वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ६१ ] | पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र-शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन | २८३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| शिष्टाचारविनाशं च शिष्टद्वेषं शिशोर्वधम्।<br>शास्त्रस्तेयं धर्मनाशं दशमं परिकीर्तितम्॥ १०<br><br>षडङ्गनिधनं घोरं षाड्गुण्यप्रतिषेधनम्।<br>एकादशममेवोक्तं नरकं सद्भिरुत्तमम्॥ ११<br><br>सत्सु नित्यं सदा वैरमनाचारमसत्क्रिया।<br>संस्कारपरिहीनत्वमिदं द्वादशमं स्मृतम्॥ १२ | करना नवाँ नरक कहा जाता है। शिष्टाचारका नाश, शिष्टजनोंसे विरोध, नादान बालककी हत्या, शास्त्रग्रन्थोंकी चोरी तथा स्वधर्मका नाश करना दसवाँ नरक कहा जाता है। षडङ्गनिधन अर्थात् छः अङ्गोंवाली वेद-विद्याको नष्ट करना और षाड्गुण्य अर्थात् सन्धि-विग्रह, यान, आसन-द्वैधीभाव, समाश्रय (राजनीति-गुणों)-का प्रतिषेध ग्यारहवाँ घोर नरक कहा गया है। सज्जनोंसे सदा वैर-भाव, आचारसे रहित रहना, बुरे कार्यमें लगे रहना एवं संस्कार-विहीनताको बारहवाँ नरक कहा गया है॥ ९—१२॥ |
| हानिर्धर्मार्थकामानापवर्गस्य हारणम्।<br>संभेदः संविदामेतत् त्रयोदशममुच्यते॥ १३<br><br>कृपणं धर्महीनं च यद् वर्ज्यं यच्च वह्निदम्।<br>चतुर्दशममेवोक्तं नरकं तद् विगर्हितम्॥ १४<br><br>अज्ञानं चाप्यसूयत्वमशौचमशुभावहम्।<br>स्मृतं तत् पञ्चदशममसत्यवचनानि च॥ १५<br><br>आलस्यं वै षोडशममाक्रोशं च विशेषतः।<br>सर्वस्य चाततायित्वमावासेष्वग्निदीपनम्॥ १६ | धर्म, अर्थ एवं सत्कामनाकी हानि, मोक्षका नाश एवं इनके समन्वयमें विरोध उत्पन्न करनेको तेरहवाँ नरक कहा जाता है। कृपण, धर्महीन, परित्याज्य एवं आग लगानेवालेको चौदहवाँ निन्दित नरक कहते हैं। विवेकहीनता, दूसरेके गुणमें दोष निकालना, अमङ्गल करना, अपवित्रता एवं असत्य वचन बोलनेको पंद्रहवाँ नरक कहते हैं। आलस्य करना, विशेष रूपसे क्रोध करना, सभीके प्रति आततायी बन जाना एवं घरमें आग लगाना सोलहवाँ नरक कहलाता है॥ १३—१६॥ |
| इच्छा च परदारेषु नरकाय निगद्यते।<br>ईर्ष्याभावश्च सत्येषु उद्वृत्तं तु विगर्हितम्॥ १७<br><br>एतैस्तु पापैः पुरुषः पुन्नामाद्यैर्न संशयः।<br>संयुक्तः प्रीणयेद् देवं संतत्या जगतः पतिम्॥ १८<br><br>प्रीतः सृष्ट्या तु शुभया स पापाद् येन मुच्यते।<br>पुन्नामनरकं घोरं विनाशयति सर्वतः॥ १९<br><br>एतस्मात् कारणात् साध्य सुतः पुत्रेति गद्यते।<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि शेषपापस्य लक्षणम्॥ २० | परस्त्रीकी कामना, सत्यके प्रति ईर्ष्या रखना, निन्दित एवं उद्दण्ड व्यवहार करना नरक देनेवाला कहा गया है। इन पुन्नाम आदि पापोंसे युक्त पुरुष (भी) निस्संदेह 'पुत्र' के द्वारा जगत्पति जनार्दनको प्रसन्न कर सकता है। पापहारी सुसन्ततिसे प्रसन्न होकर भगवान् जनार्दन पुन्नामके घोर नरकको पूर्णतया नष्ट कर देते हैं। साध्य! इसीलिये सुतको 'पुत्र' कहा जाता है। अब इसके बाद मैं शेष पापोंका लक्षण बतलाता हूँ॥ १७—२०॥ |
| ऋणं देवर्षिभूतानां मनुष्याणां विशेषतः।<br>पितॄणां च द्विजश्रेष्ठ सर्ववर्णेषु चैकता॥ २१<br><br>ओंकारादपि निर्वृत्तिः पापकार्यकृतश्च यः।<br>मत्स्यादश्च महापापमगम्यागमनं तथा॥ २२<br><br>घृतादिविक्रयं घोरं चण्डालादिपरिग्रहः।<br>स्वदोषाच्छादनं पापं परदोषप्रकाशनम्॥ २३<br><br>मत्सरित्वं वाग्दुष्टत्वं निष्ठुरत्वं तथा परम्।<br>टाकित्वं तालवादित्वं नाम्ना वाचाऽप्यधर्मजम्॥ २४ | द्विजश्रेष्ठ! देवऋण, ऋषिऋण, प्राणियोंके ग्रहण—विशेषतः मनुष्यों एवं पितरोंका ऋण, सभी वर्णोंको एक समझना, ॐकारके उच्चारणमें उपेक्षा-भाव रखना, पापकामोंका करना, मछली खाना तथा अगम्या स्त्रीसे संगत होना—ये महापाप हैं। घृत-तैल आदिका बेचना, चाण्डाल आदिसे दान लेना, अपना दोष छिपाना और दूसरेका दोष प्रकट करना—ये घोर पाप हैं। दूसरेका उत्कर्ष देखकर जलना, कड़वी बात बोलना, निर्दयपना, नाम कहनेसे भी अधर्मजनक टाकिता और तालवादिता, |