वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २८२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६१ |
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इकसठवाँ अध्याय
पुन्नाम नरकोंका वर्णन, पुत्र-शिष्यकी विशेषता एवं बारह प्रकारके पुत्रोंका वर्णन, सनत्कुमार-ब्रह्माका प्रसंग, चतुर्मूर्तिका वर्णन और मुरु-वध
| ब्रह्मोवाच | ब्रह्माने कहा— |
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| परदाराभिगमनं पापीयांसोपसेवनम्।<br>पारुष्यं सर्वभूतानां प्रथमं नरकं स्मृतम्॥ १<br><br>फलस्तेयं महापापं फलहीनं तथाऽटनम्।<br>छेदनं वृक्षजातीनां द्वितीयं नरकं स्मृतम्॥ २<br><br>वर्ज्यादानं तथा दुष्टमवध्यवधबन्धनम्।<br>विवादमर्थहेतूत्थं तृतीयं नरकं स्मृतम्॥ ३<br><br>भयदं सर्वसत्त्वानां भवभूतिविनाशनम्।<br>भ्रंशनं निजधर्माणां चतुर्थं नरकं स्मृतम्॥ ४ | परस्त्रीसे संगत होना, पापियोंके साथ रहना और सब प्राणियोंके प्रति (किसी भी प्राणीके साथ) कठोरताका व्यवहार करना पहला नरक कहा गया है। फलोंकी चोरी, (अच्छे) उद्देश्यसे रहित घूमना (आवारापन) एवं वृक्ष आदि वनस्पतियोंका काटना घोर पाप तथा दूसरा नरक कहा गया है। दोषयुक्त एवं वर्जित—ग्रहण न करने योग्य—वस्तुओंका लेना, जो वधके योग्य नहीं है उसे मारना अथवा बन्धनमें डालना (बन्दी बनाना) और अर्थ (धन—रुपये-पैसे)-के लिये किया जानेवाला विवाद (मुकदमा उठाना) तीसरा नरक होता है। सभी प्राणियोंको भय देना, संसारकी सार्वजनिक सम्पत्तिको नष्ट करना तथा अपने नियत धर्म-नियमोंसे विचलित होना चौथे प्रकारका नरक कहलाता है॥ १—४॥ |
| मारणं मित्रकौटिल्यं मिथ्याऽभिशपनं च यत्।<br>मिष्टैकाशनमित्युक्तं पञ्चमं तु नृपाचनम्॥ ५<br><br>पत्रफलादिहरणं यमनं योगनाशनम्।<br>यानयुग्यस्य हरणं षष्ठमुक्तं नृपाचनम्॥ ६<br><br>राजभागहरं मूढं राजजायानिषेवणम्।<br>राज्ये त्वहितकारित्वं सप्तमं निरयं स्मृतम्॥ ७<br><br>लुब्धत्वं लोलुपत्वं च लब्धधर्मार्थनाशनम्।<br>लालासंकीर्णमेवोक्तमष्टमं नरकं स्मृतम्॥ ८ | पुरश्चरण आदि तान्त्रिक अभिचारोंसे किसीको मारना, मृत्यु-जैसा अपार कष्ट देना तथा मित्रके साथ छल-छद्म, झूठी शपथ और अकेले मधुर पदार्थ खाना पाँचवाँ नरक कहा जाता है। पत्र (पुष्प आदि) एवं फल चोराना, किसीको बाँध (बन्धुवा बनाये) रखना, किसीके प्राप्तव्यकी प्राप्तिमें विघ्न-बाधा डालकर उसे नष्ट कर देना, घोड़ा-गाड़ी आदि सवारीके जूए (आदि सामानों)-की चोरी कर लेना छठा पाप कहा गया है। भुलावेमें पड़कर राजाके अंशका चुरा लेना एवं मूर्खतावश साहस कर राजपत्नीका संसर्ग एवं राज्यका अमङ्गल (नुकसान) करना सातवाँ नरक कहा जाता है। किसी वस्तु या व्यक्तिपर लुभा जाना, लालच करना, पुरुषार्थसे प्राप्त धर्मयुक्त अर्थका विनाश करना और लारमिली वाणीको आठवाँ नरक कहते हैं॥ ५—८॥ |
| विप्रोष्यां ब्रह्महरणं ब्राह्मणानां विनिन्दनम्।<br>विरोधं बन्धुभिश्चोक्तं नवमं नरपाचनम्॥ ९ | ब्राह्मणको देशसे निकाल देना, ब्राह्मणका धन चुराना, ब्राह्मणोंकी निन्दा करना तथा बन्धुओंसे विरोध |