीर्णः कृशोदरि।<br>ततस्तु सर्वे क्रमशः स्नात्वाऽर्च्य पितृदेवताः॥ १०६<br>जग्मुर्हृष्टा रथेभ्यस्ते घृताची दिवमुत्पतत्।<br>तमन्वेव महावेगः स कपिः प्लवतां वरः॥ १०७<br>ददृशे रूपसम्पन्नां घृताचीं स प्लवङ्गमः।<br>सापि तं बलिनां श्रेष्ठं दृष्ट्वैव कपिकुञ्जरम्॥ १०८<br>ज्ञात्वाऽथ विश्वकर्माणं कामयामास कामिनी।<br>ततोऽनुपर्वतश्रेष्ठे ख्याते कोलाहले कपिः॥ १०९<br>रमयामास तां तन्वीं सा च तं वानरोत्तमम्।<br>एवं रमन्तौ सुचिरं सम्प्राप्तौ विन्ध्यपर्वतम्॥ ११०कृशोदरि! वह शीघ्र ही महानदीमें स्नान करनेके लिये उतरा। उसके बाद वे सब क्रमशः स्नानकर पितरों और देवोंके तर्पण-अर्चन कर रथसे चले गये एवं घृताची स्वर्गमें उड़ गयी। महावेगशाली श्रेष्ठ कपिने भी उसका अनुसरण किया। उस बन्दरने रूपसे सम्पन्न घृताचीको देखा। उस कामिनी (घृताची)-ने भी बलवानोंमें श्रेष्ठ उत्तम कपिको देखकर एवं उसे विश्वकर्मा जानकर उसकी कामना की। उसके बाद कोलाहल नामसे विख्यात श्रेष्ठ पर्वतपर उस बन्दरने घृताचीके साथ एवं घृताचीने उस श्रेष्ठ बन्दरके साथ आनन्द-क्रीड़ा की। इस प्रकार बहुत दिनोंतक क्रीड़ा करते हुए वे दोनों विन्ध्यपर्वतपर पहुँचे॥ १०६—११०॥
रथैः पञ्चापि तत्तीर्थं सम्प्राप्तास्ते नरोत्तमाः।<br>मध्याह्नसमये प्रीताः सप्तगोदावरं जलम्॥ १११<br>प्राप्य विश्रामहेत्वर्थमवतेरुस्त्वरान्विताः।<br>तेषां सारथयश्चाश्वान् स्नात्वा पीतोदकाप्लुतान्॥ ११२<br>रमणीये वनोद्देशे प्रचारार्थं समुत्सृजन्।<br>शाद्वलाढ्येषु देशेषु मुहूर्त्तादेव वाजिनः॥ ११३<br>तृप्ताः समाद्रवन् सर्वे देवायतनमुत्तमम्।<br>तुरङ्गखुरनिर्घोषं श्रुत्वा ता योषितां वराः॥ ११४<br>किमेतदिति चोक्त्वैव प्रजग्मुहाटकेश्वरम्।<br>आरुह्य बलभीं तास्तु समुदैक्षन्त सर्वशः॥ ११५वे पाँचों श्रेष्ठ व्यक्ति भी उल्लसित होकर रथद्वारा दोपहरके समय सप्तगोदावर जलवाले उस तीर्थमें पहुँचे। वहाँ जाकर वे विश्राम करनेके लिये शीघ्रतासे नीचे उतरे। उनके सारथियोंने भी स्नान किया एवं घोड़ोंको जल पिलाकर तथा नहला-धुलाकर (उन्हें) सुन्दर वन-प्रदेशमें विचरण करनेके लिये छोड़ दिया। मुहूर्तभरमें ही हरियालीसे हरे-भरे स्थानमें वे घोड़े तृप्त हो गये। उसके बाद वे सभी (घोड़े) उत्तम देव-मन्दिरके पास दौड़ने लगे। घोड़ोंके तापका शब्द सुनकर श्रेष्ठ स्त्रियाँ 'यह क्या है' ऐसा कहकर हाटकेश्वर (-के मन्दिरमें) गयीं एवं छतपर चढ़कर सभी ओर देखने लगीं॥ १११—११५॥
अपश्यंस्तीर्थसलिले स्नायमानान् नरोत्तमान्।<br>ततश्चित्राङ्गदा दृष्ट्वा जटामण्डलधारिणम्।<br>सुरथं हसती प्राह संरोहत्पुलका सखीम्॥ ११६उन कन्याओंने तीर्थके जलमें स्नान करते हुए उन श्रेष्ठ पुरुषोंको देखा। फिर चित्राङ्गदाने जटा-मण्डल धारण करनेवाले नृपति सुरथको देखा। रोमाञ्चित होकर उसने हँसती हुई सखीसे कहा—
योऽसौ युवा नीलघनप्रकाशः<br>संदृश्यते दीर्घभुजः सुरूपः।नीले मेघके समान वर्ण तथा लम्बी भुजाओंवाला वह जो सुन्दर युवा पुरुष

और गणोंद्वारा मन्दरका भर जाना

अध्याय ६५ ] गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त ३१३


| स एव नूनं नरदेवसूनु-<br>र्वृतो मया पूर्वतरं पतिर्यः॥ ११७<br>यश्चैष जाम्बूनदतुल्यवर्णः<br>श्वेतं जटाभारमधारयिष्यत्।<br>स एष नूनं तपतां वरिष्ठो<br>ऋतध्वजो नात्र विचारमस्ति॥ ११८<br>ततोऽब्रवीदथो हृष्टा नन्दयन्ती सखीजनम्।<br>एषोऽपरोऽस्यैव सुतो जाबालिनात्र संशयः॥ ११९<br>इत्येवमुक्त्वा वचनं बलभ्या अवतीर्य च।<br>समासताग्रतः शम्भोर्गायन्त्यो गीतिकां शुभाम्॥ १२० | दिखलायी पड़ रहा है, निश्चय ही पहले (जन्ममें) मैंने उसी राजपुत्रको पतिरूपसे वरण किया था। इसमें कुछ विचारनेकी आवश्यकता नहीं है। स्वर्णके समान वर्णवाले जो व्यक्ति श्वेत जटाभारको धारण किये हुए हैं वे निश्चय ही तपस्वियोंमें श्रेष्ठ ऋतध्वज ही हैं (इसमें शङ्का नहीं है)। उसके बाद नन्दयन्तीने सखियोंसे हर्षित होकर कहा—वह दूसरा व्यक्ति निःसन्देह इन्हीं ऋतध्वजके पुत्र जाबालि हैं। इस प्रकार कहकर वे सभी छतसे उतरीं एवं शङ्करके सामने बैठकर कल्याण करनेवाले गीतका गान करने (स्तुति करने) लगीं—॥ ११६-१२०॥ | | नमोऽस्तु शर्व शम्भो त्रिनेत्र चारुगात्र त्रैलोक्यनाथ<br><br>उमापते दक्षयज्ञविध्वंसकर कामाङ्गनाशन घोर<br><br>पापप्रणाशन महापुरुष महोग्रमूर्ते सर्वसत्त्वक्षयंकर<br><br>शुभङ्कर महेश्वर त्रिशूलधारिन् स्मरारे गुहावासिन्<br><br>दिग्वासः महाशङ्खशेखर जटाधर कपालमाला-<br><br>विभूषितशरीर वामचक्षुः वामदेवप्रजाध्यक्ष भगाक्ष्णोः<br><br>क्षयङ्कर भीमसेन महासेनानाथ पशुपते कामाङ्गदहन<br><br>चत्वरवासिन् शिव महादेव ईशान शङ्कर भीम भव<br><br>वृषभध्वज जटिल प्रौढ महानाट्येश्वर भूरिरत्न<br><br>अविमुक्तक रुद्र रुद्रेश्वर स्थाणो एकलिङ्ग<br><br>कालिन्दीप्रिय श्रीकण्ठ नीलकण्ठ अपराजित<br><br>रिपुभयङ्कर सन्तोषपते वामदेव अघोर तत्पुरुष महाघोर<br><br>अघोरमूर्ते शान्त सरस्वतीकान्त कीनाट सहस्रमूर्ते<br><br>महोद्भव विभो कालाग्निरुद्र रुद्र हर महीधरप्रिय<br><br>सर्वतीर्थाधिवास हंस कामेश्वर केदाराधिपते परिपूर्ण<br><br>मुचुकुन्द मधुनिवासिन् कृपाणपाणे भयङ्कर विद्याराज | हे शर्व! हे शम्भो! हे तीन नेत्रवाले! हे सुन्दर गात्रवाले! हे तीनों लोकोंके स्वामिन्! हे उमापते! हे दक्ष यज्ञको विध्वस्त करनेवाले! हे कामदेवके नाश करनेवाले! हे घोर! हे पापके नष्ट करनेवाले! हे महापुरुष! हे भयङ्कर मूर्तिवाले! हे सम्पूर्ण प्राणियोंके क्षय करनेवाले! हे शुभ करनेवाले! हे महेश्वर! हे त्रिशूलधारिन्! हे कामशत्रो! हे गुफामें रहनेवाले! हे दिगम्बर! हे महाशङ्खके शिरोभूषणवाले! हे जटाधर! हे कपालमालासे विभूषित शरीरवाले! हे वामचक्षु! हे वामदेव! हे प्रजाध्यक्ष! हे भगाक्षिके क्षयकारिन्! हे भीमसेन! हे महासेनानाथ! हे पशुपते! हे कामदेवके जलानेवाले! हे चत्वरवासिन् (चबूतरेपर वास करनेवाले)! हे शिव! हे महादेव! हे ईशान! हे शङ्कर! हे भीम! हे भव! हे वृषभध्वज! हे जटिल! हे प्रौढ! हे महानाट्येश्वर! हे भूरिरत्न (रत्नराशि)! हे अविमुक्तक! हे रुद्र! हे रुद्रेश्वर! हे स्थाणो! हे एकलिङ्ग! हे कालिन्दीप्रिय! हे श्रीकण्ठ! हे नीलकण्ठ! हे अपराजित! हे रिपुभयङ्कर! हे सन्तोषपते! हे वामदेव! हे अघोर! हे तत्पुरुष! हे महाघोर! हे अघोरमूर्ते! हे शान्त! हे सरस्वतीकान्त! हे कीनाट! हे सहस्रमूर्ते! हे महोद्भव! हे विभो! हे कालाग्निरुद्र! हे रुद्र! हे हर! हे महीधरप्रिय! हे सर्वतीर्थाधिवास! हे हंस! हे कामेश्वर! हे केदाराधिपते! हे परिपूर्ण! हे मुचुकुन्द! हे मधुनिवासिन्! हे कपालपाणे! हे भयङ्कर! हे विद्याराज! |

