वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३०४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६५ |
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| कपिना यत् कृतं सर्वं लतापाशं चतुर्दिशम्।<br>पञ्चवर्षशते काले गते शक्तस्तदा शरैः॥ ७१<br><br>लताच्छन्नं ततस्तूर्णमारुरोह मुनिर्वटम्।<br>प्राप्तं स्वपितरं दृष्ट्वा जाबालिः संयतोऽपि सन्॥ ७२<br><br>आदरात् पितरं मूर्ध्ना ववन्दे तु विधानतः।<br>सम्परिष्वज्य स मुनिर्मूर्ध्न्याघ्राय सुतं ततः॥ ७३<br><br>उन्मोचयितुमारब्धो न शशाक सुसंयतम्।<br>ततस्तूर्णं धनुन्र्यस्य बाणांश्च शकुनिर्बली॥ ७४<br><br>आरुरोह वटं तूर्णं जटा मोचयितुं तदा।<br>न च शक्नोति संच्छन्नं दृढं कपिवरेण हि॥ ७५<br><br>यदा न शकितास्तेन सम्प्रमोचयितुं जटाः।<br>तदाऽवतीर्णः शकुनिः सहितः परमर्षिणा॥ ७६<br><br>जग्राह च धनुर्बाणांश्चकार शरमण्डपम्।<br>लाघवादर्द्धचन्द्रैस्तां शाखां चिच्छेद स त्रिधा॥ ७७<br><br>शाखया कृत्तया चासौ भारवाही तपोधनः।<br>शरसोपानमार्गेण अवतीर्णोऽथ पादपात्॥ ७८<br><br>तस्मिंस्तदा स्वे तनये ऋतध्वज-<br>स्त्राते नरेन्द्रस्य सुतेन धन्विना।<br>जाबालिना भारवहेन संयुतः<br>समाजगामाथ नदीं स सूर्यजाम्॥ ७९ | काटने लगा। पाँच सौ वर्ष बीत जानेपर चारों ओर बन्दरके द्वारा बनाया गया लताजाल बाणोंसे जब काट दिया गया तब ऋषि ऋतध्वज लताओंसे ढके उस वटवृक्षपर शीघ्र चढ़ गये। जाबालिने अपने पिताको आया देखकर बँधे रहनेपर भी अत्यन्त आदरके साथ यथाविधि सिरसे (सिर झुकाकर) प्रणाम किया। उन मुनिने (पुत्रका) मस्तक सूँघकर उसको अच्छी तरह गले लगाया॥ ६९—७३॥<br><br>फिर वे बन्धन खोलने लगे; परंतु अत्यन्त दृढ़ बन्धनको वे खोल न सके। तब पराक्रमी शकुनि शीघ्र ही धनुष और बाणोंको रखकर जटा खोलनेके लिये बरगदके पेड़पर चढ़ गया। पर (वह भी) कपिद्वारा दृढ़तापूर्वक बनाये गये बन्धनको खोल न सका। जब वह जटाओंको नहीं खोल सका, तब श्रेष्ठ ऋषिके साथ शकुनि नीचे उतर आया। फिर उसने धनुष एवं बाण लिया तथा एक शरमण्डप बनाया। उसके बाद उसने हल्के हाथ अर्द्धचन्द्राकार बाणोंसे उस शाखाको तीन टुकड़ोंमें काट दिया। कटी हुई शाखाके साथ ही भारवाही तपोधन बाणकी सीढ़ियोंके मार्गसे वृक्षके नीचे उतर आये। राजाके धनुर्धारी पुत्रद्वारा अपने पुत्रकी रक्षा हो जानेके बाद ऋतध्वज भारवाही जाबालिके साथ सूर्यपुत्री (यमुना) नदीके तटपर गये॥ ७४—७९॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौंसठवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ६४॥
पैंसठवाँ अध्याय
गालव-प्रसङ्ग, चित्राङ्गदा-वेदवती-वृत्तान्त, कन्याओंकी खोज, घृताची-वृत्तान्त, जाबालिकी जटाओंसे मुक्ति, विश्वकर्माकी शाप-मुक्ति, इन्द्रद्युम्नादिका सप्तगोदावरमें आना, शिव-स्तुति, सप्तगोदावरमें सम्मेलन, कन्याओंका विवाह
| दण्डक उवाच<br><br>एतस्मिन्नन्तरे बाले यक्षासुरसुते शुभे।<br>समागते हरं द्रष्टुं श्रीकण्ठं योगिनां वरम्॥ १<br><br>ददृशाते परिम्लानसंशुष्ककुसुमं विभुम्।<br>बहुनिर्माल्यसंयुक्तं गते तस्मिन् ऋतध्वजे॥ २ | दण्डकने कहा— बाले! इसी बीच यक्ष और असुरकी दोनों कन्याएँ योगीश्वर श्रीकण्ठ महादेवका दर्शन करनेके लिये आयीं। उन ऋतध्वजके चले जानेपर उन दोनोंने महादेवके चारों ओर मुरझाये तथा सूखे हुए फूल और विसर्जनके बाद समर्पित की गयी अन्य बहुत-सी |