वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २८४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ |
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| दारुणत्वमधार्मिक्यं नरकावहमुच्यते।<br>एतैश्च पापैः संयुक्तः प्रीणयेद् यदि शङ्करम्॥ २५<br><br>ज्ञानाधिकमशेषेण शेषपापं जयेत् ततः।<br>शारीरं वाचिकं यत् तु मानसं कायिकं तथा॥ २६<br><br>पितृमातृकृतं यच्च कृतं यच्चाश्रितैर्नरैः।<br>भ्रातृभिर्बान्धवैश्चापि तस्मिञ्जन्मनि धर्मज॥ २७<br><br>तत्सर्वं विलयं याति स धर्मः सुतशिष्ययोः।<br>विपरीते भवेत् साध्य विपरीतं पदक्रमः॥ २८<br><br>तस्मात् पुत्रश्च शिष्यश्च विधातव्यौ विपश्चिता।<br>एतदर्थमभिध्याय शिष्याच्छ्रेष्ठतरः सुतः।<br>शेषात् तारयते शिष्यः सर्वतोऽपि हि पुत्रकः॥ २९ | भयङ्करता तथा अधार्मिकताके कार्य नरकके कारण हैं। इन पापोंसे युक्त मनुष्य (भी) यदि परमज्ञानी शङ्करको (अपनी आराधनासे) संतुष्ट कर लेता है तो शेष पापोंको वह पूर्णरूपसे जीत लेता है। धर्मपुत्र! उस जन्ममें किये गये (अपने) सभी कायिक, वाचिक एवं मानसिक कर्म तथा माता-पिता एवं आश्रितजनों और भाइयों एवं बान्धवोंद्वारा किये गये कर्म भी विलीन हो जाते हैं। साध्य! सुत और शिष्यका यही धर्म है। इसके विपरीत होनेपर विपरीत गति प्राप्त होती है, अतएव विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि पुत्र और शिष्यकी (परम्परा) बनाये रखे। इसी अभिप्रायकी दृष्टिसे शिष्यकी अपेक्षा पुत्र अत्यन्त श्रेष्ठ होता है कि शिष्य केवल शेष पापोंसे मुक्त करता है और पुत्र सम्पूर्ण पापोंसे बचा लेता है॥ २१—२९॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>पितामहवचः श्रुत्वा साध्यः प्राह तपोधनः।<br>त्रिः सत्यं तव पुत्रोऽहं देव योगं वदस्व मे॥ ३०<br><br>तमुवाच महायोगी त्वन्मातापितरौ यदि।<br>दास्येते च ततः सूनुर्दायादो मेऽसि पुत्रक॥ ३१<br><br>सनत्कुमारः प्रोवाच दायादपरिकल्पना।<br>येयं हि भवता प्रोक्ता तां मे व्याख्यातुमर्हसि॥ ३२<br><br>तदुक्तं साध्यमुख्येन वाक्यं श्रुत्वा पितामहः।<br>प्राह प्रहस्य भगवाञ्शृणु वत्सेति नारद॥ ३३ | पुलस्त्यजी बोले—पितामहकी बात सुनकर साध्य तपोधन सनत्कुमारने कहा—देव! मैं तीन बार सत्यका उच्चारण करके कहता हूँ कि मैं आपका पुत्र हूँ। अतः मुझे आप योगका उपदेश दीजिये। तब महायोगी पितामहने उनसे कहा—पुत्र! तुम्हारे माता-पिता यदि तुमको मुझे दे दें तो तुम मेरे (स्वत्वप्राप्तिमें अधिकृत) ‘दायाद’ (भागीदार) पुत्र हो जाओगे। सनत्कुमारने कहा—भगवन्! आपने जो यह ‘दायाद’ शब्द कहा है उसका अर्थ क्या है? (कृपया) उसकी विवेचना कीजिये। नारदजी! भगवान् पितामह साध्य-प्रधान सनत्कुमारका वचन सुनकर हँसते हुए बोले—वत्स! सुनो॥ ३०—३३॥ | | ब्रह्मोवाच<br>औरसः क्षेत्रजश्चैव दत्तः कृत्रिम एव च।<br>गूढोत्पन्नोऽपविद्धश्च दायादा बान्धवास्तु षट्॥ ३४<br><br>अमीषु षट्सु पुत्रेषु ऋणपिण्डधनक्रियाः।<br>गोत्रसाम्यं कुले वृत्तिः प्रतिष्ठा शाश्वती तथा॥ ३५<br><br>कानीनश्च सहोढश्च क्रीतः पौनर्भवस्तथा।<br>स्वयंदत्तः पारशवः षडदायादबान्धवाः॥ ३६<br><br>अमीभिर्ऋणपिण्डादिकथा नैवेह विद्यते।<br>नामधारका एवेह न गोत्रकुलसंमताः॥ ३७ | ब्रह्माने कहा—औरस, क्षेत्रज, दत्त, कृत्रिम, गूढोत्पन्न और अपविद्ध—ये छः बान्धव दायाद अर्थात् (दायभागके अधिकारी) होते हैं। इन छः पुत्रोंसे ऋण, पिण्ड, धनकी क्रिया, गोत्रसाम्य, कुलवृत्ति और स्थिर प्रतिष्ठा रहती है। (इसके अतिरिक्त) कानीन, सहोढ, क्रीत, पौनर्भव, स्वयंदत्त और पारशव—ये छः दायाद-बान्धव कहे जाते हैं। इनके द्वारा ऋण एवं पिण्ड आदिका कार्य नहीं होता। ये केवल नामधारी होते हैं। ये गोत्र एवं कुलसे सम्मत नहीं होते॥ ३४—३७॥ |