३१४श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सोमराज कामराज रञ्जक अञ्जनराजकन्याहृदचल-<br>वसते समुद्रशायिन् गजमुख घण्टेश्वर गोकर्ण ब्रह्मयोने।<br>सहस्रवक्त्राक्षिचरण हाटकेश्वर नमोऽस्तु ते॥हे सोमराज! हे कामराज! हे रञ्जक! हे अञ्जनराजकन्या (काली)-के हृदयमें सदा रहनेवाले! हे समुद्रशायिन्! हे गजमुख! हे घण्टेश्वर! हे गोकर्ण! हे ब्रह्मयोने! हे हजार मुख, आँख एवं चरणवाले! हे हाटकेश्वर! आपको नमस्कार है।
एतस्मिन्नन्तरे प्राप्ताः सर्व एवर्षिपार्थिवाः।<br>द्रष्टुं त्रैलोक्यकर्तारं त्र्यम्बकं हाटकेश्वरम्॥ १२१<br>समारूढाश्च सुस्नाता ददृशुर्योषितश्च ताः।<br>स्थितास्तु पुरतस्तस्य गायन्त्यो गेयमुत्तमम्॥ १२२<br>ततः सुदेवतनयो विश्वकर्मसुतां प्रियाम्।<br>दृष्ट्वा हृषितचित्तस्तु संरोहत्पुलको बभौ॥ १२३<br>ऋतध्वजोऽपि तन्वङ्गीं दृष्ट्वा चित्राङ्गदां स्थिताम्।<br>प्रत्यभिज्ञाय योगात्मा बभौ मुदितमानसः॥ १२४<br>ततस्तु सहसाऽभ्येत्य देवेशं हाटकेश्वरम्।<br>सम्पूजयन्तस्त्र्यक्षं ते स्तुवन्तः संस्थिताः क्रमात्॥ १२५इसी बीच समस्त ऋषि एवं राजालोग तीनों लोकोंके कर्ता भगवान् त्र्यम्बक हाटकेश्वरका दर्शन करने वहाँ पहुँच गये और भलीभाँति स्नान करनेके बाद ऊपर चढ़कर उन लोगोंने देवताके अभिमुख बैठकर गीत गाती हुई (स्तुति करती हुई) स्त्रियोंको देखा। उसके बाद वसुदेवके पुत्र अपनी प्रिया विश्वकर्माकी पुत्रीको देखकर हर्षसे गद्गद हो गये। योगी ऋतध्वज भी तन्वङ्गी चित्राङ्गदाको वहाँ स्थित देख एवं पहचानकर महान् हर्षमें भर गये। उसके बाद सभी व्यक्ति शीघ्र ही देवाधिदेव हाटकेश्वर भगवान्‌के निकट गये एवं त्रिलोचनकी पूजाकर क्रमशः खड़े होकर स्तुति करने लगे॥ १२१-१२५॥
चित्राङ्गदापि तान् दृष्ट्वा ऋतध्वजपुरोगमान्।<br>समं ताभिः कृशाङ्गीभिरभ्युत्थायाभ्यवादयत्॥ १२६<br>स च ताः प्रतिनन्द्यैव समं पुत्रेण तापसः।<br>समं नृपतिभिर्हृष्टः संविवेश यथासुखम्॥ १२७<br>ततः कपिवरः प्राप्तो घृताच्या सह सुन्दरि।<br>स्नात्वा गोदावरीतीर्थे दिदृक्षुर्हाटकेश्वरम्॥ १२८<br>ततोऽपश्यत् सुतां तन्वीं घृताची शुभदर्शनाम्।<br>साऽपि तां मातरे दृष्ट्वा हृष्टाऽभूद्वरवणिनी॥ १२९चित्राङ्गदाने भी उन ऋतध्वज आदिको देखकर उन तन्वङ्गी (कन्याओं)-के साथ उठकर प्रणाम किया। पुत्रसहित उन तपस्वीने उन्हें आशीर्वाद दिया और वे प्रसन्नतासे राजाओंके साथ सुखपूर्वक बैठ गये। सुन्दरि! उसके बाद गोदावरीतीर्थमें स्नानकर हाटकेश्वर भगवान्‌का दर्शन करनेकी इच्छावाला वह श्रेष्ठ बन्दर भी घृताचीके साथ वहाँ पहुँचा। फिर घृताचीने अपनी शोभाशालिनी कृशाङ्गी पुत्रीको देखा। वह सुन्दरी भी अपनी उस माताको देखकर हर्षित हो गयी॥ १२६-१२९॥
ततो घृताची स्वां पुत्रीं परिष्वज्य न्यपीडयत्।<br>स्नेहात् सवाष्पनयनां मुहुस्तां परिजिघ्रती॥ १३०उसके बाद घृताचीने अपनी पुत्रीको भलीभाँति गले लगाया। स्नेहसे आँखोंमें आँसू भरकर वह (अपनी) पुत्रीको बार-बार सूँघने लगी—आशीर्वादात्मक शुभ भावना करने लगी।
ततो ऋतध्वजः श्रीमान् कपिं वचनमब्रवीत्।<br>गच्छानेतुं गुह्यकं त्वमञ्जनाद्रौ महाञ्जनम्॥ १३१उसके बाद श्रीमान् ऋतध्वजने कपिसे कहा—तुम महाजन नामके गुह्यकको ले आनेके

| अध्याय ६५ ] | गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त | ३१५ | | :--- | :--- |

| पातालादपि दैत्येशं वीरं कन्दरमालिनम्।<br>स्वर्गाद् गन्धर्वराजानं पर्जन्यं शीघ्रमानय॥ १३२<br>इत्येवमुक्ते मुनिना प्राह वेदवती कपिम्।<br>गालवं वानरश्रेष्ठ इहानेतुं त्वमर्हसि॥ १३३ | लिये अञ्जन नामक पर्वतपर चले जाओ। फिर पातालसे वीर दैत्येश्वर कन्दारमालीको और स्वर्गसे गन्धर्वराज पर्जन्यको यहाँ शीघ्र बुला लाओ। मुनिके इस प्रकार कहनेपर वेदवतीने बन्दरसे कहा—कपिश्रेष्ठ! गालवको भी आप यहाँ बुला लावें॥ १३०-१३३॥ | | इत्येवमुक्ते वचने कपिर्मारुतविक्रमः।<br>गत्वाऽञ्जनं समामन्त्र्य जगामामरपर्वतम्॥ १३४<br>पर्जन्यं तत्र चामन्त्र्य प्रेषयित्वा महाश्रमे।<br>सप्तगोदावरे तीर्थे पातालमगमत् कपिः॥ १३५<br>तत्रामन्त्र्य महावीर्यं कपिः कन्दरमालिनम्।<br>पातालादभिनिष्क्रम्य महीं पर्यचरज्जवी॥ १३६<br>गालवं तपसो योनिं दृष्ट्वा माहिष्मतीमनु।<br>समुत्पत्यानयच्छीघ्रं सप्तगोदावरं जलम्॥ १३७<br>तत्र स्नात्वा विधानेन सम्प्राप्तो हाटकेश्वरम्।<br>ददृशे नन्दयन्तीं च स्थितां वेदवतीमपि॥ १३८ | ऐसा कहनेपर वायुके समान पराक्रमवाला कपि अञ्जनपर्वतपर पहुँच गया और (गुह्यकको) आमन्त्रित कर पुनः सुमेरुपर्वतपर प्रविष्ट हो गया। वहाँ उसने पर्जन्यको आमन्त्रित किया और सप्तगोदावरतीर्थमें स्थित महाश्रममें उन्हें भेजनेके बाद वह फिर पाताललोकमें प्रविष्ट हो गया। वहाँ (जाकर उसने) महापराक्रमी कन्दारमालीको आमन्त्रित किया। वेगशाली बन्दर फिर पातालसे निकलकर पृथ्वीपर घूमने-फिरने लगा। तपोनिधि गालवको माहिष्मतीके निकट देखकर उसने छलाँग भरी और उन्हें शीघ्र सप्तगोदावरके जलके निकट ला दिया। वहाँ विधानसे स्नान करनेके बाद वह हाटकेश्वरके समीप पहुँचा और उसने वहाँ बैठी हुई नन्दयन्ती तथा वेदवतीको भी देखा॥ १३४-१३८॥ | | तं दृष्ट्वा गालवं चैव समुत्थायाभ्यवादयत्।<br>स चार्चयिष्यन्महादेवं महर्षीनभ्यवादयत्।<br>ते चापि नृपतिश्रेष्ठास्तं सम्पूज्य तपोधनम्॥ १३९<br>प्रहर्षमतुलं गत्वा उपविष्टा यथासुखम्।<br>तेषूपविष्टेषु तदा वानरोपनिमन्त्रिताः॥ १४०<br>समायाता महात्मानो यक्षगन्धर्वदानवाः।<br>तानागतान् समीक्ष्यैव पुत्र्यस्ताः पृथुलोचनाः॥ १४१<br>स्नेहार्द्रनयनाः सर्वास्तदा सस्वजिरे पितॄन्।<br>नन्दयन्त्यादिका दृष्ट्वा सपितृका वरानना॥ १४२<br>सवाष्पनयना जाता विश्वकर्मसुता तदा।<br>अथ तामाह स मुनिः सत्यं सत्यध्वजो वचः॥ १४३ | उन सभीने गालवको देखकर उठकर उनको प्रणाम किया। उन्होंने भी महादेवकी पूजा कर महर्षियोंको प्रणाम किया। उन श्रेष्ठ राजाओंने भी उन तपस्वीकी पूजा की तथा वे अत्यन्त हर्षित होकर सुखपूर्वक बैठ गये। उनके बैठ जानेपर कपिद्वारा आमन्त्रित किये गये यक्ष, महानुभाव गन्धर्व एवं दानव वहाँ आ गये। उन्हें आया हुआ देखते ही उन विशालनयना पुत्रियोंके नेत्रोंमें स्नेहसे आँसू भर आये। वे सभी अपने-अपने पिताके गले लग गयीं। नन्दयन्ती आदिको पिताके साथ उपस्थित हुई देखकर विश्वकर्माकी सुन्दरी पुत्रीके नेत्रोंमें (पिताकी स्मृतिमें) आँसू छलक आये। उसके बाद ऋतध्वज मुनिने उससे सच्ची बात कह दी—॥ १३९-१४३॥ | | मा विषादं कृथाः पुत्रि पिताऽयं तव वानरः।<br>सा तद्वचनमाकर्ण्य व्रीडोपहतचेतना॥ १४४<br>कथं तु विश्वकर्माऽसौ वानरत्वं गतोऽधुना।<br>दुष्पुत्र्यां मयि जातायां तस्मात् त्यक्ष्ये कलेवरम्॥ १४५<br>इति संचिन्त्य मनसा ऋतध्वजमुवाच ह। | पुत्रि! तुम उदास मत होओ। यह बन्दर ही तुम्हारा पिता है। उस वचनको सुनकर वह लजा गयी; क्योंकि मुझ कुपुत्रीके जन्म लेनेके कारण ये विश्वकर्मा इस समय बन्दर हो गये हैं; अतः (उसने सोचा—) मैं अपने शरीरका त्याग करूँगी। मनमें इस प्रकार |

