भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२८८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६२

बासठवाँ अध्याय

शिवके अभिषेक और तप्त-कृच्छ्र-व्रतका उपदेश, हरि-हरके संयोगसे विष्णुके हृदयमें शिवकी संस्थिति, शुक्रको संजीवनी विद्याकी शिक्षा, मङ्कणकी कथा और सप्त सारस्वततीर्थका माहात्म्य

पुलस्त्य उवाच
ततो मुरारिभवनं समभ्येत्य सुरास्ततः।<br>ऊचुर्देवं नमस्कृत्य जगत्संक्षुब्धिकारणम्॥ १<br><br>तच्छ्रुत्वा भगवान् प्राह गच्छामो हरमन्दिरम्।<br>स वेत्स्यति महाज्ञानी जगत्क्षुब्धं चराचरम्॥ २<br><br>तथोक्ता वासुदेवेन देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>जनार्दनं पुरस्कृत्य प्रजग्मुर्मन्दरं गिरिम्।<br>न तत्र देवं न वृषं न देवीं न च नन्दिनम्॥ ३<br><br>शून्यं गिरिमपश्यन्त अज्ञानतिमिरावृताः।<br>तान् मूढदृष्टीन् संप्रेक्ष्य देवान् विष्णुर्महाद्युतिः॥ ४<br><br>प्रोवाच किं न पश्यध्वं महेशं पुरतः स्थितम्।<br>तमूचुर्नैव देवेशं पश्यामो गिरिजापतिम्॥ ५**पुलस्त्यजी (पुनः) बोले—**उन देवोंने विष्णुभवनमें पहुँचकर उन्हें नमस्कार करनेके बाद जगत्‌के अशान्त होनेका कारण पूछा। भगवान् विष्णुने उनके प्रश्नको सुनकर कहा—हम सभी लोग शिवजीके पास चलें। वे महान् ज्ञानी हैं। इस चराचर जगत्‌के व्याकुल होनेका कारण वे जानते होंगे। वासुदेवके ऐसा कहनेपर इन्द्र आदि देवगण जनार्दन भगवान्‌को आगे कर मन्दरपर्वतपर गये। (किंतु) वहाँ उन्होंने न तो महादेवको देखा, न वृषको, न देवी पार्वती और न नन्दीको ही। अज्ञानके अन्धकारमें पड़े हुए उन लोगोंने पर्वतको देवशून्य देखा। (फिर तो) महातेजस्वी विष्णुने दर्शन प्राप्त न होनेके कारण चकपकाये हुए देवोंको देखकर कहा—क्या आपलोग सामने स्थित महादेवको नहीं देख रहे हैं? उन्होंने उत्तर दिया—हाँ, हमलोग गिरिजापति देवेशको नहीं देख रहे हैं॥ १–५॥
न विद्मः कारणं तच्च येन दृष्टिर्हता हि नः।<br>तानुवाच जगन्मूर्तिर्यूयं देवस्य सागसः॥ ६<br><br>पापिष्ठा गर्भहन्तारो मृडान्यः स्वार्थतत्पराः।<br>तेन ज्ञानविवेको वै हतो देवेन शूलिना॥ ७<br><br>येनाग्रतः स्थितमपि पश्यन्तोऽपि न पश्यथ।<br>तस्मात् कायविशुद्ध्यर्थं देवदृष्ट्यर्थमादरात्॥ ८<br><br>तप्तकृच्छ्रेण संशुद्धाः कुरुध्वं स्नानमीश्वरे।<br>क्षीरस्नाने प्रयुञ्जीत सार्द्धं कुम्भशतं सुराः॥ ९हमलोग उस कारणको नहीं जानते, जिससे हमारी देखनेकी शक्ति नष्ट हो गयी है। जगन्मूर्ति (विष्णु)-ने उनसे कहा—आपलोगोंनें देवताओंके साथ अपराध किया है। आपलोग स्वार्थी हैं। आपलोग मृडानीका गर्भ नष्ट करनेके कारण महापापसे ग्रस्त हो गये हैं, इसलिये शूलपाणि महादेवने आपलोगोंके सम्यक् अवबोधको और विचारशक्तिको अपहृत कर लिया है। इस कारण आप सब सामने स्थित (शङ्कर)-को देखकर भी नहीं देख रहे हैं। अतः सब लोग विश्वासके साथ शरीरकी पवित्रता और देवका दर्शन प्राप्त करनेके लिये तप्त-कृच्छ्र-व्रतद्वारा पावन होकर स्नान करें। और, हे देवताओ! महादेवको दूधसे स्नान करानेके लिये डेढ़ सौ घड़ोंका प्रयोग करें॥ ६–९॥
दधिस्नाने चतुःषष्टिर्द्वात्रिंशद्धविषोऽर्हणे।<br>पञ्चगव्यस्य शुद्धस्य कुम्भाः षोडश कीर्तिताः॥ १०उनके अभिषेकके लिये दहीके चौंसठ, घीके बत्तीस पञ्चगव्यके शुद्ध सोलह घड़ोंका विधान कहा गया है।