वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २८६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ | | :--- | :--- |
| सनत्कुमार उवाच<br>योगं जिगमिषुस्तात ब्रह्माणं समचूचुदम्।<br>स चोक्तवान् मां पुत्रार्थे तस्मात् त्वं दातुमर्हसि॥ ५०<br>तावेवमुक्तौ पुत्रेण योगाचार्यं पितामहम्।<br>उक्तवन्तौ प्रभोऽयं हि आवयोस्तनयस्तव॥ ५१<br>अद्यप्रभृत्ययं पुत्रस्तव ब्रह्मन् भविष्यति।<br>इत्युक्त्वा जग्मतुस्तूर्णं येनैवाभ्यागतौ यथा॥ ५२<br>पितामहोऽपि तं पुत्रं साध्यं सद्विनयान्वितम्।<br>सनत्कुमारं प्रोवाच योगं द्वादशपत्रकम्॥ ५३ | सनत्कुमारने कहा—तात! मैंने योग जाननेके लिये पितामहसे प्रार्थना की थी। उन्होंने मुझसे अपना पुत्र होनेके लिये कहा था। अतः आप मुझे प्रदान कर दें। पुत्रके इस प्रकार कहनेपर उन दोनों योगाचार्योंने पितामहसे कहा—प्रभो! हम दोनोंका यह पुत्र आपका हो। ब्रह्मन्! आजसे यह पुत्र आपका होगा। इतना कहकर वे शीघ्र ही जिस मार्गसे आये थे उसीसे फिर चले गये। पितामहने भी उस विनयी पुत्र सनत्कुमारको द्वादशपत्रयोगका उपदेश किया (जो आगे वर्णित है—)॥ ५०-५३॥ | | शिखासंस्थं तु ओङ्कारं मेषोऽस्य शिरसि स्थितः।<br>मासो वैशाखनामा च प्रथमं पत्रकं स्मृतम्॥ ५४<br>नकारो मुखसंस्थो हि वृषस्तत्र प्रकीर्तितः।<br>ज्येष्ठमासश्च तत्पत्रं द्वितीयं परिकीर्तितम्॥ ५५<br>मोकारो भुजयोर्युग्मं मिथुनस्तत्र संस्थितः।<br>मासो आषाढनामा च तृतीयं पत्रकं स्मृतम्॥ ५६<br>भकारं नेत्रयुगलं तत्र कर्कटकः स्थितः।<br>मासः श्रावण इत्युक्तश्चतुर्थं पत्रकं स्मृतम्॥ ५७ | इन (भगवान् वासुदेव)-की शिखामें स्थित 'ओङ्कार', सिरपर स्थित मेष राशि और वैशाखमास—ये इनके प्रथम पत्रक हैं। मुखमें स्थित 'न' अक्षर और वहींपर विद्यमान वृषराशि तथा ज्येष्ठमास—ये उनके द्वितीय पत्रक कहे गये हैं। दोनों भुजाओंमें स्थित 'मो' अक्षर, मिथुनराशि एवं आषाढ़मास—ये उनके तृतीय पत्रक हैं। उनके नेत्रद्वयमें विद्यमान 'भ' अक्षर कर्कराशि और श्रावणमास—ये चतुर्थ पत्रक हैं॥ ५४-५७॥ | | गकारं हृदयं प्रोक्तं सिंहो वसति तत्र च।<br>मासो भाद्रस्तथा प्रोक्तः पञ्चमं पत्रकं स्मृतम्॥ ५८<br>वकारं कवचं विद्यात् कन्या तत्र प्रतिष्ठिता।<br>मासश्चाश्वयुजो नाम षष्ठं तत् पत्रकं स्मृतम्॥ ५९<br>तेकारमस्त्रग्रामं च तुलाराशिः कृताश्रयः।<br>मासश्च कार्तिको नाम सप्तमं पत्रकं स्मृतम्॥ ६०<br>वाकारं नाभिसंयुक्तं स्थितस्तत्र तु वृश्चिकः।<br>मासो मार्गशिरो नाम त्वष्टमं पत्रकं स्मृतम्॥ ६१ | (उनके) हृदयके रूपमें विद्यमान 'ग'अक्षर, सिंहराशि और भाद्रपदमास—ये पञ्चम पत्रक हैं। (उनके) कवचके रूपमें विद्यमान 'व'अक्षर, कन्याराशि और आश्विनमास—ये षष्ठ पत्रक हैं। (उनके) अस्त्र-समूहके रूपमें विद्यमान 'ते'अक्षर, तुलाराशि और कार्तिकमास—ये सप्तम पत्रक हैं। मुने! (उनके) नाभिरूपसे विद्यमान 'वा'अक्षर वृश्चिकराशि और मार्गशीर्षमास—ये अष्टम पत्रक हैं॥ ५८-६१॥ | | सुकारं जघनं प्रोक्तं तत्रस्थश्च धनुर्धरः।<br>पौषेति गदितो मासो नवमं परिकीर्तितम्॥ ६२<br>देकारश्चोरुयुगलं मकरोऽप्यत्र संस्थितः।<br>माघो निगदितो मासः पत्रकं दशमं स्मृतम्॥ ६३<br>वाकारो जानुयुग्मं च कुम्भस्तत्रादिसंस्थितः।<br>पत्रकं फाल्गुनं प्रोक्तं तदेकादशमुत्तमम्॥ ६४<br>पादौ यकारो मीनोऽपि स चैत्रे वसते मुने।<br>इदं द्वादशमं प्रोक्तं पत्रं वै केशवस्य हि॥ ६५ | (उनके) जघनरूपमें विद्यमान 'सु'अक्षर, धनुराशि और पौषमास—ये नवम पत्रक हैं। (उनके) ऊरु-युगलरूपमें विद्यमान 'दे'अक्षर, मकरराशि और माघमास—ये दशम पत्रक हैं। (उनके) दोनों घुटनोंके रूपमें विद्यमान 'वा'अक्षर, कुम्भराशि और फाल्गुनमास—ये एकादश पत्रक हैं। (उनके) चरणद्वयरूपमें विद्यमान 'य'अक्षर, मीनराशि और चैत्रमास—ये द्वादश पत्रक हैं। ये ही केशवके द्वादश पत्र हैं॥ ६२-६५॥ | | द्वादशारं तथा चक्रं षण्णाभि द्वियुतं तथा।<br>त्रिव्यूहमेकमूर्तिश्च तथोक्तः परमेश्वरः॥ ६६ | उनका चक्र बारह अरों, बारह नाभियों और तीन व्यूहोंसे युक्त है। इस प्रकारकी उन परमेश्वरकी एक |