३१६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६५

| परित्रायस्व मां ब्रह्मन् पापोपहतचेतनाम् ॥ १४६<br><br>पितृघ्नी मर्तुमिच्छामि तदनुज्ञातुमर्हसि ।<br><br>अथोवाच मुनिस्तन्वीं मा विषादं कृथाधुना ॥ १४७ | विचारकर उसने ऋतध्वजसे कहा—ब्रह्मन्! मैं पापसे नष्टमतिवाली हूँ। आप मेरी रक्षा करें। पिताका घात करनेवाली मैं मरना चाहती हूँ। अतः आप स्वीकृति दें। तब मुनिने उस तन्वङ्गीसे कहा—अब विषाद मत करो ॥ १४४—१४७॥ | | भाव्यस्य नैव नाशोऽस्ति तन्मा त्याक्षीः कलेवरम्।<br>भविष्यति पिता तुभ्यं भूयोऽप्यमरवर्द्धकिः ॥ १४८<br>जातेऽपत्ये घृताच्यां तु नात्र कार्या विचारणा।<br>इत्येवमुक्ते वचने मुनिना भावितात्मना ॥ १४९<br>घृताची तां समभ्येत्य प्राह चित्राङ्गदां वचः ।<br>पुत्रि त्यजस्व शोकं त्वं मासैर्दशभिरात्मजः ॥ १५०<br>भविष्यति पितुस्तुभ्यं मत्सकाशान्न संशयः ।<br>इत्येवमुक्ता संहृष्टा बभौ चित्राङ्गदा तदा ॥ १५१ | भवितव्यताका विनाश नहीं होता—होनी होकर रहती है। इसलिये देहका परित्याग मत करो। घृताचीकी कोखसे पुत्रके उत्पन्न हो जानेपर तुम्हारे पिता फिर देवताओंके शिल्पी हो जायेंगे—इसमें संदेह नहीं है। मनके ऊपर नियन्त्रण रखनेवाले मुनिके इस प्रकार कहनेपर घृताचीने चित्राङ्गदाके पास जाकर उससे कहा—पुत्रि! तुम चिन्ता करना छोड़ दो। तुम्हारे पिताद्वारा मुझसे दस महीनोंमें निःसंदेह एक पुत्र उत्पन्न होगा। (फिर सुतरां शाप-विमोचन हो जायगा।) ऐसा कहनेपर चित्राङ्गदा हर्षित हो गयी ॥ १४८—१५१ ॥ | | प्रतीक्षन्ती सुचार्वङ्गी विवाहे पितृदर्शनम् ।<br>सर्वास्ता अपि तावन्तं कालं सुतनुकन्यकाः ॥ १५२<br>प्रत्यैक्षन्त विवाहं हि तस्या एव प्रियेप्सया ।<br>ततो दशसु मासेषु समतीतेष्वथाप्सराः ॥ १५३<br>तस्मिन् गोदावरीतीर्थे प्रसूता तनयं नलम् ।<br>जातेऽपत्ये कपित्वाच्च विश्वकर्माप्यमुच्यत ॥ १५४ | सुन्दरी (चित्राङ्गदा) अपने विवाहमें मिलनेवाले पिताके दर्शनकी (उत्सुकतासे) प्रतीक्षा करने लगी। वे सुन्दरी सभी कन्याएँ भी प्रियकी प्राप्तिकी वाञ्छासे उसके विवाहके समयकी प्रतीक्षा करने लगीं। दस महीने बीत जानेपर अप्सराने उस गोदावरीतीर्थमें पुत्रको उत्पन्न किया, जो (आगे चलकर) नल (नामक) हुआ। पुत्रके उत्पन्न हो जानेपर विश्वकर्मा भी वानरत्वसे छूट गये ॥ १५२—१५४ ॥ | | समभ्येत्य प्रियां पुत्रीं पर्यष्वजत चादरात् ।<br>ततः प्रीतेन मनसा सस्मार सुरवर्द्धकिः ॥ १५५<br>सुराणामधिपं शक्रं सहैव सुरकिन्नरैः ।<br>त्वष्टाऽथ संस्मृतः शक्रो मरुद्गणवृतस्तदा ॥ १५६<br>सुरैः सरुद्रैः सम्प्राप्तस्तत्तीर्थं हाटकाह्वयम् ।<br>समायातेषु देवेषु गन्धर्वेष्वप्सरस्सु च ॥ १५७<br>इन्द्रद्युम्नो मुनिश्रेष्ठमृतध्वजमुवाच ह।<br>जाबालेर्दीयतां ब्रह्मन् सुता कन्दरमालिनः ॥ १५८<br>गृह्णातु विधिवत् पाणिं दैतेय्यास्तनयस्तव ।<br>नन्दयन्तीं च शकुनिः परिणेतुं स्वरूपवान् ॥ १५९ | अपनी प्रिय पुत्रीके पास जाकर उन्होंने उसको स्नेहपूर्वक गले लगाया। उसके बाद प्रसन्न मनसे देवशिल्पीने देवताओं एवं किन्नरोंसहित देवराज इन्द्रका स्मरण किया। देवशिल्पीके स्मरण करनेपर इन्द्र मरुद्गणों, देवों एवं रुद्रोंके साथ हाटक नामके तीर्थमें आ गये। देवताओं, गन्धर्वों और अप्सराओंके आनेपर इन्द्रद्युम्नने मुनिश्रेष्ठ ऋतध्वजसे कहा—ब्रह्मन्! जाबालिको कन्दरमालीकी कन्याका दान कर दें। आपका पुत्र विधिवत् दैत्यनन्दिनीका पाणिग्रहण कर ले। स्वरूपवान् शकुनि नन्दयन्तीसे विवाह करें ॥ १५५—१५९ ॥ | | ममेयं वेदवत्यस्तु त्वाष्ट्रेयी सुरथस्य च।<br>बाढमित्यब्रवीद्धृष्टो मुनिर्मनुसुतं नृपम् ॥ १६० | यह वेदवती मेरी (इन्द्रद्युम्नकी) और त्वष्टा (विश्वकर्मा)-की पुत्री (चित्राङ्गदा) सुरथकी पत्नी हो। मुनिने मनुपुत्र राजासे कहा—ठीक है। |

६८- भगवान् शंकरका अन्धकसे युद्धके लिये प्रस्थान, रुद्रगणोंका दानववर्गसे युद्ध और तुहुण्ड आदि दैत्योंका विनाश

