वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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अध्याय ६४] चित्राङ्गदा-सन्दर्भ, विश्वकर्माका बन्दर होना, वेदवती आदिका उपाख्यान, जाबालिका बन्धन-मोचन ३०३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सा चापतन्तीं ददृशे यक्षजां दैत्यनन्दिनी।<br>केयमित्येव संचिन्त्य समुत्थाय स्थिताभवत् ॥ ५७<br><br>ततोऽन्योन्यं समालिङ्ग्य गाढं गाढं सुहृत्तया।<br>पप्रच्छतुस्तथान्योन्यं कथयामासतुस्तदा ॥ ५८<br><br>ते परिज्ञाततत्त्वार्थे अन्योन्यं ललनोत्तमे।<br>समासीने कथाभिस्ते नानारूपाभिरादरात् ॥ ५९<br><br>एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तः श्रीकण्ठं स्नातुमादरात्।<br>स तत्त्वज्ञो मुनिश्रेष्ठो अक्षराण्यवलोकयन् ॥ ६० | देववतीने यक्षपुत्रीको आती हुई देखा और यह कौन है—ऐसा विचारकर वह उठ खड़ी हुई। उसके बाद सखीभावसे उन दोनोंने आपसमें गाढ़ आलिङ्गन किया—वे एक-दूसरेके गले लगीं तथा परस्पर पूछ-ताछ और बातचीत करने लगीं। वे दोनों उत्तम ललनाएँ एक दूसरीकी सच्ची घटनाओंको जानकर बैठ गयीं एवं आदरपूर्वक अनेक प्रकारकी कथाएँ कहने लगीं। इसी बीच वे तत्त्वज्ञाता मुनिश्रेष्ठ श्रीकण्ठके निकट स्नान करनेके लिये आये और उन्होंने पत्थरपर लिखे हुए अक्षरोंको देखा॥ ५७—६०॥ |
| स दृष्ट्वा वाचयित्वा च तमर्थमधिगम्य च।<br>मुहूर्तं ध्यानमास्थाय व्यजानाच्च तपोनिधिः ॥ ६१<br><br>ततः सम्पूज्य देवेशं त्वरया स ऋतध्वजः।<br>अयोध्यागमत् क्षिप्रं द्रष्टुमैक्ष्वाकुमीश्वरम् ॥ ६२<br><br>तं दृष्ट्वा नृपतिश्रेष्ठं तापसो वाक्यमब्रवीत्।<br>श्रूयतां नरशार्दूल विज्ञप्तिर्मम पार्थिव ॥ ६३<br><br>मम पुत्रो गुणैर्युक्तः सर्वशास्त्रविशारदः।<br>उद्बद्धः कपिना राजन् विषयान्ते तवैव हि ॥ ६४ | उन्हें देख और पढ़कर तथा उनका अर्थ समझकर वे तपोनिधि एक क्षणमें ध्यान लगाकर (सब कुछ ठीक-ठीक) जान गये। उसके बाद महर्षि ऋतध्वज शीघ्रतासे देवेश्वरकी पूजा कर राजा इक्ष्वाकुका दर्शन करनेके लिये तुरंत ही अयोध्या चले गये। श्रेष्ठ नरपतिका दर्शन करके तपस्वी ऋतध्वजने कहा—नरशार्दूल! राजन्! मेरी विज्ञप्ति (याचिका) सुनिये—राजन्! आपके ही राज्यकी सीमामें एक बन्दरने सर्वशास्त्रोंमें निपुण, अच्छे गुणोंसे युक्त मेरे पुत्रको बाँध रखा है॥ ६१—६४॥ |
| तं हि मोचयितुं नान्यः शक्तस्त्वत्तनयादृते।<br>शकुनिर्नाम राजेन्द्र स ह्यस्त्रविधिपारगः ॥ ६५<br><br>तन्मुनेर्वाक्यमाकर्ण्य पिता मम कृशोदरि।<br>आदिदेश प्रियं पुत्रं शकुनिं तापसान्वये ॥ ६६<br><br>ततः स प्रहितः पित्रा भ्राता मम महाभुजः।<br>सम्प्राप्तो बन्धनोद्देशं समं हि परमर्षिणा ॥ ६७<br><br>दृष्ट्वा न्यग्रोधमत्युच्चं प्ररोहास्तृतदिङ्मुखम्।<br>ददर्श वृक्षशिखरे उद्बद्धमृषिपुत्रकम् ॥ ६८ | राजेन्द्र! अस्त्र-विधिमें पारङ्गत आपके शकुनि नामक पुत्रके सिवाय दूसरा कोई उसे छुड़ा नहीं सकता। कृशोदरि! मुनिके उस वचनको सुनकर मेरे पिताने अपने पुत्र (मेरे भाई) शकुनिको उन तपस्वीके पुत्रके (बन्धन छुड़ानेके) सम्बन्धमें उचित आदेश दिया। उसके बाद पिताके द्वारा भेजा गया वह शक्तिशाली मेरा भाई उन श्रेष्ठ ऋषिके साथ ही बन्धनके स्थानपर आया। चारों ओर बरोहोंसे ढके हुए अत्यन्त ऊँचे वटवृक्षको देखनेके बाद उसने वृक्षकी ऊँची चोटीपर बँधे हुए ऋषिके पुत्रको (बँधा हुआ) देखा॥ ६५—६८॥ |
| तांश्च सर्वांल्लतापाशान् दृष्टवान् स समन्ततः।<br>दृष्ट्वा स मुनिपुत्रं तं स्वजटासंततं वटे ॥ ६९<br><br>धनुरादाय बलवानधिज्यं स चकार ह।<br>लाघवादृषिपुत्रं तं रक्षंश्चिच्छेद मार्गणैः ॥ ७० | (फिर) उसने (फैले हुए) उन समस्त लताजालोंको चारों ओरसे (अच्छी तरह) देखा एवं बड़के पेड़में अपनी जटाओंसे बँधे मुनिपुत्रको देखकर उस पराक्रमीने धनुष लेकर उसकी प्रत्यञ्चा (डोरी) चढ़ायी एवं वह ऋषि-पुत्रकी रक्षा करते हुए निपुणतासे बाणोंद्वारा लताजालोंको |