वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
पृष्ठ 295, कुल 489 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 295
| अध्याय ६१ ] | पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र-शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन | २८५ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत् तस्य वचनं श्रुत्वा ब्रह्मणः सनकाग्रजः।<br>उवाचैषां विशेषं मे ब्रह्मन् व्याख्यातुमर्हसि॥ ३८<br><br>ततोऽब्रवीत् सुरपतिर्विशेषं शृणु पुत्रक।<br>औरसो यः स्वयं जातः प्रतिबिम्बमिवात्मनः॥ ३९<br><br>क्लीबोन्मत्ते व्यसनिनि पत्त्यौ तस्याज्ञया तु या।<br>भार्या ह्यनातुरा पुत्रं जनयेत् क्षेत्रजस्तु सः॥ ४०<br><br>मातापितृभ्यां यो दत्तः स दत्तः परिगीयते।<br>मित्रपुत्रं मित्रदत्तं कृत्रिमं प्राहुरुत्तमाः॥ ४१ | सनत्कुमारने उनकी बात सुनकर (पुनः) कहा—ब्रह्मन्! आप इन सभीका विशेष लक्षण मुझे बतलाइये। उसके पश्चात् देवोंके स्वामी ब्रह्माने कहा—पुत्र! इन्हें मैं विशेषरूपसे बतलाता हूँ; सुनो—अपने द्वारा उत्पन्न किया गया पुत्र 'औरस' कहलाता है। यह अपना ही प्रतिबिम्ब होता है। पतिके नपुंसक, उन्मत्त (पागल) या व्यसनी होनेपर उसकी आज्ञासे अनातुरा (कामवासनासे रहित) पत्नी जो पुत्र उत्पन्न करती है, उसे 'क्षेत्रज' कहते हैं। माता-पिता यदि दूसरेको अपने पुत्रको सौंप दें तो वह 'दत्तक' (या गोद लिया हुआ) कहा जाता है। श्रेष्ठजन मित्रके पुत्र और मित्रद्वारा दिये गये पुत्रको 'कृत्रिम पुत्र' कहते हैं॥ ३८—४१॥ |
| न ज्ञायते गृहे केन जातस्त्विति स गूढकः।<br>बाह्यतः स्वयमानीतः सोऽपविद्धः प्रकीर्तितः॥ ४२<br><br>कन्याजातस्तु कानीनः सगर्भोढः सहोढकः।<br>मूल्यैर्गृहीतः क्रीतः स्याद् द्विविधः स्यात्पुनर्भवः॥ ४३<br><br>दत्त्वैकस्य च या कन्या हृत्वाऽन्यस्य प्रदीयते।<br>तज्जातस्तनयो ज्ञेयो लोके पौनर्भवो मुने॥ ४४<br><br>दुर्भिक्षे व्यसने चापि येनात्मा विनिवेदितः।<br>स स्वयंदत्त इत्युक्तस्तथान्यः कारणान्तरैः॥ ४५ | वह पुत्र 'गूढ' होता है, जिसके विषयमें यह ज्ञान न हो कि गृहमें किसके द्वारा वह उत्पन्न हुआ है। बाहरसे स्वयं लाये हुए पुत्रको 'अपविद्ध' कहते हैं। कुमारी कन्याके गर्भसे उत्पन्न पुत्रका नाम 'कानीन' होता है। गर्भिणी कन्यासे विवाहके बाद उत्पन्न पुत्रको 'सहोढ' कहते हैं। मूल्य देकर खरीदा हुआ पुत्र 'क्रीत' पुत्र कहलाता है। 'पुनर्भव' पुत्र दो प्रकारका होता है। एक कन्याको एक पतिके हाथमें देकर पुनः उससे छीनकर दूसरे पतिके हाथमें देनेपर जो पुत्र उत्पन्न होता है उसे 'पौनर्भव' पुत्र कहते हैं। दुर्भिक्ष, व्यसन या अन्य किसी कारणसे जो स्वयंको (किसी दूसरेके हाथमें) समर्पित कर देता है उसे 'स्वयंदत्त' पुत्र कहते हैं॥ ४२—४५॥ |
| ब्राह्मणस्य सुतः शूद्रायां जायते यस्तु सुव्रत।<br>ऊढायां वाप्यनूढायां स पारशव उच्यते॥ ४६<br><br>एतस्मात् कारणात् पुत्र न स्वयं दातुमर्हसि।<br>स्वमात्मानं गच्छ शीघ्रं पितरौ समुपाव्हय॥ ४७<br><br>ततः स मातापितरौ सस्मार वचनाद् विभोः।<br>तावाजग्मतुरीशानं द्रष्टुं वै दम्पती मुने॥ ४८<br><br>धर्मोऽहिंसा च देवेशं प्रणिपत्य न्यषीदताम्।<br>उपविष्टौ सुखासीनौ साध्यो वचनमब्रवीत्॥ ४९ | सुव्रत! ब्याही गयी या क्वाँरी अविवाहित शूद्राके गर्भसे ब्राह्मणका जो पुत्र होता है उसका नाम 'पारशव' पुत्र है। पुत्र! इन कारणोंसे तुम स्वयं आत्मदान नहीं कर सकते। अतः शीघ्र जाकर अपने माता-पिताको बुला लाओ। [पुलस्त्यजी कहते हैं—] मुने! इसके बाद सनत्कुमारने विभु ब्रह्माके कहनेसे अपने माता-पिताका स्मरण किया। नारदमुनि! वे दम्पति पितामहका दर्शन करनेके लिये वहाँ आ गये। धर्म और अहिंसा—दोनों ब्रह्माको प्रणाम कर बैठ गये। उनके सुखसे बैठ जानेपर सनत्कुमारने यह वचन कहा॥ ४६—४९॥ |