अध्याय ६६ ]दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप और अन्धक-शिव-सन्दर्भ३१७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ततोऽनुचक्रुः संहृष्टा विवाहविधिमुत्तमम्।<br>ऋत्विजोऽभूद् गालवस्तु हुत्वा हव्यं विधानतः ॥ १६१<br>गायन्ते तत्र गन्धर्वा नृत्यन्तेऽप्सरसस्तथा।<br>आदौ जाबालिनः पाणिर्गृहीतो दैत्यकन्यया ॥ १६२<br>इन्द्रद्युम्नेन तदनु वेदवत्या विधानतः।<br>ततः शकुनिना पाणिर्गृहीतो यक्षकन्यया ॥ १६३<br>चित्राङ्गदायाः कल्याणि सुरथः पाणिमग्रहीत्।<br>एवं क्रमाद् विवाहस्तु निर्वृत्तस्तनुमध्यमे ॥ १६४उसके बाद उन लोगोंने प्रसन्नतापूर्वक भलीभाँति विवाहकी विधिको पूरा किया। विधिसे हव्यका हवन करनेवाले गालव ऋत्विक् बने। उस समय वहाँ गन्धर्वोंने गाना गाया और अप्सराओंने नृत्य किया। सबसे पहले दैत्य-कन्याने जाबालिका पाणिग्रहण किया। कल्याणि! उसके बाद विधिपूर्वक इन्द्रद्युम्नने वेदवतीका, शकुनिने यक्ष-कन्याका तथा सुरथने चित्राङ्गदाका पाणिग्रहण किया। (कृशोदरि!) इस प्रकार विवाहकार्य क्रमशः सम्पन्न हुआ॥ १६०-१६४॥
वृत्ते मुनिर्विवाहे तु शक्रादीन् प्राह दैवतान्।<br>अस्मिंस्तीर्थे भवद्भिस्तु सप्तगोदावरे सदा ॥ १६५<br>स्थेयं विशेषतो मासमिमं माधवमुत्तमम्।<br>बाढमुक्त्वा सुराः सर्वे जग्मुर्हृष्टा दिवं क्रमात् ॥ १६६<br>मुनयो मुनिमादाय सपुत्रं जग्मुरादरात्।<br>भार्याश्चादाय राजानः स्वं स्वं नगरमागताः ॥ १६७<br>प्रहृष्टाः सुखिनस्तस्थुः भुञ्जते विषयान् प्रियान्।<br>चित्राङ्गदायाः कल्याणि एवं वृत्तं पुरा किल।<br>तन्मां कमलपत्राक्षि भजस्व ललनोत्तमे ॥ १६८<br>इत्येवमुक्त्वा नरदेवसूनु-<br>स्तां भूमिदेवस्य सुतां वरोरुम्।<br>स्तुवन्मृगाक्षीं मृदुना क्रमेण<br>सा चापि वाक्यं नृपतिं बभाषे ॥ १६९विवाह-कार्य सम्पन्न हो जानेपर मुनि (ऋतध्वज)-ने इन्द्र आदि देवताओंसे कहा—इस सप्तगोदावर तीर्थमें आपलोग सदा निवास करें। विशेषरूपसे इस उत्तम वैशाखके महीनेमें आपलोग यहाँ अवश्य रहें। देवतालोग 'ऐसा ही हो'—(ऐसा) कहकर प्रसन्नतापूर्वक स्वर्ग चले गये। मुनिलोग पुत्रसहित मुनि (ऋतध्वज)-को सादर साथ लेकर चले गये। राजालोग भी अपनी-अपनी पत्नीके साथ अपने-अपने नगरमें आ गये। सभी लोग प्रिय विषयोंका उपभोग करते हुए आनन्दपूर्वक रहने लगे। कल्याणि! चित्राङ्गदाका पूर्व वृत्तान्त इस प्रकारका है। इसलिये सरोजनयने! ललनोत्तमे! तुम मुझे अङ्गीकार करो। ऐसा कहकर राजपुत्र (दण्ड) ब्राह्मणकी उस सुन्दरी मृगनयनी पुत्रीकी कोमल वाणीसे स्तुति करने लगे। उसने भी राजासे (आगेवाला वचन) कहा — ॥ १६५-१६९॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पैंसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ ६५ ॥


छाछठवाँ अध्याय

दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप, प्रह्लादका अन्धकको उपदेश और अन्धक-शिव-सन्दर्भ

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अरजा उवाच<br>नात्मानं तव दास्यामि बहुनोक्तेन किं तव।<br>रक्षन्ती भवतः शापादात्मानं च महीपते ॥ १अरजाने कहा— पृथिवीपते! आपके अधिक कहनेसे क्या लाभ? (थोड़ेमें समझ लीजिये कि पिताके) शापसे आपकी और अपनी रक्षा करती हुई (ही) मैं अपनेको आपके लिये समर्पित नहीं करूँगी ॥ १॥

| ३१८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६६ | | :--- | :--- |

प्रह्लाद उवाच
इत्थं विवदमानां तां भार्गवेन्द्रसुतां बलात्।<br>कामोपहतचित्तात्मा व्यध्वंसयत मन्दधीः॥ २<br>तां कृत्वा च्युतचारित्रां मदान्धः पृथिवीपतिः।<br>निष्क्रामाश्रमात् तस्माद् गतश्च नगरं निजम्॥ ३<br>साऽपि शुक्रसुता तन्वी अरजा रजसाप्लुता।<br>आश्रमादथ निर्गत्य बहिस्तस्थावधोमुखी॥ ४<br>चिन्तयन्ती स्वपितरं रुदती च मुहुर्मुहुः।<br>महाग्रहोपसृप्तेव रोहिणी शशिनः प्रिया॥ ५प्रह्लादने कहा—कामसे अंधे हुए उस मूर्खने इस प्रकार विवाद (निषेध) करती हुई श्रेष्ठ भार्गव कुलमें प्रसूत उस कन्याको हठात् अपावन (ध्वस्तशील) कर दिया। मदसे अंधा बना हुआ वह चरित्रसे च्युत हो करके उस आश्रमसे बाहर निकलकर अपने नगर चला गया। उसके बाद रजसे लपटायी वह कृशाङ्गी शुक्रपुत्री अरजा भी आश्रमसे बाहर निकलकर नीचे मुख लटकाये बैठ गयी। राहुसे पीड़ित चन्द्र-प्रिया रोहिणीके समान वह अपने पिताका चिन्तन करती हुई बारम्बार (बिलख-बिलखकर) रोने लगी॥ २—५॥
ततो बहुतिथे काले समाप्ते यज्ञकर्मणि।<br>पातालादागमच्छुक्रः स्वमाश्रमपदं मुनिः॥ ६<br>आश्रमान्ते च ददृशे सुतां दैत्य रजस्वलाम्।<br>मेघलेखामिवाकाशे संध्यारागेण रञ्जिताम्॥ ७<br>तां दृष्ट्वा परिपप्रच्छ पुत्रि केनासि धर्षिता।<br>कः क्रीडति सरोषेण सममाशीविषेण हि॥ ८<br>कोऽद्यैव याम्यां नगरीं गमिष्यति सुदुर्मतिः।<br>कस्त्वां शुद्धसमाचारां विध्वंसयति पापकृत्॥ ९<br>ततः स्वपितरं दृष्ट्वा कम्पमाना पुनः पुनः।<br>रुदन्ती व्रीडयोपेता मन्दं मन्दमुवाच ह॥ १०उसके बाद जब बहुत तिथियोंवाला समय बीत गया और यज्ञ समाप्त हो गया तब शुक्रममुनि पातालसे अपने आश्रममें आये। दैत्य! उन्होंने आश्रमसे बाहर आकाशमें सन्ध्याके समय लालिमासे रञ्जित मेघमालाकी तरह धूलसे लिपटी हुई अपनी पुत्रीको देखा। उसे देखकर उन्होंने पूछा—पुत्रि! किसने तुम्हारा धर्षण (अपमान) किया है? क्रोधभरे साँपसे कौन खेल कर रहा है? पवित्र आचरणवाली तुम्हें शीलसे च्युत कर कौन दुर्बुद्धि पापी आज ही यमपुरी जानेवाला है? उसके बाद अपने पिताको देखकर बारम्बार काँपती, रोती एवं लजाती हुई अरजाने धीरे-धीरे कहा—॥ ६—१०॥
तव शिष्येण दण्डेन वार्यमाणेन चासकृत्।<br>बलादनाथा रुदती नीताऽहं वचनीयताम्॥ ११<br>एतत् पुत्र्या वचः श्रुत्वा क्रोधसंरक्तलोचनः।<br>उपस्पृश्य शुचिर्भूत्वा इदं वचनमब्रवीत्॥ १२<br>यस्मात् तेनावनीतेन मत्तो ह्यभयमुत्तमम्।<br>गौरवं च तिरस्कृत्य च्युतधर्माऽरजा कृता॥ १३<br>तस्मात् सराष्ट्रः सबलः सभृत्यो वाहनैः सह।<br>सप्तरात्रान्तराद् भस्म ग्राववृष्ट्या भविष्यति॥ १४बार-बार बरजनेपर भी आपके शिष्य दण्डने रोती हुई मुझ अनाथाको बलपूर्वक निन्दनीया बना दिया है—हमारा शीलभ्रंश कर दिया है। कन्याकी इस बातको सुनकर शुक्राचार्यकी आँखें क्रोधसे अत्यन्त लाल हो गयीं। उन्होंने आचमन करके शुद्ध होकर यह (शाप) वचन कहा—यतः उस उद्दण्डने मुझसे प्राप्त उत्तम अभय एवं गौरवको तिरस्कृतकर अरजाको धर्मसे च्युत किया है, अतः वह सात रात्रियों (दिनों)-में उपलवृष्टिके कारण राष्ट्र, सेना, भृत्य एवं वाहनोंसहित विनष्ट हो जायगा—हो जाय॥ ११—१४॥
इत्येवमुक्त्वा मुनिपुङ्गवोऽसौ<br>शप्त्वा स दण्डं स्वसुतामुवाच।<br>त्वं पापमोक्षार्थमिहैव पुत्रि<br>तिष्ठस्व कल्याणि तपश्चरन्ती॥ १५उन मुनिश्रेष्ठने ऐसा कहकर दण्डको शाप देनेके बाद अपनी पुत्रीसे कहा—पुत्रि! कल्याणि! पापसे छुटकारा पानेके लिये तुम तपस्या करती हुई यहीं रहो।

अध्याय ६६ ] दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप और अन्धक-शिव-सन्दर्भ ३१९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शप्त्त्वेथं भगवाञ् छुक्रो दण्डमिक्ष्वाकुनन्दनम्।<br>जगाम शिष्यसहितः पातालं दानवालयम्॥ १६<br><br>दण्डोऽपि भस्मसाद् भूतः सराष्ट्रबलवाहनः।<br>महता ग्राववर्षेण सप्तरात्रान्तरे तदा॥ १७<br><br>एवं दण्डकारण्यं परित्यजन्ति देवताः।<br>आलयं राक्षसानां तु कृतं देवेन शम्भुना॥ १८भगवान् शुक्र इक्ष्वाकुनन्दन दण्डको इस प्रकार शाप देकर शिष्यके साथ दानवोंके निवास-स्थान पाताललोकमें चले गये। उसके बाद दण्ड भी बहुत बड़ी उपलवृष्टिके कारण सात रात्रियोंके भीतर ही अपने राष्ट्र, सेना और वाहनोंके साथ नष्ट हो गया। यही कारण है कि देवताओंने दण्डकारण्यको छोड़ दिया और शम्भुने उसे राक्षसोंका स्थान बना दिया॥ १५-१८॥
एवं परकलत्राणि नयन्ति सुकृतीनपि।<br>भस्मभूतान् प्राकृतांस्तु महान्तं च पराभवम्॥ १९<br><br>तस्मादन्धक दुर्बुद्धिर्न कार्या भवता त्वियम्।<br>प्राकृताऽपि दहेन्नारी किमुताहोद्रिनन्दिनी॥ २०<br><br>शङ्करोऽपि न दैत्येश शक्यो जेतुं सुरासुरैः।<br>द्रष्टुमप्यमितौजस्कः किमु योधयितुं रणे॥ २१इस प्रकार (जैसा कि ऊपर वर्णित है) परनारियाँ (अपनेको अपवित्र करनेवाले) पुण्यात्माओंको भी जलाकर राख (नष्ट) कर देती हैं, फिर साधारण मनुष्य तो बहुत बड़ा तिरस्कार प्राप्त करते हैं। अतः अन्धक! आपको ऐसी दुर्बुद्धि नहीं करनी चाहिये। साधारण स्त्री भी जला सकती है तो पार्वतीका क्या कहना। दैत्येश! सुर या असुर कोई भी महादेवको नहीं जीत सकता। जब रणमें अत्यधिक ओजसे सम्पन्न शंकरको देखा भी नहीं जा सकता तब उनसे युद्ध करना कैसे सम्भव है॥ १९-२१॥
पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ते वचने क्रुद्धस्ताम्रेक्षणः श्वसन्।<br>वाक्यमाह महातेजाः प्रह्लादं चान्धकासुरः॥ २२<br><br>किं ममासौ रणे योद्धुं शक्तस्त्रिणयनोऽसुर।<br>एकाकी धर्मरहितो भस्मारुणितविग्रहः॥ २३<br><br>नान्धको बिभियादिन्द्रान्नामरेभ्यः कथंचन।<br>स कथं वृषपत्राक्षाद् बिभेति स्त्रीमुखेक्षकात्॥ २४<br><br>तच्छ्रुत्वाऽस्य वचो घोरं प्रह्लादः प्राह नारद।<br>न सम्यगुक्तं भवता विरुद्धं धर्मतोऽर्थतः॥ २५पुलस्त्यजी बोले— ऐसा वचन कहनेपर क्रुद्ध एवं लाल-लाल आँखें किये हुए महातेजस्वी अन्धकासुरने लंबी साँस लेते हुए प्रह्लादसे कहा—असुर! क्या शरीरपर राख लपेटे, (किंतु, लोक) धर्मसे रहित अकेला वह त्रिनयन लड़ाईके मैदानमें मुझसे युद्ध कर सकता है? जो अन्धक इन्द्र या (अन्य) देवताओंसे कभी नहीं डरता वह बैलकी सवारी करनेवाले तथा स्त्रीका मुख निहारनेवाले त्रिनेत्र (शंकर)-से कैसे डर सकता है? नारद! उसके उस कठोर वचनको सुनकर प्रह्लादने कहा—आप यह उचित नहीं कह रहे हैं। आपका कहना धर्म एवं अर्थके विपरीत है॥ २२-२५॥
हुताशनपतङ्गाभ्यां सिंहक्रोष्टुकयोरिव।<br>गजेन्द्रमशकाभ्यां च रुक्मपाषाणयोरिव॥ २६<br><br>एतेषाभिरुदितं यावदन्तरमन्धक।<br>तावदेवान्तरं चास्ति भवतो वा हरस्य च॥ २७<br><br>वारितोऽसि मया वीर भूयो भूयश्च वार्यसे।<br>शृणुष्व वाक्यं देवर्षेरसितस्य महात्मनः॥ २८अन्धक! अग्नि और जुगनू, सिंह और सियार, गजेन्द्र और मशक तथा सोने और पत्थरमें जितना अन्तर कहा जाता है, उतना ही अन्तर आप और शङ्करकी तुलनामें है। वीर! आपको मैंने रोका है और (अब भी) बार-बार रोक रहा हूँ। आप देवर्षि असितका वचन सुनें—
३२०श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६६

| यो धर्मशीलो जितमानरोषो<br>विद्याविनीतो न परोपतापी।<br>स्वदारतुष्टः परदारवर्जी<br>न तस्य लोके भयमस्ति किंचित्॥ २९ | जो व्यक्ति धर्मनिष्ठ, अभिमान और क्रोधको जीतनेवाला, विद्यासे विनम्र, किसीको दुःख न देनेवाला, अपनी पत्नीमें सन्तुष्ट तथा परस्त्रीका त्याग करनेवाला होता है, उसे संसारमें कोई भय नहीं होता॥ २६-२९॥ | | यो धर्महीनः कलहप्रियः सदा<br>परोपतापी श्रुतिशास्त्रवर्जितः।<br>परार्थदारेप्सुरवर्णसंगमी<br>सुखं न विन्देत परत्र चेह॥ ३०<br><br>धर्मान्वितोऽभूद् भगवान् प्रभाकरः<br>संत्यक्तरोषश्च मुनिः स वारुणिः।<br>विद्यान्वितोऽभून्मनुरर्कपुत्रः<br>स्वदारसंतुष्टमनास्त्वगस्त्यः ॥ ३१<br><br>एतानि पुण्यानि कृतान्यमीभि-<br>र्मया निबद्धानि कुलक्रमोक्त्या।<br>तेजोऽन्विताः शापवरक्षमाश्च<br>जाताश्च सर्वे सुरसिद्धपूज्याः॥ ३२<br><br>अधर्मयुक्तोऽङ्गसुतो बभूव<br>विभुश्च नित्यं कलहप्रियोऽभूत्।<br>परोपतापी नमुचिर्दुरात्मा<br>पराबलेप्सुर्नहुषश्च राजा॥ ३३ | जो व्यक्ति धर्मसे हीन, कलहसे प्रेम रखनेवाला, सदा दूसरोंको दुःख देनेवाला, वेद-शास्त्र (-के अध्ययन)-से रहित, दूसरेके धन और दूसरेकी स्त्रीकी इच्छा रखनेवाला तथा भिन्न वर्णके साथ सम्बन्ध करनेवाला होता है, वह इस लोक और परलोकमें सुख नहीं पा सकता। भगवान् सूर्य धर्मसे युक्त थे, महर्षि वारुणि (वसिष्ठ)-ने क्रोध छोड़ दिया था, सूर्यपुत्र मनु विद्यावान् थे और अगस्त्य ऋषि अपनी पत्नीमें सन्तुष्ट थे। मैंने कुलके क्रमानुसार इन पुण्य करनेवालोंका उल्लेख किया है। शाप और वर देनेमें समर्थ ये सभी तेजस्वीलोग देवताओं और सिद्धोंके पूज्य हुए। अङ्गपुत्र (वेन) अधार्मिक और शक्तिशाली तथा नित्य कलहप्रिय था। दुरात्मा नमुचि परसंतापी एवं राजा नहुष परस्त्रीपर अधिकार प्राप्त करना चाहता था॥ ३०-३३॥ | | परार्थलिप्सुर्दितिजो हिरण्यदृक्<br>मूर्खस्तु तस्याप्यनुजः सुदुर्मतिः।<br>अवर्णसंगी यदुरुत्तमौजा<br>एते विनष्टास्त्वनयात् पुरा हि॥ ३४<br><br>तस्माद् धर्मो न संत्याज्यो धर्मो हि परमा गतिः।<br>धर्महीना नरा यान्ति रौरवं नरकं महत्॥ ३५<br><br>धर्मस्तु गदितः पुम्भिस्तारणे दिवि चेह च।<br>पतनाय तथाऽधर्म इह लोके परत्र च॥ ३६<br><br>त्याज्यं धर्मान्वितैर्नित्यं परदारोपसेवनम्।<br>नयन्ति परदारा हि नरकानेकविंशतिम्।<br>सर्वेषामपि वर्णानामेष धर्मो ध्रुवोऽन्धक॥ ३७ | दितिका पुत्र हिरण्याक्ष परधनका लालची था। उसका छोटा भाई दुर्बुद्धि एवं मूर्ख था तथा पराक्रमी यदु भिन्न जातिके साथ सम्बन्ध करनेवाला था। ये सभी पूर्वकालमें दुर्नीतिके कारण नष्ट हो गये। इसलिये धर्मको नहीं छोड़ना चाहिये; क्योंकि धर्म ही उत्तम गति है। धर्मसे हीन मनुष्य महान् रौरव नरकमें जाते हैं। पूर्वजोंने धर्मको ही परलोकको पार करनेवाला बताया है तथा अधर्मको इस लोक और परलोकमें पतनका हेतु बताया है। धर्मनिष्ठ व्यक्तियोंको परस्त्रीका सेवन करना सदैव वर्जनीय बताया है यतः परस्त्रियाँ इक्कीस नरकोंमें ले जाती हैं। अन्धक! सभी वर्णोंके लिये यह निश्चित धर्म है॥ ३४-३७॥ | | परार्थपरदारेषु यदा वाञ्छां करिष्यति।<br>स याति नरकं घोरं रौरवं बहुलाः समाः॥ ३८ | जो मनुष्य दूसरेके धन और दूसरेकी स्त्रीमें कामना करता है, वह बहुत वर्षोंके लिये भयंकर रौरव नरकमें |

अध्याय ६६ ] दण्डक-अरजाके प्रसङ्गमें शुक्रद्वारा दण्डकको शाप और अन्धक-शिव-सन्दर्भ [ ३२१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एवं पुराऽसुरपते देवर्षिरसितोऽव्ययः।<br>प्राह धर्मव्यवस्थां खगेन्द्रायारुणाय हि॥ ३९<br><br>तस्मात् सुदूरतो वर्जेत् परदारान् विचक्षणः।<br>नयन्ति निकृतिप्रज्ञं परदाराः पराभवम्॥ ४०चला जाता है। राक्षसराज! प्राचीन समयमें महात्मा देवर्षि असितने गरुड़ तथा अरुणसे धर्मकी यह व्यवस्था कही थी। इसलिये विद्वान् व्यक्ति दूसरी स्त्रियोंको दूरसे ही परित्याग कर दे; क्योंकि परस्त्रियाँ नीच बुद्धिवाले मनुष्योंको तिरस्कृत करा देती हैं॥ ३८–४०॥
पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ते वचने प्रह्लादं प्राह चान्धकः।<br>भवान् धर्मपरस्त्वेको नाहं धर्मं समाचरे॥ ४१<br><br>इत्येवमुक्त्वा प्रह्लादमन्धकः प्राह शम्बरम्।<br>गच्छ शम्बर शैलेन्द्रं मन्दरं वद शङ्करम्॥ ४२<br><br>भिक्षो किमर्थं शैलेन्द्रं स्वर्गंतुल्यं सकन्दरम्।<br>परिभुङ्क्षसि केनाद्य तव दत्तो वदस्व माम्॥ ४३<br><br>तिष्ठन्ति शासने मह्यं देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>तत् किमर्थं निवमसे मामनादृत्य मन्दरे॥ ४४पुलस्त्यजी बोले— इस प्रकारका वचन कहनेपर अन्धकने प्रह्लादसे कहा कि आप अकेले धर्मनिष्ठ हैं। मैं धर्मका व्यवहार नहीं करता। प्रह्लादसे इस प्रकार कहकर अन्धकने शम्बरसे कहा—शम्बर! तुम मन्दर-पर्वतपर जाओ और शंकरसे कहो—भिक्षुक! तुम गुफामें रहनेवाले होकर और सबके समान मन्दर-पर्वतका उपभोग क्यों कर रहे हो? मुझे बतलाओ कि तुमको इसे किसने दे दिया है? इन्द्र आदि देवता मेरा शासन मानते हैं। तुम मेरा अपमान करके इस मन्दर-पर्वतपर कैसे रह रहे हो?॥ ४१–४४॥
यदीष्टस्तव शैलेन्द्रः क्रियतां वचनं मम।<br>येयं हि भवतः पत्नी सा मे शीघ्रं प्रदीयताम्॥ ४५<br><br>इत्युक्तः स तदा तेन शम्बरो मन्दरं द्रुतम्।<br>जगाम तत्र यत्रास्ते सह देव्या पिनाकधृक्॥ ४६<br><br>गत्वावाचान्धकवचो याथातथ्यं दनोः सुतः।<br>तमुत्तरं हरः प्राह शृण्वत्या गिरिकन्यया॥ ४७<br><br>ममायं मन्दरो दत्तः सहस्राक्षेण धीमता।<br>तन्न शक्नोम्यहं त्यक्तुं विनाज्ञां वृत्रवैरिणः॥ ४८यदि यह पर्वतराज तुम्हें अभीष्ट है तो मेरे कहनेके अनुसार कार्य करो। तुम्हारी जो यह स्त्री है, उसे मुझे शीघ्र दे दो। उसके ऐसा कहनेपर शम्बर शीघ्रतासे उस मन्दरपर्वतपर गया, जहाँ पिनाक-पाणि शंकर देवीके साथ निवास कर रहे थे। दनु-पुत्रने वहाँ जाकर अन्धकके वचनको ज्यों-का-त्यों कहा। शङ्करने पर्वतनन्दिनीके सुनते हुए उसे उत्तर दिया। बुद्धिमान् इन्द्रने मुझे यह मन्दरपर्वत दिया है। इसलिये वृत्रासुरके वैरी इन्द्रकी आज्ञाके बिना मैं इसे नहीं छोड़ सकता॥ ४५–४८॥
यच्चाब्रवीद् दीयतां मे गिरिपुत्रीति दानवः।<br>तदेषा यातु स्वं कामं नाहं वारयितुं क्षमः॥ ४९<br><br>ततोऽब्रवीद् गिरिसुता शम्बरं मुनिसत्तम।<br>ब्रूहि गत्वान्धकं वीर मम वाक्यं विपश्चितम्॥ ५०<br><br>अहं पताका संग्रामे भवानीशश्च देविनौ।<br>प्राणद्यूतं परिस्तीर्य यो जेष्यति स लप्स्यते॥ ५१<br><br>इत्येवमुक्तो मतिमान् शम्बरोऽन्धकमागमत्।<br>समागम्याब्रवीद् वाक्यं शर्वगौर्योश्च भाषितम्॥ ५२दानवने जो यह कहा कि गिरिनन्दिनीको मुझे दे दो, तो ये अपनी इच्छासे जा सकती हैं। मैं इन्हें नहीं रोक सकता। मुनिसत्तम! उसके बाद गिरिपुत्री पार्वतींने शम्बरसे कहा—वीर! तुम जाकर विद्वान् अन्धकसे मेरी बात कहो—संग्राममें मैं तो पताका हूँ। आप और शंकर खेलनेवाले हैं। प्राणोंका द्यूत फैलाकर (हार-जीतका दाँव लगाकर) जो जीतेगा वह मुझे प्राप्त करेगा! ऐसा कहनेपर बुद्धिमान् शम्बर अन्धकके पास गया एवं उसने शंकर तथा गौरीकी कही हुई बातें (ज्यों-की-त्यों) उससे कह दीं॥ ४९–५२॥
३२२श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६६

| तच्छ्रुत्वा दानवपतिः क्रोधदीप्तेक्षणः श्वसन।<br>समाहूयाब्रवीद् वाक्यं दुर्योधनमिदं वचः॥ ५३<br>गच्छ शीघ्रं महाबाहो भेरीं सान्नाहिकीं दृढाम्।<br>ताडयस्व सुविश्रब्धं दुःशीलामिव योषितम्॥ ५४<br>समादिष्टोऽन्धकेनाथ भेरीं दुर्योधनो बलात्।<br>ताडयामास वेगेन यथा प्राणेन भूयसा॥ ५५<br>सा ताडिता बलवता भेरी दुर्योधनेन हि।<br>सत्वरं भैरवं रावं रुराव सुरभी यथा॥ ५६ | उसे सुनकर दानवपतिकी आँखें क्रोधसे जलने लगीं। लंबी साँस लेते हुए दुर्योधनको बुलाकर उसने कहा—महाबाहो! शीघ्र जाओ एवं मारू या संग्रामके समयमें बजनेवाले जुझाऊ नगाड़ेको (मस्तीसे) जोर-जोरसे ऐसे पीटो जैसे दुराचारिणीको कोई (उसके अपराधके कारण उसका अभिभावक आदि निर्भयतासे) ताड़ित करता है। उसके बाद अन्धकसे आदेश प्राप्त कर दुर्योधन अत्यन्त बलपूर्वक जी-जानसे वेगपूर्वक भेरीको बजाने लगा। बलवान् दुर्योधनद्वारा बलपूर्वक बजायी जाती हुई वह भेरी सहसा भयंकर ध्वनिमें घरघराने लगी, जिस प्रकार सुरभी घरघराती है॥ ५३–५६॥ | | याथातथ्यं च तान् सर्वान्हा सेनापतिर्बली।<br>ते चापि बलिनां श्रेष्ठाः संनद्धा युद्धकाङ्क्षिणः॥ ५८<br>सहान्धका निर्ययुस्ते गजैरुष्ट्रैर्हयै रथैः।<br>अन्धको रथमास्थाय पञ्चनल्वप्रमाणतः॥ ५९<br>त्र्यम्बकं स पराजेतुं कृतबुद्धिर्विनिर्ययौ।<br>जम्भः कुजम्भो हुण्डश्च तुहुण्डः शम्बरो बलिः॥ ६०<br>बाणः कार्तस्वरो हस्ती सूर्यशत्रुर्महोदरः।<br>अयःशंकुः शिबिः शाल्वो वृषपर्वा विरोचनः॥ ६१<br>हयग्रीवः कालनेमिः संह्लादः कालनाशनः।<br>शरभः शलभश्चैव विप्रचित्तिश्च वीर्यवान्॥ ६२<br>दुर्योधनश्च पाकश्च विपाकः कालशम्बरौ।<br>एते चान्ये च बहवो महावीर्या महाबलाः।<br>प्रजग्मुरुत्सुका योद्धुं नानायुधधरा रणे॥ ६३<br>इत्थं दुरात्मा दनुसैन्यपाल-<br>स्तदान्धको योद्धुमना हरेण।<br>महाचलं मन्दरमभ्युपेयिवान्<br>स कालपाशावसितो हि मन्दधीः॥ ६४ | उसकी उस ध्वनिको सुनकर सभी बड़े असुर ‘यह क्या है?’—ऐसा कहते हुए शीघ्रतासे सभामें आ गये। पराक्रमी सेनापतिने उन सभीसे उचित और सत्य वचन कहा। युद्धकी इच्छा करनेवाले बलवानोंमें श्रेष्ठ वे सभी वीर तैयार हो गये। हाथी, ऊँट, घोड़ों और रथोंसहित वे सभी अन्धकके साथ बाहर निकले। पाँच नल्व—अर्थात् दो हजार हाथके प्रमाणवाले रथपर चढ़कर अन्धक त्रिलोचन शंकरको जीतनेका निश्चय कर बाहर निकला। जम्भ, कुजम्भ, हुण्ड, तुहुण्ड, शम्बर, बलि, बाण, कार्तस्वर, हस्ती, सूर्यशत्रु, महोदर, अयःशंकु, शिबि, शाल्व, वृषपर्वा, विरोचन, हयग्रीव, कालनेमि, संह्लाद, कालनाशन, शरभ, शलभ, पराक्रमी विप्रचित्ति, दुर्योधन, पाक, विपाक, काल एवं शम्बर—ये सभी तथा अन्य अनेक महापराक्रमशाली एवं महाबलवान् राक्षस भाँति-भाँतिके आयुधोंको लेकर प्रबल इच्छासे संग्राममें लड़नेके लिये चल पड़े। इस प्रकार काल-पाशसे बँधा हुआ वह अल्पमति दनुसैन्यपति दुष्टात्मा अन्धक शंकरसे युद्ध करनेके विचारसे महान् पर्वत मन्दरपर गया॥ ५७–६४॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छाछठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६६॥

६९- शुक्रद्वारा संजीवनीका प्रयोग, नन्दि-दानव-युद्ध, शिवका शुक्रको उदरस्थ रखना, शुक्रकृत शिवस्तुति और विश्वदर्शन, प्रमथ-देवोंसे युद्धमें दैत्योंकी हार, शिव-वेशमें अन्धकका पार्वतीहेतु विफलप्रयास, पुनः दैत्य-देव और इन्द्र-जम्भ-युद्ध, मातलिकका जन्म और सारथ्य, दैत्योंका नाश, जम्भ-कुजम्भ-वध

अध्याय ६७ ] नन्दिद्वारा आहूत गणोंका वर्णन, गणोंको सदाशिवका दर्शन और गणोंद्वारा मन्दरका भर जाना ३२३


सड़सठवाँ अध्याय

नन्दिद्वारा आहूत गणोंका वर्णन, उनसे हरि और हरका एकत्व प्रतिपादन, गणोंको सदाशिवका दर्शन और गणोंद्वारा मन्दरका भर जाना

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुलस्त्य उवाच<br>हरोऽपि शम्बरे याते समाहूयाथ नन्दिनम्।<br>प्राहामन्त्रय शैलादीन् ये स्थितास्तव शासने॥ १<br>ततो महेशवचनान्नन्दी तूर्णतरं गतः।<br>उपस्पृश्य जलं श्रीमान् सस्मार गणनायकान्॥ २<br>नन्दिना संस्मृताः सर्वे गणनाथाः सहस्रशः।<br>समुत्पत्य त्वरायुक्ताः प्रणतास्त्रिदशेश्वरम्॥ ३<br>आगतांश्च गणान्नन्दी कृताञ्जलिपुटोऽव्ययः।<br>सर्वान् निवेदयामास शङ्कराय महात्मने॥ ४पुलस्त्यजी बोले— शम्बरके चले जानेपर शंकरने भी नन्दीको बुलाकर कहा—नन्दिन्! तुम्हारे शासनमें जो पर्वत आदि रहते हैं, उन्हें इस (माङ्गलिक) कार्यमें आनेके लिये आमन्त्रित करो। उसके बाद महेशके कहनेसे नन्दी शीघ्रातिशीघ्र गये और उन्होंने जलका आचमन कर गणनायकोंका स्मरण किया। नन्दीसे स्मरण किये गये सभी गणनाथोंने हजारोंकी संख्यामें शीघ्रतासे आकर त्रिदशेश्वर शंकरको प्रणाम किया। अविनाशी नन्दीने महात्मा शंकरसे हाथ जोड़कर सभी आये हुए गणोंको निवेदित किया॥ १–४॥
नन्द्युवाच<br>यानेतान् पश्यसे शम्भो त्रिनेत्राञ्जटिलाञ्शुचीन्।<br>एते रुद्रा इति ख्याताः कोट्य एकादशैव तु॥ ५<br>वानरास्यान् पश्यसे यान् शार्दूलसमविक्रमान्।<br>एतेषां द्वारपालास्ते मन्नामानो यशोधनाः॥ ६<br>षण्मुखान् पश्यसे यांश्च शक्तिपाणीञ्शिखिध्वजान्।<br>षट् च षष्टिश्चता कोट्यः स्कन्दनाम्नः कुमारकान्॥ ७<br>एतावत्यस्तथा कोट्यः शाखा नाम षडाननाः।<br>विशाखास्तावदेवोक्ता नैगमेयाश्च शङ्कर॥ ८नन्दीने कहा— शम्भो! तीन नेत्रोंवाले और जटा धारण करनेवाले तथा पवित्र जिन गणोंको आप देख रहे हैं, उन्हें रुद्र कहते हैं। इनकी संख्या ग्यारह कोटि है। बन्दरके समान मुँह और सिंहके समान पराक्रमवाले जिन्हें आप देख रहे हैं, वे मेरे नामको धारण करनेवाले यशस्वी इनके द्वारपाल हैं। हाथमें शक्ति लिये तथा मयूरध्वजी जिन छः मुखवालोंको आप देख रहे हैं, वे स्कन्द नामके कुमार हैं। इनकी संख्या छाछठ करोड़ है। शंकर! इतने ही छः मुख धारण करनेवाले शाखा नामके गण हैं और इतने ही विशाख और नैगमेय नामके गण हैं॥ ५–८॥
सप्तकोटिशतं शम्भो अमी वै प्रमथोत्तमाः।<br>एकैकं प्रति देवेश तावत्यो ह्यपि मातरः॥ ९<br>भस्मारुणितदेहाश्च त्रिनेत्राः शूलपाणयः।<br>एते शैवा इति प्रोक्तास्तव भक्ता गणेश्वराः॥ १०<br>तथा पाशुपताश्चान्ये भस्मप्रहरणा विभो।<br>एते गणास्त्वसंख्याताः सहायर्थं समागताः॥ ११<br>पिनाकधारिणो रौद्रा गणाः कालमुखापरे।<br>तव भक्ताः समायाता जटामण्डलिनोऽद्भुताः॥ १२शम्भो! इन उत्तम प्रमथोंकी संख्या सात सौ करोड़ है। देवेश! प्रत्येकके साथ उतनी ही मातृकाएँ भी हैं। इन भस्मविभूषित शरीरवाले शूलपाणि त्रिनेत्रधारियोंको शैव कहा जाता है। ये सभी गणेश्वर आपके भक्त हैं। विभो! भस्मरूपी अस्त्र धारण करनेवाले अन्य अनगिनत पाशुपत गण सहायताके लिये आये हैं। पिनाक धारण करनेवाले जटामण्डलसे युक्त, अद्भुत भयङ्कर कालमुख नामक आपके अन्य गण (भी) आये हैं॥ ९–१२॥
श्रीवामनपुराण[ अध्याय ६७ ]
३२४
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
खट्वाङ्गयोधिनो वीरा रक्तचर्मसमावृताः ।<br>इमे प्राप्ता गणा योद्धुं महाव्रतिन उत्तमाः ॥ १३<br><br>दिग्वाससो मौनिनश्च घण्टाप्रहरणास्तथा ।<br>निराश्रया नाम गणाः समायाता जगद्गुरो ॥ १४<br><br>सार्धद्विनेत्राः पद्माक्षाः श्रीवत्साङ्कितवक्षसः ।<br>समायाताः खरारूढा वृषभध्वजिनोऽव्ययाः ॥ १५<br><br>महापाशुपता नाम चक्रशूलधरास्तथा ।<br>भैरवो विष्णुना सार्द्धमभेदेनार्चितो हि यैः ॥ १६खट्वाङ्गसे संग्राम करनेवाले, लाल ढालसे युक्त महाव्रती नामके ये उत्तम युद्धके लिये आये हैं। जगद्गुरो! घण्टा नामके आयुधको धारण करनेवाले दिगम्बर और मौनी तथा निराश्रय नामक गण उपस्थित हुए हैं। तीन नेत्रोंवाले, पद्माक्ष एवं श्रीवत्ससे चिह्नित वक्षःस्थलवाले गरुड़ पक्षीपर चढ़े हुए तथा अविनाशी वृषभध्वजी गण यहाँ आ गये हैं। चक्र तथा शूल धारण करनेवाले महापाशुपत नामके गण आ गये हैं, जिन्होंने अभिन्नभावसे विष्णुके साथ भैरवकी पूजा (यहाँ) की है॥ १३-१६॥
इमे मृगेन्द्रवदनाः शूलबाणधनुर्धराः ।<br>गणास्त्वद्रोमसम्भूता वीरभद्रपुरोगमाः ॥ १७<br><br>एते चान्ये च बहवः शतशोऽथ सहस्रशः ।<br>सहायार्थं तवायाता यथा प्रीत्यादिशस्व तान् ॥ १८<br><br>ततोऽभ्येत्य गणाः सर्वे प्रणेमुर्वृषभध्वजम् ।<br>तान् करेणैव भगवान् समाश्वास्योपवेशयत् ॥ १९<br><br>महापाशुपतान् दृष्ट्वा समुत्थाय महेश्वरः ।<br>सम्परिष्वजताध्यक्षांस्ते प्रणेमुर्महेश्वरम् ॥ २०आपके रोमोंसे उत्पन्न ये सभी सिंहके समान मुखवाले शूल, बाण और धनुष धारण करनेवाले वीरभद्र आदि गण तथा दूसरे भी सैकड़ों एवं हजारों गण आपकी सहायताके लिये आ गये हैं। अपनी इच्छाके अनुसार आप इन्हें आदेश दें। उसके बाद सभी गणोंने पास जाकर वृषभध्वजको प्रणाम किया। भगवान्ने हाथसे उन्हें विश्वस्तकर बैठाया। महापाशुपत नामके अपने अध्यक्षोंको देखनेके बाद महेश्वरने उठकर उनको गले लगाया। उन लोगोंने महेश्वरको अभिवन्दित किया॥ १७-२०॥
ततस्तदद्भुततमं दृष्ट्वा सर्वे गणेश्वराः ।<br>सुचिरं विस्मिताक्षाश्च वैलक्ष्यमगमत् परम् ॥ २१<br><br>विस्मिताक्षान् गणान् दृष्ट्वा शैलादिर्योगिनां वरः ।<br>प्राह प्रहस्य देवेशं शूलपाणिं गणाधिपम् ॥ २२<br><br>विस्मितामी गणा देव सर्व एव महेश्वर ।<br>महापाशुपतानां हि यत् त्वयालिङ्गनं कृतम् ॥ २३<br><br>तदेतेषां महादेव स्फुटं त्रैलोक्यविन्दकम् ।<br>रूपं ज्ञानं विवेकं च वदस्व स्वेच्छया विभो ॥ २४<br><br>प्रमथाधिपतेर्वाक्यं विदित्वा भूतभावनः ।<br>बभाषे तान् गणान् सर्वान् भावाभावविचारिणः ॥ २५उसके बाद उस अत्यन्त विचित्र दृश्यको देखकर सभी गणेश्वरोंकी आँखें आश्चर्यसे भर गयीं। उसके बाद वे सभी बहुत ही लज्जित हो गये। गणोंको अचरजभरे नेत्रोंवाला देखकर योगिश्रेष्ठ शैलादि नन्दीने हँसकर गणाधिप देवेश शूलपाणिसे कहा—देव! महेश्वर! महापाशुपतोंको आपने जो गले लगाया है, उससे ये सभी गण आश्चर्यमें पड़ गये हैं। अतः महादेव! विभो! इनके तीनों लोकोंमें विख्यात रूप, ज्ञान एवं विवेकका अपने इच्छानुसार वर्णन करें। प्रमथोंके अधिपति नन्दीकी बात सुनकर भूतभावन महादेव भाव और अभावका विचार करनेवाले उन गणोंसे कहने लगे—॥ २१-२५॥
रुद्र उवाच<br>भवद्भिर्भक्तिसंयुक्तैर्हरो भावेन पूजितः ।<br>अहंकारविमूढैश्च निन्दद्भिर्वैष्णवं पदम् ॥ २६रुद्रने कहा— अहंकारसे विमूढ किंतु मेरी भक्तिसे युक्त आपलोगोंने वैष्णवपदकी निन्दा करते हुए

अध्याय ६७ ] नन्दिद्वारा आहूत गणोंका वर्णन, गणोंको सदाशिवका दर्शन और गणोंद्वारा मन्दरका भर जाना ३२५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तेनाज्ञानेन भवतोनादृत्यानुविरोधिताः।<br>योऽहं स भगवान् विष्णुर्विष्णुर्यः सोऽहमव्ययः॥ २७<br><br>नावयोर्वै विशेषोऽस्ति एका मूर्तिर्द्विधा स्थिता।<br>तदमीभिर्नरव्याघ्रैर्भक्तिभावयुतैर्गणैः॥ २८<br><br>यथाहं वै परिज्ञातो न भवद्भिस्तथा ध्रुवम्।<br>येनाहं निन्दितो नित्यं भवद्भिर्मूढबुद्धिभिः॥ २९<br><br>तेन ज्ञानं हि वै नष्टं नातस्त्वालिङ्गिता मया।<br>इत्येवमुक्ते वचने गणाः प्रोचुर्महेश्वरम्॥ ३०भावपूर्वक शंकरकी पूजा की है। इसी अज्ञानके हेतु आप सभीका अनादर कर उनका विशेष आग्रह किया गया। जो मैं हूँ वही भगवान् विष्णु हैं एवं जो विष्णु हैं वही अविनाशी मैं हूँ। हम दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है। एक ही मूर्ति दो रूपोंमें अवस्थित है। अतः भक्तिभावसे युक्त इन पुरुषश्रेष्ठ गणोंने जैसा मुझे जाना है, निश्चय ही उस प्रकार आपलोग मुझे नहीं जानते। जड-बुद्धिवाले आपलोगोंने यतः नित्य मेरी निन्दा की है, अतः आपलोगोंका ज्ञान नष्ट हो गया। इसीलिये मैंने आपलोगोंको गले नहीं लगाया है। इस प्रकार कहनेपर गणोंने महेश्वरसे कहा —॥ २६–३०॥
कथं भवान् यथैक्येन संस्थितोऽस्ति जनार्दनः।<br>भवान् हि निर्मलः शुद्धः शान्तः शुक्लो निरञ्जनः॥ ३१<br><br>स चाप्यञ्जनसंकाशः कथं तेनेह युज्यते।<br>तेषां वचनमर्थाढ्यं श्रुत्वा जीमूतवाहनः॥ ३२<br><br>विहस्य मेघगम्भीरं गणानिदमुवाच ह।<br>श्रूयतां सर्वमाख्यास्ये स्वयशोवर्द्धनं वचः॥ ३३<br><br>न त्वेव योग्या यूयं हि महाज्ञानस्य कर्हिचित्।<br>अपवादभयाद् गुह्यं भवतां हि प्रकाशये॥ ३४आप एवं जनार्दन ऐक्यरूपसे कैसे रहते हैं? आप निर्मल, शुद्ध, शान्त, शुक्ल और निर्दोष एवं अज्ञानसे रहित हैं। किंतु वे अञ्जनके तुल्य हैं; अतः उनसे आपका मेल कैसे होता है? उनके अभिप्राययुक्त वचनको सुननेके बाद जीमूतवाहन शंकरने मेघके समान गम्भीर वाणीमें हँसकर कहा—अपनी कीर्ति बढ़ानेवाली सम्पूर्ण बात मैं बतलाता हूँ; उसे सुनो—तुमलोग कभी भी महाज्ञानके योग्य नहीं हो। परंतु अपकीर्तिके डरसे मैं आप सभीके सामने गोपनीय वस्तु-स्थितिको प्रकाशित करता हूँ॥ ३१–३४॥
प्रियत्वं मयि चैतेन यन्मच्चित्तास्तु नित्यशः।<br>एकरूपात्मकं देहं कुरुध्वं यत्नमास्थिताः॥ ३५<br><br>पयसां हविषाद्यैश्च स्नपनेन प्रयत्नतः।<br>चन्दनादिभिरेकाग्रैर्न मे प्रीतिः प्रजायते॥ ३६<br><br>यत्नात् क्रकचमादाय छिन्धध्वं मम विग्रहम्।<br>नरकार्हा भवद्भक्ता रक्षामि स्वयशोऽर्थतः॥ ३७<br><br>माऽयं वदिष्यते लोको महान्तमपवादिनम्।<br>यथा पतन्ति नरके हरभक्तास्तपस्विनः॥ ३८मुझमें निरन्तर चित्त लगाये रहनेसे भी अन्य लोग प्रिय हैं। तुमलोग यत्नपूर्वक एक देहात्मक रूपको समझो। प्रयत्नपूर्वक दूध या घीसे स्नान कराने तथा स्थिरचित्ततापूर्वक चन्दन आदिद्वारा लेप करनेसे मुझे प्रसन्नता नहीं उत्पन्न होती। आरा लेकर मेरी देहको भले ही चीर डालो, परंतु अपनी कीर्तिके लिये नरकके योग्य आप भक्तोंकी मैं (उससे) रक्षा करता ही हूँ। (क्योंकि) यह संसार मुझे इस प्रकारका महान् कलङ्क न लगाये कि शंकरके तपस्वी भक्त नरकमें जाते हैं॥ ३५–३८॥
व्रजन्ति नरकं घोरमित्येवं परिवादिनः।<br>अतोऽर्थं न क्षिपाम्यद्य भवतो नरकेऽद्भुते॥ ३९<br><br>यन्निन्दध्वं जगन्नाथं पुष्कराक्षं च मन्मयम्।<br>स चैव भगवान् शर्वः सर्वव्यापी गणेश्वरः॥ ४०<br><br>न तस्य सदृशो लोके विद्यते सचराचरे।<br>श्वेतमूर्तिः स भगवान् पीतो रक्तोऽञ्जनप्रभः॥ ४१इस प्रकारकी निन्दा करनेवाले लोग भयंकर नरकमें जाते हैं। इसलिये मैं आपलोगोंको अद्भुत नरकमें नहीं डालता। आपलोग मेरे स्वरूप जिन कमलनयन जगन्नाथकी निन्दा करते हैं, वे ही सर्वव्यापी गणेश्वर भगवान् शर्व हैं। इस समस्त चर और अचर लोकमें उनके समान कोई नहीं है। वे भगवान् श्वेतमूर्ति पीत, रक्त एवं